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निशान्त मिश्र

Tragedy Classics


4.5  

निशान्त मिश्र

Tragedy Classics


किसान की बारिश

किसान की बारिश

15 mins 185 15 mins 185

"सखी आए ना मोरे साँवरिया

सखी आए ना मोरे साँवरिया

मेरी सुनी पडी रे अटरिया"

" अरी, तू तो अभी से कजरी गाने लगी; अभी तो अषाढ़ चढ़ा भी नहीं।"

"तो क्या हुआ? अषाढ़ भी चढ़ने वाला है, और ..."

"हाँ, हाँ, पता है, और कौन आने वाला है।"

दोनों सखियां खिलखिलाकर, ताली बजाकर हंसने लगीं। सहसा, हँसी के समवेत स्वरों में विभेद उत्पन्न हो गया; हँसी दो भागों में विच्छेदित हो गई। एक स्वर हँसने का, और एक रुदन का। अब हँसने का स्वर बंद हो गया है, और रोने का स्वर मुखर हो चला है। ताली बजाने वाले दो हाथ, बहने वाले नयनों के दृगजल पोंछ रहे हैं।

कजरी, निमिया को ढाढस बँधा रही है। अब रुदन का स्थान, सिसकियों ने ले लिया है। डेढ़ साल पहले, यहाँ रोने वाले केवल एक जोड़ी नेत्र ही हुए करते थे - कजरी और निमिया की सास के। अब दो जोड़ी हैं; दो विधवाओं के! एक जोड़ी निमिया के सास के और एक जोड़ी, उसके।

महीने १८ बीत गए हैं, जब निमिया खूब खिलखिलाकर हंसती थी। ये कातिक का महीना था। खेतो में गेहूँ और आलू के साथ टमाटर की बुआई हुई थी। इस बार साहूकार और बैंक का कर्ज़ लगभग २ लाख जा पहुँचा था। पिताजी के जाने बाद, बड़के ही घर का मुखिया था। साल भर हुए, अंग्रेज़ ने आत्महत्या कर ली थी, नीम के पेड़ से लटक से।

अंग्रेज़ का असल नाम विशंभर था, वो स्वयं विश्वंभर बताते थे। खेत के पट्टे में यही लिखा हुआ था। गांव के प्राइमरी के मास्टर रामतीरथ, जिनका शुद्ध नाम रामतीर्थ था, ने उनका यह नाम रखा था। गाँव - देहात में किसी को किसी का शुद्ध नाम न तो पता होता, न उच्चारित ही होता। विवाह में मूँछ मुड़ा के गए थे, तब से ' अंग्रेज़ ' हो गए थे। कर्ज़ बहुत ज्यादा था, बारिश जम के हुई, और मुखिया को बहा ले गई। 

अब बड़के, जिसका मूल नाम बृहस्पति था, परिवार का मुखिया था। फसल को लेकर दिन रात चिंता में गलता रहता, "क्या होगा अगर फसल अच्छी न हुई? ननके को मास्टरी कैसे पढ़ाऊंगा, आखिर उसका आखिरी साल है बी ए का!" कार्तिक की हांड़ कंपा देने वाली रात में वो तब तक मेड़ पर बैठा रहता, जब तक कि खाने का बुलावा लिए ननके उसे साथ न लिवा ले जाता। दोनों भाइयों में अगाध प्रेम था, और संयोग कि जेठानी - देवरानी में भी।

इस घर से कभी खटपट की आवाज न आती। कभी कभी जोगनिया काकी की सिसकियाँ बरामदे से सटे चक्की वाले कमरे से आतीं। अब तक उन्होंने जीवन के ५२ बसंत देख लिए थे, ५१ कहें तो बेहतर होगा; पिछले एक वर्ष से उनके जीवन में पतझड़ ही रहता है।

उस साल, शिशिर कुछ अधिक ही दयावान था, समस्त तुषारापात बड़के पर ही कर गया। आलू और गेहूँ को पाला मार गया। अगले दिन उसी नीम के पेड़ पर एक और ठंडा हो गया शरीर, लटका मिला। बड़के को अब ठंड नहीं लगती। निमिया के खाते में २५ वां बसंत न जुड़ सका।

घर से आने वाली सिसकियों की आवाज़ बढ़ गई थी। अब दो लोगों के रोने की आवाज़ रात के सन्नाटे को चीरती हुई हर किसी को निस्तब्ध कर जाती है। किंतु, यहां कोई उनका दुख बाँटने वाला न था, सिवाय कजरी के। 

