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Sanjay Arjoo

Abstract Classics Inspirational

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Sanjay Arjoo

Abstract Classics Inspirational

गुठली

गुठली

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गुठली

आज पिताजी को गुजरे छः महीने हो चले थे पिताजी अपने बनाए जिस  घर में  रहते थे, उनके जाने के बाद अब  घर खाली हो चला था । रिश्तेदारों ने  पहले ही चर्चा कर राधा और उसकी बड़ी बहन मीरा को बता दिया दिया था कि वो इस रविवार को आ जाएं तो उनके पिता की चल अचल संपति का निर्णय भी कर  लिए जाय । पूरी संपत्ति दोनों बेटियों में समय रहते बंट जाय तो आगे का झंझट खत्म हो जाएगा। दोनों बहने और उनके पति भी इस बात पर सहमत थे।
रविवार की सुबह दोनों  बहने सपरिवार अपनी कार से पिताजी के  घर  पहुंची, घर पर छोटी बुआ जी पहले से ही आई हुई थी । दोनों बहनों को एक साथ देखा बुआ जी खुश हो गई ।

बुआजी अंदर गईं  कुछ आम प्लेट में रख लाई और बोली  "राधा और मीरा  लो जब तक बाकी लोग आएं तुम सब लोग आम खाओ"।
आम देखते ही मीरा उछल पड़ी"वाह आम! फिर तो गुठली मेरी" राधा जानती थी की हमेशा की तरह मेरा आज भी आम की गुठली अपने पास ही रखेंगी। मगर आज उसने पूछ ही लिया" बहन तुम हमेशा ही गुठली क्यों मांगती हो,इसे खाने में तो पूरा हाथ गंदा हो जाता है कई बार तो कपड़े भी खराब हो जाते है?
मीरा ने आंखें मटकते हुए कहा" हाथ गंदे होते हैं तो क्या? गुठली के साथ  जो  एक्स्ट्रा आम  मिलता है उसकी खुशी भी तो होती है!"
मीरा का उत्तर सुन राधा चुप हो गई। कुछ ही देर में सभी रिश्तेदार एकत्र हुए और सबसे पहले मां  के जेवर जो पिताजी के पास अभि तक  सुरक्षित रखे थे, उन्हें  बांटने से शुरुवात हुई। तभी मीरा तपाक से गोली"  मां का हार, ये तो मुझे पर बचपन से ही पसंद है, वह तो मैं ही लूंगी " कह कर मीरा  ने सारे समान से भारी वाला हार उठा लिया, बाकी पूरे सोने का वजन  उस  अकेले हार से आधे से भी कम था। ये देख सब राधा की तरफ  प्रश्नवाचक नजरों से देखने लगे ।
राधा ने मुस्कुराते हुए कहा " हां हां दीदी ले लो वैसे भी आपको आम के साथ गुठली लेने की बचपन से आदत है चाहे उसके बदले तुम्हारे हाथ ही गंदे क्यों न हो जाएं।"

संजय आरजू "बड़ौतवी"



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