कहानी: भूतिया हवेली और बबलू का
कहानी: भूतिया हवेली और बबलू का
कहानी: भूतिया हवेली और बबलू का तमाशा
गाँव के बाहर, खेतों के बीचों-बीच खड़ी वह पुरानी 'लाला जी की हवेली' सालों से बंद पड़ी थी। लोग कहते थे कि वहां रात को घुँघरुओं की छनक और अजीब-अजीब आवाज़ें आती हैं। आर्यन, जिसे भूतों का बड़ा शौक था, अपनी पूरी पलटन के साथ वहां पहुँच गया। रिया, समीक्षा, लकी और, हाँ, हमारा प्यारा बबलू भी साथ था।
बबलू को तो जैसे जबरदस्ती लाया गया हो। वह रास्ते भर बड़बड़ाता रहा, "अरे यार आर्यन, काहे को अपनी जान मुसीबत में डाल रहे हो? रात को तो मुझे अपने बिस्तर में सोना चाहिए था, यहाँ भूतों के साथ कबड्डी खेलने आ गए!"
जैसे ही उन्होंने हवेली के भारी-भरकम, ज़ंग लगे दरवाज़े को धक्का दिया, एक तेज़ चरचराहट की आवाज़ हुई, जैसे कोई सदियों पुरानी नींद से जागा हो। अंदर हर तरफ धूल-मिट्टी और मकड़ी के जाले थे। हवा में सीलन और पुरानी लकड़ियों की अजीब-सी गंध थी, जो गाँव की याद दिलाती थी।
लकी ने अपनी टॉर्च जलाई और चारों तरफ घुमाई। दीवारें काली पड़ चुकी थीं और कहीं-कहीं से चूना झड़ रहा था। समीक्षा ने सहमकर आर्यन का हाथ पकड़ लिया। तभी एक कोठरी से चूहे के भागने की आवाज़ आई और बबलू उछलकर लकी के ऊपर चढ़ गया! "अरे बाप रे! भूत! भूत!" वह चिल्लाया।
सब उसकी बेवकूफी पर हँस पड़े। रिया ने कहा, "बबलू, शांत रहो! यह बस एक चूहा था।"
वे आगे बढ़े। हवेली बहुत बड़ी थी। हर कमरे में अंधेरा पसरा था। बबलू तो बार-बार पीछे मुड़कर देख रहा था। उसे लग रहा था कि कोई उसके पीछे चल रहा है। अचानक, उसे अपनी गर्दन पर ठंडी हवा का झोंका महसूस हुआ। वह थर-थर कांपने लगा।
"अरे भाई, कोई है क्या यहाँ?" उसने डरते-डरते पूछा। कोई जवाब नहीं आया, बस उसकी आवाज़ दीवार से टकराकर वापस आ गई।
वे लोग ऊपर की मंज़िल पर गए। वहां एक बड़ा-सा कमरा था, जिसके बीचों-बीच एक पुराना झूला लटका हुआ था। टॉर्च की रोशनी पड़ते ही वह झूला धीरे-धीरे हिलने लगा। यह देखकर सबके रोंगटे खड़े हो गए।
"यह... यह अपने आप कैसे हिल रहा है?" समीक्षा ने कांपती आवाज़ में पूछा।
तभी, कमरे के कोने से एक औरत की रोने की आवाज़ आई। वह आवाज़ इतनी दर्दनाक थी कि कलेजा फट जाए। सब ठिठक कर रह गए।
"अरे मोरियो! अब तो पक्का भूत है!" बबलू की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। वह उलटे पांव भागने लगा, लेकिन दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।
रोने की आवाज़ तेज़ होती जा रही थी। तभी, वह झूला ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगा और उस पर एक साया नज़र आया। वह एक औरत थी, जिसके बाल बिखरे हुए थे और चेहरा भयानक था।
"तुम यहाँ क्यों आए हो?" उसने गुस्से से पूछा। उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी गूंज थी।
आर्यन ने हिम्मत करके कहा, "हम... हम बस यह हवेली देखना चाहते थे।"
"तुमने मेरी नींद खराब की है!" वह औरत चिल्लाई और उसकी आँखें लाल हो गईं।
बबलू तो जैसे पत्थर का हो गया हो। वह कुछ बोल ही नहीं पा रहा था। तभी, उसे एक तरकीब सूझी। उसने अपनी जेब से एक डिब्बी निकाली और उसमें से कुछ गुड़ निकालकर उस औरत की तरफ फेंक दिया।
"अरे भूतनी जी, यह गुड़ खा लो! गाँव का असली गुड़ है, बड़ा मीठा होता है।" बबलू ने हकलाते हुए कहा।
सब उसकी बेवकूफी पर सन्न रह गए। लेकिन, वह औरत रुक गई। उसने वह गुड़ उठाया और खाने लगी। "वाह! यह गुड़ तो बड़ा स्वादिष्ट है!" वह बोली, उसकी आवाज़ अब शांत हो गई थी।
सबने राहत की सांस ली। बबलू ने फिर अपनी डिब्बी निकाली और गुड़ के साथ-साथ कुछ मूंगफली भी उस औरत को दी। वह औरत तो जैसे बबलू की दोस्त बन गई हो। उसने बताया कि वह कोई भूतनी नहीं है, बल्कि इस हवेली की पुरानी मालकिन है, जो सदियों से अकेली रहती है। उसे बस किसी के साथ बात करनी थी।
सबने उस औरत के साथ खूब बातें की। बबलू ने उसे गाँव की मज़ेदार कहानियाँ सुनाईं, जिससे वह औरत खूब हँसी। उसने सबको हवेली के पुराने किस्से सुनाए और अपनी कीमती चीज़ें भी दिखाईं।
सुबह होने तक, वे सब अच्छे दोस्त बन चुके थे। जब वे हवेली से बाहर निकले, तो उन्हें लग रहा था कि उन्होंने एक बड़ा साहसिक काम किया है। बबलू तो अब खुद को भूत-विशेषज्ञ मानने लगा था।
"देखा! मैंने कहा था न, भूतों को भी गुड़ और मूंगफली पसंद होती है!" उसने सीना फुलाकर कहा।
सब उसकी बात पर हँस पड़े। गाँव की ताज़ा हवा और अपनों का साथ पाकर उनका डर गायब हो चुका था। यह रात उनकी ज़िंदगी की सबसे यादगार रातों में से एक थी।
सुखविंदर की कलम से:
"डर के आगे जीत है, और बबलू जैसे दोस्त के साथ हर डर कॉमेडी है। असली मज़ा तो अपनों के साथ में