अभी पिछले साल ही तो आयी थी कजरी, ननके से ब्याह कर। ननके लाख मना करता रहा कि नौकरी लग जाए तो चाहे जो करना, अभी छोड़ दो। लेकिन उसकी एक न चली। ननके अब १९ का हो चला था। सबने बड़के को बहुत उलाहना दी कि लड़का हाथ से निकल जाएगा, जोगनिया काकी ने भी दबाव बनाया। न चाहते हुए भी, बड़के ने नरेंद्र का ब्याह अपने ननिहाल के मित्र की बहन कुसुम से करा दिया। नरेंद्र मने ननके, और कुसुम यानी कजरी। घर का छोटा होने के कारण नरेन्द्र, ननके कहाता।

कजरी के आने के बाद से घर का वातावरण ही बदल गया। अब काकी भी कभी कभी मुस्कुरा देतीं उसके खिलंदड़पने पर। वो थी ही ऐसी, सावन के झूलों जैसी, सबको अपने साथ बासंती रंग में रंग लेती।

अब तो सन्नाटा और सिसकियाँ ही इस घर की पहचान थे।


बड़के के जाने के बाद से घर की परिस्थितियाँ बहुत बदल गयी थीं। परिवार पुनः मुखिया विहीन हो चला था। अब ननके की बारी थी; मुखिया बनने की।

ये इतना आसान था कि बाप और भाई का सारा कर्ज़ अब ननके को ही चुकाना था। आधे खेत बेच दिए गए, कर्ज़ चुकता न हुआ। अगली फसल से लिए बीज तक को पैसे न थे। ऐसे में बहुओं को मायके से मिले गहने काम आए। गहने इतने ज़्यादा थे कि उन्हें बेचकर सिर्फ बीज ही खरीदे जा सके। खाद इत्यादि के प्रबंध ने कर्ज़ की फसल को और हरा भरा कर दिया।

फसल अच्छी हुई थी, खेत कम हो गया था। बारिश समय से हुई थी, न कम, न ज्यादा। नए मुखिया को अभयदान दे गई थी। पिछली बलि लिए अभी अधिक समय न बीता था।

ननके ख़ुशी ख़ुशी फसल लदवा रहा था।

७ बरस का बचई, स्कूल का नाम अभिमन्यु, दौड़ता हुआ आया, " ननके चाचा, ब़ज़ार से मेरे लिए क्या लाओगे?"

"आज तुम्हारे लिये नये कपड़े लाऊँगा, फल और मिठाई भी लाऊँगा।"

"और गुड़िया - गुड्डा ?"

"हा हा, लड़के गुड़िया - गुड्डा नहीं खेलते।"

"पर अम्मा तो मेरे लिए कपड़े का गुड्डा - गुड़िया बनाती है। तुम मिट्टी का हिलने वाला गुड़िया - गुड्डा ला दो न"

"वो गुड़िया - गुड्डा नहीं प्यारे, बुढ़िया - बुड्ढा होता है।"

ये सुनकर घर के दो चेहरे हँस पड़ते हैं, तीसरे की सिसकियों के साथ सामान्य हो जाते हैं। ये तीसरा चेहरा, काकी का है, जो ५५ वर्ष में ही ८५ की जान पड़ती हैं। उनका बुड्ढा खोए अभी ३ वर्ष पूरे नहीं हुए हैं।

"तुम्हारी साड़ी भी कितनी पुरानी हो गई है, फटने भी लगी है, आज एक साड़ी नई लेता आऊँगा।"

”अरे नही जी..! “ये तो अभी ठीक है..!“आप तो अपने लिये जूते लेते आना कितने पुराने हो गये हैं और फट भी तो गये हैं..!”

"भाभी से पूछ लो, क्या लाना है?"

"उनसे पूछोगे तो मना कर देंगी, अच्छा होगा एक सुंदर साड़ी लेते आना, और अम्मा के लिए एक धोती और दवाई। मेरे लिए कुछ न लाना।"

ननके मंडी पहुँचता है। उसकी मजबूरी है.. वो अपनी फसल की कीमत खुद नहीं लगा सकता। व्यापारी

उसके माल की कीमत अपने हिसाब से तय करते हैं।

"एक साबुन की टिकिया देना, कितने की है?"

