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Sanjay Arjoo

Abstract Fantasy Inspirational

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Sanjay Arjoo

Abstract Fantasy Inspirational

लघुकथा का जन्मदिन

लघुकथा का जन्मदिन

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लघुकथा का जन्मदिन 

गरीबी में पल रही छोटी सी लघुकथा को जैसे ही पता चला कि इस बार मोहल्ले की कुछ लोग मिलकर उसका जन्मदिन मनाने वाले हैं।
वह खुशी से उछल पड़ी। वह बचपन से ही देखते आ रही थी कैसे बाकी लोग अपने प्यारे बच्चों का जन्मदिन मनाते हैं बच्चों के चेहरे की खुशियां देखकर उसे भी लगता था काश कि उसका भी कोई जन्मदिन मनाये। अचानक उसकी आंखें खुशी से चमक उठी।
 आज उसे लग रहा था वह सिर्फ एक छोटी सी लघुकथा नहीं है । बल्कि उसमें भी कुछ खास है, इस अचानक मिलने वाली छोटी सी खुशी से उसका आत्म सम्मान जाग उठा। धीरे-धीरे शाम हुई मोहल्ले वालों ने एक मंच सजाया, और मोहल्ले के पार्षद को, मोहल्ले की सबसे प्यारी इस छोट सी लघुकथा के जन्मदिन पर विशेष रूप से आमंत्रित किया।
लघुकथा इसी बात से खुश थी कि लोगों को उसकी उपस्थिति का कम से कम एहसास तो है। ऐसे में जनप्रतिनिधि भी उसके जन्मदिन पर आ रहे हैं इससे उसकी खुशी दुगनी दुगनी हो रही थी। आज उसकी गरीबी,उसका छोटा होना, ये सब उसकी खुशियों के बीच नहीं आ रहे थे।

