सुखविंदर के बापू का पास्ट और प्रेजेंट
सुखविंदर के बापू का पास्ट और प्रेजेंट
ज़िंदगी की बिसात पर कुछ लम्हे ऐसे आते हैं जब इंसान को लगता है कि सब खत्म हो गया। एक वक्त था जब हमारे घर के आंगन में खुशियाँ नहीं, दुखों का कोहरा छाया था। दुखों का यह सिलसिला तब शुरू हुआ जब बापू ने अकेले अपने दम पर दादी-दादा की सेवा की और उन्हें संभाला, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। दादी-दादा के जाने के बाद दुखों का वो पहाड़ सीधा हमारे पूरे परिवार पर आ टूटा। हम बच्चे, भाई-बहन और माँ—सब के सब उस आग में झुलसने लगे। मौत दरवाजे की चौखट तक आकर खड़ी हो गई थी। वह मंजर आज भी याद आता है तो रूह कांप जाती है। हमारी बरसों की मेहनत, वो सब कुछ जिसे बापू ने खून-पसीने से सींचा था, एक झटके में रेत की तरह हाथों से फिसलकर बिक गया। हम आसमान से सीधा ज़मीन की धूल पर आ गिरे थे। मैं तब बहुत छोटा था, बस अपनी आँखों से अपनों को बिखरते देख रहा था। पर कुदरत का इम्तिहान अभी बाकी था। उसी टूटे हुए वक्त में शरीर ने दगा दे दी और मेरी आँखों के आगे एक गहरा काला अंधेरा छा गया। मुझे दिखाई देना बंद हो गया था। तब वही लोग, जो खुद को हमारा करीबी कहते थे, असल में अंदर ही अंदर खुश हो रहे थे। वे तंज कसते थे, "अब सुखविंदर का कुछ नहीं बनेगा, इसकी तो किस्मत ही फूट गई... यह पूरा परिवार अब कभी उठ नहीं पाएगा।" वे हमारी बर्बादी का जश्न मना रहे थे। पर उन्हें हमारे बापू के फौलादी इरादों का अंदाज़ा नहीं था। जहाँ लोग हार मान लेते हैं, वहाँ मेरे बापू अडिग खड़े रहे। उन्होंने अपनी जान की बाजी लगाकर हमें मौत के मुँह से बाहर निकाला। हर मुसीबत को अपने सीने पर झेला ताकि हम बच्चे सुरक्षित रह सकें। उन्हीं की तपस्या का फल है कि आज हम पाँचों का परिवार एक साथ खड़ा है। आज हमने शून्य से फिर एक नई सल्तनत खड़ी की है। जो कल कम था, आज खुदा के करम से उससे कहीं ज्यादा है। पर सबसे बड़ी जीत यह है कि उन जलने वाले लोगों को आज भी खबर तक नहीं कि मैं कहाँ हूँ और क्या कर रहा हूँ। मेरी खामोशी ही मेरा सबसे बड़ा जवाब है। मैं चुपचाप अपनी मंजिलें फतह कर रहा हूँ और वो लोग आज भी मुझे वही पुराना और बेबस समझकर अपनी छोटी सोच में खुश हो रहे हैं। उन्हें अंदाज़ा भी नहीं कि जिस सुखविंदर को वो मरा हुआ समझ रहे थे, वो आज अपनी कलम से इतिहास लिख रहा है। यह संघर्ष आज भी थमा नहीं है। अगर आप मेरी कलम के एक अलग जज्बात, जिसमें रोमांस और दर्द की एक नई दास्तान है, उसे महसूस करना चाहते हैं—तो आप Pocket FM पर मेरी कहानी "हादसा जो इश्क बन गया" सुन सकते हैं। वह एक बिल्कुल अलग दुनिया है, आपकी मर्जी हो तो सुनिए, वरना मेरी यह खामोश जंग तो मेरी आखिरी सांस तक जारी रहेगी। याद रखना, भीड़ में चलने वाले गधे कभी रेस नहीं जीता करते... ये ऊँचे मुकाम और कठिन रास्ते तो सिर्फ जिद्दी शेरों के लिए बने होते हैं। लिखत: सुखविंदर की कलम से