"६ रुपए की।"

बगल की दुकान में एक आदमी को साबुन खरीदते देख ननके सोचने लगा कि, "एक साबुन की टिकिया पर भी उसकी कीमत लिखी होती है, एक माचिस की डिब्बी पर भी उसकी कीमत लिखी होती है; लेकिन किसान अपनी फसल की कीमत खु़द तय नहीं कर पाता। क्यों ?"

खैर, फसल बिक जाती है, लेकिन कीमत उसकी सोच के अनुरूप नहीं मिल पाती। माल तौलाई के बाद भुगतान होता है। वो सोचता है.. इसमें से कर्ज़ चुकाना है, खाद वाले को देना है, मज़दूर को देना है, अरे हाँ, बिजली का बिल भी तो जमा करना है। सारा हिसाब लगाने के बाद कुछ बचता नहीं।

वो चेहरे पर मायूसी ओढ़े घर वापस आ जाता है।

बचई उसे बाहर ही इन्तज़ार करता हुआ मिल जाता है, " चाचा जी..! चाचा जी..!” कहते हुये उससे लिपट जाता है और उत्साह में पूछता है, “हमारे नए कपड़े नहीं ला़ये..?”

ननके –”वो क्या है प्यारे.., कि बाज़ार में अच्छे कपडे़ मिले ही नहीं, दुकानदार कह रहा था - इस बार दिवाली पर अच्छे कपडे़ आयेंगे, तब ले लेंगे..!”

" और बुड्ढा - बुढ़िया?"

"अरे..." ननके के दिमाग़ को एक झटका सा लगा। अपनी उधेड़बुन में वो भूल ही गया था इस बारे में तो।

कजरी समझ जाती है कि फसल कम भाव में बिकी है, वो बचई को समझा कर अन्दर भेज देती है।

ननके –”अरे हाँ..! “तुम्हारी साड़ी भी नहीं ला पाया..!”

कजरी –”कोई बात नहीं जी, हम बाद में ले लेंगे लेकिन आप अपने जूते तो ले आते..!”

ननके – “अरे वो तो मैं भूल ही गया..!”

पत्नी समझ जाती है, फसल कम भाव में बिकी है, वो बच्चों को समझा कर बाहर भेज देती है।

कजरी पति का मायूस चेहरा और बात करने के तरीके से ही उसकी परेशानी समझ जाती है, लेकिन फिर भी पति को दिलासा देती है; अपनी नम आँखों को साड़ी के पल्लू से छिपाती रसोई की ओर चली जाती है। फिर अगले दिन.. सुबह पूरा परिवार एक नयी उम्मीद, एक नये सपने के साथ, नई फसल की तैयारी के लिये जुट जाता है।


आषाढ़ के बाद कार्तिक ने पुनः दस्तक दी। आलू और गेहूँ बो दिए गए।

सालों साल से यही प्रथा चली आ रही है, कार्तिक में गेहूँ और आलू, ताकि रोटी सब्जी की व्यवस्था बनी रहे और आषाढ़ में धान, और मूंग; दाल भात के लिए। सब्जियों के नाम पर प्याज और टमाटर। अन्य ऋतुओं में; जो सुलभ हो जाए। यही खाने के लिए, और यही बेचने के लिए।

इस बार फसल ने खेत से हुए मुकाबले में बाजी मार ली। कम हुए खेत में , फसल पहले से भी कम हुई।

काकी का रुदन, अब दिनकर और निशा की बाट न जोहता, अनवरत चला करता। इस घर का अब यही संगीत था। वो सदैव ननके के इर्द गिर्द आत्मा बनकर मंडराया करतीं। निमिया उनसे अधिक सतर्क थी, उसने बचई को ननके का अंगरक्षक नियुक्त करते देर न लगाई। कजरी तो चौंक चौंक जाती है, ननके का नाम सुनकर! कहीं से ' ननके ' नाम का स्वर सुनकर वो उसी दिशा में बेतहाशा भाग पड़ती।

ननके नैराश्य के नर्क की ठंडी अग्नि में जल रहा था, कुछ न बोलता था। किसी से मिलता जुलता न था। हर समय सूदखोरों और बैंक वालों के आ धमकने की आहट उसे जब तब सुनाई देती। एक समय गाँव के सबसे मेधावी छात्रों में शुमार ननके का सम्पूर्ण उत्साह तुषार ने हर लिया था।