आंखों में चमक लिए अपने जन्मदिन पर इठलाती लघुकथा, सबसे अगली पंक्ति में मुस्कुराहट के साथ बैठी , कार्यक्रम में दूर दूर से आए मेहमानों को देखकर खुश हो रही थी। मंच धीरे-धीरे सजने लगा। एक वरिष्ठ लेखक ने मुख्य अतिथि के कान में, लघुकथा की तरफ देखते हुए कहा, यही है वह जिसके जन्मदिन पर आपको आज आमंत्रित किया गया है। वरिष्ठ अतिथि ने हल्का सा मुस्कुरा कर लघुकथा की तरफ देखा। लघुकथा नज़रे नीचे कर हल्का सा मुस्कुरा उठी। तभी मंच से आवाज आई मुख्य अतिथि को मां सरस्वती की वंदना के लिए बुलाया गया। जैसे ही मुख्य अतिथि ने मां सरस्वती की मूर्ति पर फूलों का हार चढ़ाया पूरा हाल तालियों से गूंज उठा । पहली पंक्ति में बैठी लघुकथा को लगा जैसे वो हार मां सरस्वती के नहीं बल्कि उसी के गले में डाला गया है। उसने खुशी से एक बार अपना हाथ गले की तरफ घुमाया भी मानों वह एहसास कर रही हो कि यह फूलों का हार अभी अभी उसी के गले में डाला गया है।
फिर दीप प्रज्वलन हुआ, माचिस की तीली के जलते ही लघु कथा की आंखों में चमक जाग उठी। दीपक की लो अब उसके मन में जल चुकी थी। उसे अब तिरस्कार नहीं बल्कि अपने अस्तित्व का अहसास प्रफुल्लित कर रहा था।
मंच संचालक महोदय ने, लघु कथा की तरफ देखते हुए, उसके जन्म की रोमांचक कहानी लोगों को सुनाई।
कैसे उसका अस्तित्व धरातल पर उतरा?
कैसे और क्यों लघुकथा को यह नाम दिया गया? 
साहित्य के उन प्रकांड पंडितों का भी नाम लिया गया जिन्होंने लघुकथा को यह नाम दिया। तभी लघुकथा को याद आया किस तरह उसके बचपन के दिनो में कुछ बड़े भी शामिल थे जो उसे अधूरी दास्तान और चुटकुला कह कर चिढ़ाया करते थे।
परंतु आज उसके जन्मदिन की खुशियों पर वह इन सब पुरानी बातें याद करना नहीं चाहती थी।
तभी आमंत्रित मुख्य अतिथि ने मंच संभाला और लघुकथा की आंखों में आंखें डालकर बोलने लगे "हमें लघुकथा की चंचलता को थोड़ा संभालना चाहिए, इसे अपनी कम उम्र और, छोटेपन का अहसास रखना चाहिए़ साथ ही मैं चाहूंगा कि इस लघुकथा को अपने बड़ों का आदर करते हुए विनम्रता के साथ व्यवहार करना भी सीखना चाहिए। आखिर कोई यूं ही लघुकथा को चुटकुला नहीं कहता इसको अपनी कमियों का ध्यान रखना चाहिए।
मुख्य अतिथि की बातें सुन लघुकथा का मन थोड़ा कुंठित हो उठा, वह अपने नए फ्रॉक में अपनी उंगलियां फंसा कर, अपनी कुंठा और गुस्से को दबा चुपचाप नज़रे नीचे किए बैठी रही।
मुख्य अतिथि ने अपनी बात कहते हुए अपनी महत्वता बताने का प्रयास किया और समय का अभाव बताकर यथाशीघ्र मंच से उतर अपने चमचों के साथ दूसरे कार्यक्रम की और निकल गए।
  सभागृह ने उनके विचारों से अल्प सहमत होते हुए भी तालियां बजाकर उनका सम्मान बनाए रखा। सभा के बिगड़ते माहौल को देखकर मंच पर उपस्थित वरिष्ठ साहित्यकार ने मंच पर उपस्थित मुख्य अतिथि का धन्यवाद करते हुए आयोजको को संबोधित करते हुए बड़े ही विनम्र भाव से कहा" यह एक संवेदनशील भावनात्मक एवं हम सबसे जुड़ाव महसूस करने वाली हम सब की प्रिय लघुकथा का जन्मदिन का समारोह है। मैं आयोजकों से अनुरोध करूंगा कि भविष्य में इस तरह के संवेदनशील आयोजन में किसी नेता को आमंत्रित ना कर किसी साहित्यकार को वशिष्ठ अतिथि के रूप में आमंत्रित करें ताकि वह कलम की कोमल भावनाओं का सम्मान कर सकें"इतना सुनते ही प्रांगण में खुशी से तालियां बज उठी। कुछ देर से खुद को हीन समझने वाली लघुकथा के चेहरे पर एक बार फिर से मुस्कान उभर आई। फिर सबने मिलकर लघुकथा के नाम का केक काट कर जन्मदिन मनाया महिला मित्रों ने मगंल गीत गाकर लघुकथा की लंबी आयु के लिए आशीर्वाद दिए। लघुकथा में भी अब एक नया जोश भर आया था वह उछल कर मंच पर पहुंची और उपस्थित लोगों को अपनी सूक्ष्मता, चंचलता ओर शब्दों की भव्यता से मंत्र मुग्ध कर दिया।
लघुकथा के अनेकों रूप देखकर सभागृह में उपस्थित लोग आश्चर्य चकित थे वो जिसे अभी तक छोटी सी रचना समझ कर तिरष्कृत किया करते थे वो तो अनेक रूपों से सजी रंगों से रंगी चुलबुली मनभावन, तीखी स्पष्ट एवं सटीक विधा थी। जो वर्ष प्रतिवर्ष यूवा होने के साथ अपने रूप लावण्य, एवं गुणों से अबतक सब का मनमोह चुकी थी।


संजय आरजू "बड़ौतवी"




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