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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

Abstract Inspirational

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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

Abstract Inspirational

लोग क्या कहेंगे??

लोग क्या कहेंगे??

4 mins
9

जुलाई--मेरी ड्रीम डायरी

डायरी---जीवन पथ 

दिनांक---19-6-22

दिन---रविवार 


आज अपने मन के भाव कह रही हूं कि हम सभी, "लोग क्या कहेंगे" ??के चक्कर मे अपनी कितनी खुशियां गंवा देते हैं ।लोगो का काम है कहना एक पुरानी कहानी है सभी अवगत होंगे ******

बाप बेटे एक घोड़े पर जा रहे थे एक गांव से निकले लोगों ने कहा देखो---


कैसे हैं?? दोनों बाप बेटे घोड़े में चढ़े हैं ,बेचारे बेजुबान की जान ही नहीं देख रहे ।

अब लड़के ने पिता को बैठा दिया और खुद उतर कर पैदल चलने लगा थोड़ी दूर और चले तो लोग कहते हैं देखो कैसा बाप है ??बेटा पैदल चल रहा है अपना घोड़े पर सवार है ।


अब पिता उतर गया और बेटे को बैठा दिया घोड़े पर ।फिर कुछ दूर जाने पर लोग कहते हैं कि कैसा बेटा है ??अपना घोड़े पर सवार जा रहा है वृद्ध बाप को पैदल चला रहा है । 


सबका सुनते- सुनते वह इतना परेशान हो गए कि दोनों पैदल चलने लगे और घोड़ा खाली । 


फिर भी लोगों को तो बोलना ही था आगे पहुंचे देखो तो कैसे दोनों मूर्ख हैं?? साथ में सवारी लिए हैं और चल पैदल रहे है 


वही अपने जीवन का हाल है ना किसी से लेना एक ना देना दो फिर भी लोगों को बोलना है ।

मैं अपने साथ घटी एक घटना का जिक्र करूंगी मेरा अध्ययन अध्यापन में बहुत ही मन लगता था पर बिजनेस क्लास फैमिली होने के कारण ससुर जी ने पहले ही कह दिया था कि सर्विस नहीं करायेगे मेरा M.A का 1 साल हुआ था और दूसरे साल के पेपर देने थे जो शेसन लेट होने के कारण अप्रैल मे पड़ गये थे शादी फरवरी मे थी । मै पेपर न दे सकी । तब के पति भी नहीं कुछ बोल सकते थे ।


पर मेरे अंदर की जिजीविषा बच्चों को पठन-पाठन कराते और प्रबल हो जाती।मन मार कर रह जाती। 

लोग क्या कहेंगे?? करते-करते शादी के 25 साल व्यतीत हो गए पढ़ने का क्रम ना बन पाया फिर 1 दिन मैं बस से श्री मान जी के साथ बाहर जा रही थी मेरे यहां के स्थानीय डिग्री कालेज के प्राचार्य जी बस मे बैठे थे इन्होने उनसे बातचीत की और रास्ता मिल गया ।


अब बच्चे बड़े थे सास-ससुर जी को भी गुजरे 12- 13 वर्ष हो चुके थे मैंने पता किया उन्होंने कहा 10 वर्ष हो जाने के पश्चात M.A का 1 वर्ष बेकार हो गया अब आपको दोनों (फर्स्ट इयर व सेकेंड इयर )करने होंगे मैंने कहा कोई बात नहीं मैं कर लूंगी उन्होंने मेरा बहुत सहयोग किया ।मेरा विषय संस्कृत था। स्कूल के बच्चे मेरे बच्चों के उम्र के थे ।मेरा बड़ा बेटा भी उस समय एमबीबीएस कर रहा था पर मैं हिम्मत से डटी ही रही ।


कस्बे का माहौल रोज विद्यालय जाना भी संभव नहीं था ।प्राचार्य जी का भी पठन-पाठन में बहुत अनुराग था ।वे हफ्ते में 2 दिन लगातार 2 घंटे मुझे पढ़ा देते थे । मैंने कोर्स तैयार कर लिया । परीक्षा सेंटर वहां से 35 किलोमीटर दूर पड़ा । सब बच्चों के साथ गाड़ी से चली जाती । 


परीक्षा कक्ष में जिनकी ड्यूटी लगी होती मुझे अजूबा सा देखते क्योकि मेरी उम्र उस समय लगभग 44- 45 की रही होगी और एक पेपर के दिन तो हद ही हो गई मैं पेपर कर रही थी पेपर पढ़ा हुआ था अच्छा आया था तभी 2 मैडम जो कक्ष निरीक्षण में थी आई बोली, "आप प्रमोशन के लिए पोस्ट ग्रेजुएशन कर रही होगी "? मैंने कहा ,"मैं कहीं जॉब ही नहीं करती हूं फिर प्रमोशन का सवाल कहां "?? अच्छा-अच्छा तो फिर आपके बच्चे ना होंगे ? "मैंने पूछा बच्चों से पढ़ाई का क्या संबंध "? 


आप ऐसा करिए मुझे आप अभी पेपर हल करने दीजिये बाद में बैठ कर आपके सभी सवालों का जवाब दे कर ही जाऊंगी । कृपया तब तक आप मेरा डिस्टर्ब मत करें । 


मेरा मन बहुत घबरा रहा था ।टाइम ना निकल जाए आता हुआ पेपर भी छूट जाए । तब तो बहुत दुख होगा ।और यह भी था कि इनका कौतूहल ना दूर होगा तो यह कल के पेपर में पूछेंगे ,अगर इन्हीं की ड्यूटी लग गई । फिर वह दोनों आराम से बैठ गए मैंने अपना पेपर आधा घंटे पहले पूरा कर कॉपी जमा कर दी ।

उनसे मुखातिब हो पूछा आप क्या जानना चाहती हैं ? मेरे बच्चे भी हैं 3 तो फिर बेटियाँ ही होगी ? मैं बोली, "नहीं दो बेटे एक बेटी है "।अब उनके तरकस का आखिरी तीर निकला ,आपके पति ने आपको किसी वजह से छोड़ दिया होगा तो आप भरण पोषण के लिए कर रही होंगी । 

मुझे उनकी बातें सुन बहुत ही कोफ्त हुई मैंने कहा आप ही बताइए कि हम अपनी खुशी के लिए कोई कार्य नहीं कर सकते क्या ?अध्ययन मेरा शौक है ।अब वे निरुत्तर हो शान्त थीं लोगो का काम है कोई दुखती रग खोज सहलाना ।


जब मौका मिले तब शौक पूरा करना चाहिए यही मेरे बच्चों का कहना है पर लोगों की सोच उनको तो कुछ ना कुछ कहना ही है ।


हम अपनी सोच बदल सकते है दूसरे की नहीं ।

       



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