वो सोचता रहता, " बचई का क्या होगा?" अम्मा, भाभी और कजरी कहाँ जाएँगे? नहीं, नहीं...वो नहीं लटकेगा नीम पर।" आखिर अब वही तो अभिमन्यु का पिता है।

घर, घर न था; श्मशान की काली छाया से ढका लकड़ियों का ढेर था, केवल आहूत अग्नि की आहुति भर।

नैराश्य के इन क्षणों में उसे आशा की एक किरण दिखाई दी। दिल्ली में एक पिज़्ज़ा कंपनी में काम करने के लिए इस्तेहार निकला था। योग्यता - इंटर पास और मोटरसाइकिल चलाने का अनुभव। उसने मन बना लिया था। कजरी से बात की। वो पहले पहल तो तैयार नहीं हुई, कुछ आशंकित भी हुई, लेकिन कोई और विकल्प न देख भारी मन से विदा किया। 

ननके, बी ए पास न कर सका था, किंतु इंटर प्रथम श्रेणी में पास किया था, वो भी गणित से; तब जबकि आस पास कोई गणित का शिक्षक भी न था। १४ किलोमीटर साइकिल से आना जाना उसके लिए हँसी खेल था। हिंदी माध्यम से पढ़ा था, तिस पर भी हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद बिना व्याकरण की अशुद्धियों के करता। इन सब गुणों के बलबूते वो पिज़्ज़ा कंपनी में चयनित होने हेतु आश्वस्त था। दूसरे, वो पहली बार दिल्ली नहीं जा रहा था; पहले भी एक बार, सी आर पी एक की भर्ती के लिए दिल्ली दर्शन कर चुका था। मेडिकल में छँट गया था, वर्णांधता के कारण।

तीसरे दिन ही ननके लौट आया, हाथ में नियुक्ति पत्र लिए हुए। बचई दौड़कर लिपट गया, काकी ने दुलार किया। कजरी और निमिया ने जल छोड़ा। 

"रुपए ९००० मिलेंगे...महीने के!" चहकते हुए ननके बोला। जल्द ही सारा कर्ज़ चुकता कर देंगे।"

उस रात काकी सोई नहीं। उनके मन में क्षण प्रतिक्षण नई नई आशंकाएं जन्म लेतीं।

निमिया और बचई सोने जा चुके थे। 

कजरी और ननके में विरह का पूर्वाभ्यास चल रहा था।

"कब आओगे ?"

"तीन महीने की तनख्वाह जमा कर लूँगा, तब।"

"खेती बारी ?"

"एक बार कर्ज़ चूक जाए, और अंटी में कुछ रुपए बँध जाएँ तो सब दोबारा शुरू करेंगे।"

"ननके अब नरेंद्र के नाम से जाना जाता है, दिल्ली में रहता है, मेट्रो से चलता है, पिज़्ज़ा ब्वॉय कहलाता है। बड़े बड़े घरों में जाता है, अंग्रेज़ी बोलता है!"

पास की लफ़द्दर चाची ने पूरे गांव में फैला दिया इस बात को। लफ़द्दर चाची का ये नाम उनके इसी गुण के कारण पड़ा था; सुनतीं एक, बतातीं दस!

दो महीने ही बीते थे कि नरेंद्र दिल्ली से घर आया। हाथ में मोबाइल, कान में इयरफोन, बचई के लिए नए कपड़े, भाभी के लिए साड़ी, अम्मा के लिए धोती और कजरी के लिए रेडियो और एक मोबाइल।

"कहाँ से लिए ये सब? कुछ बचाए कि नहीं?" ये कजरी की दूसरी प्रतिक्रिया थी। पहली प्रतिक्रिया वही थी जो होनी चाहिए। आज सब बहुत प्रसन्न थे, जी भर रोए। ये ख़ुशी के आँसू थे, प्रतीक्षा के अवसान के आँसू !

"सब किस्त पर लिए हैं", कुल जमा रुपए २०००० कजरी के हाथ पर रखते हुए बोला नरेंद्र।

"किस्त?"

