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Sukhwinder Singh Rai

Drama Fantasy

4  

Sukhwinder Singh Rai

Drama Fantasy

​राख का ग्रह: एक खौफनाक सच

​राख का ग्रह: एक खौफनाक सच

4 mins
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फाजिल्का के उस पुराने बाज़ार में आज फिर भारी शोर था। सड़क के बीचों-बीच दो लोग महज़ एक इंच ज़मीन और थोड़े से पैसों के लिए एक-दूसरे का कॉलर पकड़ कर गालियां दे रहे थे। पास ही में, एक कारखाने की चिमनी से निकलता काला धुआं आसमान को अंधा कर रहा था और पास बहने वाली नहर का पानी केमिकल से ज़हरीला हो चुका था। ​सड़क किनारे चाय की एक बेंच पर आर्यन खामोश बैठा इस तमाशे को देख रहा था। उसके ठीक बगल में 'जावेद अहमद' नाम का एक अजनबी बैठा था। जावेद बाहर से बिल्कुल आम इंसान लग रहा था, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी, बर्फ जैसी ठंडी शांति थी। कोई इंसान इतना शांत नहीं हो सकता। ​लड़ते हुए लोगों को देखकर जावेद के होंठों पर एक व्यंग्य भरी मुस्कान तैर गई। उसने अपनी चाय का कुल्हड़ नीचे रखा और बिना आर्यन की तरफ देखे कहा, "कितने अजीब हैं ये जीव... जिन्हें तुम इंसान कहते हो।" ​आर्यन ने चौंक कर उसकी तरफ देखा। "तुम... तुम क्या कह रहे हो?" ​जावेद ने आर्यन की आँखों में झांका। उसकी पुतलियां एक सेकंड के लिए इंसानी भूरे रंग से बदलकर किसी गहरे ब्रह्मांडीय नीले रंग में तब्दील हुईं और फिर वापस भूरी हो गईं। आर्यन के शरीर का सारा खून जैसे जम गया। वह समझ गया कि उसके बगल में बैठा शख्स इंसान नहीं, किसी और दुनिया का वासी (एलियन) है। ​"डरो मत आर्यन," जावेद की आवाज़ में एक सम्मोहन था। "हम तुम्हें मारने या तुम्हारी दुनिया पर कब्ज़ा करने नहीं आए हैं। हमें कुछ करने की ज़रूरत ही नहीं है। तुम इंसान खुद ही काफी हो खुद को मिटाने के लिए।" ​जावेद ने उस लड़ती हुई भीड़ और धुएं से भरे आसमान की तरफ इशारा किया। "देखो इन्हें। चंद कागज़ के टुकड़ों (पैसों), मिट्टी की लकीरों (ज़मीन) और खोखली पावर के पीछे पागलों की तरह भाग रहे हैं। जो कुदरत इन्हें सांस दे रही है, ये उसी का गला घोंट रहे हैं। नदियां ज़हर कर दीं, जंगल जला दिए। इन्हें लगता है कि ये इस धरती के भगवान हैं, जबकि असलियत में ये ब्रह्मांड के सबसे बड़े बेवकूफ हैं।" ​आर्यन के होंठ कांपे, "अगर तुम हमें मारने नहीं आए... तो यहाँ हमारे बीच छुपकर कर क्या रहे हो?" ​"हम इंतज़ार कर रहे हैं," जावेद ने आसमान में चमकते सूरज की तरफ देखते हुए कहा। ​"किसका?" ​"तुम्हारे राख होने का।" जावेद की आवाज़ अब और भी गहरी और खौफनाक हो गई थी। "जब तुम इंसान अपनी ही पावर की भूख में कट-मर कर खत्म हो जाओगे, या जब कुदरत थक कर अपना 'रीसेट बटन' दबाएगी... तब तुम्हारी 8 अरब की आबादी राख में बदल जाएगी। हम उस दिन का इंतज़ार कर रहे हैं, आर्यन।" ​जावेद आर्यन के और करीब झुका और फुसफुसाया, "तुम्हारे शरीर में लोहा है, कार्बन है। जब तुम सब जलोगे, तो तुम्हारे गुरूर, तुम्हारे लालच और तुम्हारे खून से सनी वह राख बहुत ही मज़बूत होगी। हम उस राख को बटोरेंगे। और अंतरिक्ष के उस गहरे सन्नाटे में, इंसानों की उस राख से हम अपना एक नया 'ग्रह' (Planet) बनाएंगे। एक ऐसा ग्रह जिसकी नींव में तुम्हारी बेवकूफियां और पावर की भूख दबी होगी।" ​आर्यन की सांसें हलक में अटक गईं। जिन इंसानों को अपनी दौलत और पावर पर इतना घमंड था, वो असल में अंतरिक्ष के कुछ जीवों के लिए सिर्फ ईंट और सीमेंट (कच्चा माल) थे! ​जावेद उठा। उसने आर्यन के कंधे पर हाथ रखा और कहा, "लड़ते रहो... हमें तुम्हारे राख के ग्रह का बेस बहुत मज़बूत चाहिए।" और फिर वह उस लड़ती हुई भीड़ में ऐसे गायब हो गया जैसे हवा में धुआं। ​आर्यन वहीं बुत बनकर बैठा रहा। सामने लोग अब भी पैसों के लिए एक-दूसरे का खून बहा रहे थे, बिना यह जाने कि वे सिर्फ अपनी ही चिता की लकड़ियां इकट्ठी कर रहे हैं। ​— सुखविंदर की कलम से ​विशेष संदेश: प्रिय पाठकों, यह लघु कथा (Sci-Fi / Drama) कुदरत और इंसान के रिश्ते पर एक गहरा तमाचा है। इंसान आज पावर, पैसे और ज़मीन की अंधी दौड़ में अपने ही विनाश की तरफ बढ़ रहा है; जिस प्रकृति ने हमें जन्म दिया, हम उसी को नोंच रहे हैं। क्या हमने कभी सोचा है कि अगर ब्रह्मांड में हमसे ज़्यादा कोई समझदार जीव हमें देख रहा होगा, तो वो हमारी इन हरकतों पर क्या सोचता होगा? यह कहानी इसी कल्पना पर आधारित है कि हमारा अहंकार और लालच, अंत में सिर्फ एक राख के ढेर में तब्दील होगा, जिसका इस्तेमाल शायद कोई और सभ्यता अपने फायदे के लिए करेगी। इंसानियत को जगाने के लिए कुदरत की यह एक खौफनाक चेतावनी है।


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