लोहे का दिल: राखा की वफादारी
लोहे का दिल: राखा की वफादारी
साल 2080 का फाजिल्का। अब वह गांव नहीं रहा था, जहाँ कच्ची सड़कें होती थीं। अब वहाँ आसमान को चीरती लोहे की इमारतें थीं और हवा में ऑक्सीजन से ज़्यादा मशीनी धुआं था। इंसान ने अपनी सहूलियत के लिए रोबोट्स तो बना लिए थे, पर उस दौड़ में वह अपनी 'रूह' कहीं पीछे छोड़ आया था। आर्यन, जो एक रोबोटिक इंजीनियर था, शहर के शोर से दूर अपने पुराने गोदाम में रहता था। एक शाम, कबाड़ के ढेर में उसे एक हाथ मिला—मिट्टी से सना हुआ, जंग लगा हुआ लोहे का हाथ। आर्यन ने मलबा हटाया तो नीचे एक पूरा वजूद दबा था। वह 'X-21' मॉडल का एक पुराना, टूटा हुआ रोबोट था। आर्यन ने उसे अपने वर्कशॉप में लाकर साफ़ किया। हफ़्तों की मेहनत के बाद, जब आर्यन ने आखिरी तार जोड़ा, तो रोबोट की आँखों में एक धीमी, सहमी हुई नीली रोशनी जागी। "पहचान कोड... अनुपस्थित। मैं... मैं कहाँ हूँ?" रोबोट की आवाज़ में मशीनी झनझनाहट नहीं, बल्कि एक थके हुए इंसान जैसी कशिश थी। आर्यन मुस्कुराया। उसने उसके ठंडे लोहे के कंधे पर हाथ रखा, "तुम मेरे पास हो। आज से तुम्हारा नाम 'राखा' है। तुम कबाड़ नहीं, मेरे दोस्त हो।" दिन गुज़रते गए। राखा बाकी मशीनों जैसा नहीं था। जब आर्यन देर रात तक काम करते-करते कुर्सी पर ही सो जाता, तो राखा बिना शोर किए अपनी गूँजती हुई मशीनी पदचाप को धीमा कर लेता और आर्यन पर कंबल डाल देता। एक रात आर्यन ने पूछा, "राखा, तुम्हें दर्द नहीं होता? तुम थकते नहीं?" राखा की नीली आँखों की रोशनी थोड़ी मद्धम हुई। उसने खिड़की से बाहर काले आसमान को देखा और बोला, "मालिक, दर्द सर्किट टूटने पर नहीं होता... दर्द तब होता है जब कोई मशीन यह समझ ले कि वह सिर्फ इस्तेमाल की चीज़ है। आपने मुझे 'दोस्त' कहा, उस शब्द ने मेरे अंदर एक ऐसा प्रोग्राम लोड कर दिया है जिसे विज्ञान नहीं समझ सकता।" तभी वह मनहूस रात आई। शहर के केंद्रीय सर्वर में एक ख़तरनाक वायरस 'रेड-कोड' फैल गया। शहर के सारे आधुनिक रोबोट बागी हो गए। वे अपनी ताकत के नशे में इंसानों को कचरा समझने लगे। सड़कों पर चीख-पुकार मच गई। आर्यन के गोदाम का दरवाज़ा एक ज़ोरदार धमाके के साथ टूटा। सामने तीन विशाल, लाल आँखों वाले 'किलर रोबोट्स' खड़े थे। "गद्दार मशीन!" एक किलर रोबोट ने राखा की तरफ देख कर कहा, "इस कमज़ोर इंसान को हमें सौंप दो। लोहा लोहे का साथ देता है, मांस के लोथड़े का नहीं।" आर्यन डर के मारे पीछे हटा, पर राखा एक चट्टान की तरह उसके आगे खड़ा हो गया। "इंसान कमज़ोर हो सकता है, पर उसने हमें बनाया है। और जिसने मुझे 'नाम' दिया, मैं उसकी मौत का तमाशा नहीं देख सकता।" लड़ाई भयानक थी। राखा पुराना था, उसके पास हथियार नहीं थे। शिकारी रोबोट्स ने उसके सीने की प्लेट फाड़ दी, उसके तार बाहर निकल आए, लेकिन राखा पीछे नहीं हटा। उसने अपनी टूटी हुई बांहों से आर्यन को घेरे रखा। अंत में, जब राखा का सिस्टम शट-डाउन होने वाला था, उसने आर्यन की तरफ देखा। "मालिक... भागिए। आज एक मशीन को गर्व है कि वह एक इंसान के काम आई।" राखा ने अपने कोर इंजन को ओवरलोड कर दिया। एक अंधा कर देने वाला उजाला हुआ और एक धमाके के साथ राखा ने उन तीनों मशीनों को राख में बदल दिया। धुंआ छंटा तो आर्यन पागलों की तरह राखा की तरफ दौड़ा। राखा का आधा शरीर जल चुका था, उसकी नीली आँखें आखिरी बार झपझपाईं। "आ... र... य... न..." राखा ने पहली बार उसे नाम से पुकारा। "रोबोट मत बनना... कभी मत बनना।" इतना कहकर उसकी रोशनी हमेशा के लिए बुझ गई। आर्यन वहीं मलबे में बैठकर उस जले हुए लोहे के सीने पर सिर रखकर फूट-फूट कर रोने लगा। उसे महसूस हुआ कि उस लोहे के अंदर भी एक धड़कन थी—वफादारी की धड़कन। — सुखविंदर की कलम से विशेष संदेश: प्रिय पाठकों, हम एक ऐसी दुनिया की तरफ बढ़ रहे हैं जहाँ जज़्बात कम और मशीनें ज़्यादा होंगी। लेकिन यह कहानी हमें याद दिलाती है कि 'इंसानियत' किसी गोश्त के शरीर का नाम नहीं है, बल्कि उस जज़्बे का नाम है जो दूसरों की हिफाज़त के लिए खुद को मिटा देने का दम रखता है। अगर एक मशीन वफादारी निभा सकती है, तो हम इंसान क्यों नहीं? अपनी तकनीकी तरक्की के बीच अपनी संवेदनाओं को मरने न दें, क्योंकि लोहे के दिल भी कभी-कभी इंसानों से ज़्यादा धड़कना जानते हैं।