"छोड़ो, तुम नहीं समझोगी, और ज़रूरत भी नहीं है। मैंने सब व्यवस्था कर ली है।"

अगले दिन कर्ज़ का कुछ बोझ हल्का कर आए नरेंद्र ने एक बार अपने सूखे पड़े, आधे बचे खेत की ओर देखा। एक बार को उसे ये मोबाइल, इयरफोन सब फ़ालतू लगने लगे। उसके पिता और बड़े भाई के बलिदान की यादें इस मिट्टी के कण कण में समाई थीं। एक बार को ये जमीन हत्यारन लगी उसे, दूसरे ही क्षण उसने आकाश को कोसा। फिर थोड़ी देर फूट फूट के रोता रहा। जिस ज़मीन को अपने खून और पसीने से सींचा उसके पुरखों ने, उसी ज़मीन को छोड़कर आज कितनी दूर जाना पड़ा उसे। हाय रे भाग्य! इतना मेहरबान न होना था तुझे!!

तीन दिन बाद ही नरेंद्र वापस दिल्ली चला गया। 

जब तब घर वालों से बात कर लेता। एक दिन ऑर्डर देर से पहुँचाने पर उसे खूब बेइज्जत किया गया, नौकरी से निकालने की धमकी भी मिली। उसने 'जाम' का हवाला भी दिया, किसी ने एक न सुनी। किसी तरह नौकरी बची।

कजरी को पता चला, तो रात उसने एक ही गीत बार बार बजाकर काटी थी,

"जौन सहबवा के सैंया मोरे नौकर, रे बलमा मोरे नौकर,

गोली दागै घायल कर जाए रे, रेलिया बैरन...."

उसने घर में किसी को नहीं बताया था कि दिन की नौकरी के बाद वो रात में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी भी करता है। एक भली मेमसाब ने उसको ये नौकरी दिलाई थी; सुबह सुबह उनके कुत्ते को मॉर्निंग वाक करा दिया करता। दिन में पिज़्ज़ा खाकर गुज़ारा करता, रात में कोई कुछ न कुछ दे ही देता। कुल मिलाकर पहले से अच्छी कट रही थी। कुछ सालता था तो बस घर की याद!

"चार पैसे कमाने मैं आया शहर, गाँव मेरा मुझे याद आता रहा..." गीत उसे दिन और रात में जगाए रखता।।

उसकी आय इतनी बढ़ी, कि वो दाने दाने को मोहताज़ हो गया। उसकी गाँव कि मिट्टी से उसका ये विरह, काल को सहन न हुआ; देश में महामारी फैल गई। उसकी पिज़्ज़ा कंपनी का एक कर्मचारी उस महामारी की चपेट में आ गया; नतीजतन, पिज़्ज़ा कंपनी को अघोषित काल के लिए बंद कर दिया गया। देश में लॉक डाउन घोषित हो गया। महामारी तेजी से फैल रही थी, उससे कहीं तेजी से पिज़्ज़ा कंपनी की खबर!

सोसायटी वालों ने उसे रखने से मना कर दिया। वो बेरोजगार हो गया, किसी तरह दिल्ली से घर पहुंचा, १४ दिन गांव के बाहर एक पीपल के पेड़ के नीचे सुलाया गया, भूखे प्यासे। 

१५वें दिन घर पहुँचा, तो सबसे लिपट कर खूब रोया। घर वाले तो बस इस बात से संतुष्ट थे कि ननके की दो आँखें, दो हाथ, दो पैर, सही सलामत थे।

घूम फिरकर वहीं ला पटका उसे समय ने, " ले, कर ले अपनी हसरत पूरी, जी भर के देख अपने गाँव को!"

मोबाइल अब किसी काम का नहीं है, उसमें किसी का फोन नहीं आता। कुछ दिन बाद ही सही, ननके ने अपने वर्तमान को स्वीकार कर लिया था। वो मुखिया जो था घर का।

जमा किए रूपयों से कुछ कर्ज़ चुकता किया तो बीज़ और खाद की व्यवस्था हुई। आषाढ़ सिर पे था। अबकी केवल धान बोया गया, मूँग और अन्य फसलों के लिए पैसों की व्यवस्था न हो सकी।

आषाढ़ से पहले जेठ बरसा। यूँ बरसा कि पशु पक्षी त्राहिमाम कर उठे। हलक गीला न होता, समुंदर सोख लिया जाना चाहता था।

बारिश की प्रतीक्षा में, कवि रेडियो पर बजता सुना जाता,

"निंदिया न आए, मेघ न बरसे

दृगज़ल सूखा, सिपिया तरसे !!"

मनुष्य की वेदना देख प्रकृति ऐसी पिघली कि ननके को जड़वत कर दिया। कवि ने न जाने कौन सा राग गाया कि रूठी हुई बारिश ने खेतों को अपने प्रेम से अन्दर तक भिगो डाला। ननके सूख चुका था, अब उसमें जीवन रस लेशमात्र भी शेष न रहा था। बारिश जम के हुई, और एक बार फिर मुखिया को बहा ले गई। अगला पिछला सब कर एक साथ वसूल लिया बारिश ने। अगले दिन उसी नीम के पेड़ से, बारिश से मिट्टी हुए ननके को उतारा गया और प्रकृति के कर्ज़ से मुक्त कर दिया गया। पंचभूत अपने अपने ईष्ट से जा मिले।

कजरी के जीवन में १९ बसंत ही लिखे थे।

ननके इतनी खामोशी से गया कि सदन के दोनों पक्षों में भारी शोर हुआ।

किसी ने कहा, "दिल्ली की हवा लग गई थी, महात्वाकांक्षा ले डूबी।"

एक साहब ने फ़रमाया, " नशे की लत ने आज की युवा पीढ़ी को बर्बाद कर दिया है।"

एक नेताजी ने इसे स्टंट और फ़ैशन की उपाधि से सुशोभित करते हुए स्वयं को धन्य समझा।

कुछ दिन बाद,

१५ अगस्त

गाँव के एकमात्र प्राइमरी विद्यालय में जलसा है। कई लाल नीली बत्तियों से सजे विमान गाँव की कीचड़ हुई सड़कों को सुशोभित कर रहे हैं। नेताजी की एक झलक पाने को जनसमूह उमड़ा जाता है; सिर पे एनक चढ़ाए महिला पत्रकारों को पहली बार साक्षात् देख कर बौराए नवयुवक, और महिलायें सब कसम धंधा छोड़ नेताजी का भाषण शुरू होने की बाट जोह रहे हैं। कविश्रेष्ठ अपना परिचय अपने शब्दों से देते हुए कविता पाठ करते हैं,

"अंतस की पीड़ा को पीकर, पग पग मेड़ों पर चलता है !

स्वाति की आशा लिए सीप, क्षण क्षण अंबुज को तकता है !!"

कोई कविता का जानकार धीरे से कविवर के कानों में कहता है, "इस बार सूखे से नहीं, बारिश से मरे हैं लोग!"

"अरे छोड़ो, ये गँवार क्या जानें कविता!" 

दोनों मंद मंद मुस्काते हैं।

नेताजी कुछ उद्घोषणाएँ करते हैं, विद्यालय का नामकरण 'नरेंद्रनाथ विद्या मंदिर ' करके, पीड़ित के परिवार को दस हज़ार जैसी कभी न चुकने वाली भारी भरकम राशि देने का ऐलान करते हैं, फिर निकटस्थ एयरपोर्ट की ओर कूच कर जाते हैं। 

उसी दिन, कहीं किसी महानगर में, कैमरे के सामने शहरी महिलायें हाथ में बास्केट लेकर अपना मेकअप ठीक करती, मुस्कराती हुई कहती हैं... "सब्जी के दाम बहुत बढ़ गये हैं, हमारी रसोई का बजट ही बिगड़ गया।"

कजरी, अब 'कजरी' नहीं गाती। परिवार में अब भी केवल दो जोड़ी आँखें ही रोती हैं, एक जोड़ी कजरी की, एक जोड़ी निमिया की। काकी तो ननके के जाने की खबर सुनते ही उसके पीछे भाग पड़ी थीं, जोगनिया का चोला उतार कर। दोनों अब स्वर्ग, नर्क जहां रहते हैं, साथ हैं। 

बचई कहीं से राष्ट्रीय ध्वज पा गया है। वो घर में एक ही शेष पुरुष है। वो 'अभिमन्यु' बन कर इस चक्रव्यूह में जाए या कि बचई बन कर ही मुक्ति के द्वार तक पहुँचे, उसकी ऐसी ही परिणति लगभग तय है। अब उसकी बारी है....मुखिया बनने की, और उस पर बारिश की पूरी नज़र है।

एक ओर रेडियो से आवाज़ आ रही है,

" इंसाफ की डगर पे, बच्चों दिखाओ चल के,

ये देश है तुम्हारा, नेता तुम्हीं हो कल के...!"

दूर, जलसे से आवाज़ आ रही है,

"जो शहीद हुए हैं उनकी,

ज़रा याद करो कुर्बानी..!"


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