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Sukhwinder Singh Rai

Drama Inspirational

4  

Sukhwinder Singh Rai

Drama Inspirational

​अनकहा प्रायश्चित

​अनकहा प्रायश्चित

3 mins
7

शहर के उस मशहूर 7-स्टार होटल की लॉबी में आज जश्न का माहौल था। कांच की दीवारों से छनकर आती रोशनी आर्यन के चेहरे पर पड़ रही थी। महँगे इत्र की खुशबू और ऊँचे तबके के लोगों के बीच खड़ा आर्यन भूल चुका था कि उसके पैरों तले जो मखमली कालीन है, उसकी कीमत उसके बाप ने अपनी आधी उम्र धूप में गला कर चुकाई है। ​तभी, उस शोर के बीच एक खामोशी दाखिल हुई। पुरानी हवाई चप्पलें, घुटनों से घिसी धोती और वह मैली कमीज। रघुवीर सिंह खड़े थे—हाथों में एक पुरानी पोटली लिए। उनके चेहरे की झुर्रियां उस आलीशान होटल की चमक में और भी गहरी लग रही थीं। ​"पुत्तर... आर्यन!" रघुवीर की आवाज़ में एक उम्मीद थी। ​आर्यन के रईस दोस्त रुक गए। "अरे आर्यन, ये कौन है? तेरे गाँव का कोई पुराना मुलाज़िम (नौकर) है क्या?" ​आर्यन का खून सर्द हो गया। उसे लगा जैसे उसकी बरसों की बनाई 'इज्जत' उस मैली कमीज के दागों के नीचे दब रही है। उसने अपनी जड़ें काट दीं और नफरत से बोला— "नहीं भाई, ये कोई रास्ता भटका हुआ मुसाफिर है। ओ बाबा! ये पिछला दरवाजा नहीं है, बाहर निकलो यहाँ से!" ​रघुवीर सिंह के हाथ कांपे। उस पोटली में आर्यन के बचपन के पसंदीदा पेड़े थे, जो अब फर्श पर बिखर गए। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस अपनी धुंधली आँखों से अपने उस 'साहब' बन चुके बेटे को देखा। उन आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि वह मौत जैसी खामोशी थी जो तब होती है जब एक बाप अपनी औलाद के हाथों अपनी रूह का कत्ल होते देखता है। वे चुपचाप मुड़े और अपनी टूटी चप्पलें घसीटते हुए अंधेरे में खो गए। ​वक्त का कहर... ​छह महीने बाद, आर्यन का घमंड चकनाचूर हो गया। कंपनी डूब गई, धोखाधड़ी के केस ने उसे सड़क पर ला खड़ा किया। जिन दोस्तों के सामने उसने बाप को ठुकराया था, उन्होंने ही उसे लात मारकर निकाल दिया। जब पेट की भूख और सन्नाटे ने घेरा, तो उसे अपनी मिट्टी याद आई। ​पागलों की तरह भागता हुआ आर्यन गाँव पहुँचा। घर की चौखट पर रघुवीर सिंह लेटे थे, उनकी साँसें उखड़ रही थीं। आर्यन उनके पैरों में गिरकर दहाड़ें मारने लगा। "बापू! मुझे मार डालो, मैं इंसान नहीं, जानवर हूँ! मैंने अपनी पहचान मिटा दी थी बापू, मुझे माफ़ कर दो!" ​रघुवीर सिंह ने काँपते हाथों से आर्यन का सिर अपनी छाती से लगाया। उन्होंने वही पुरानी पोटली निकाली, जिसमें अब कुछ पुराने मुड़े हुए नोट और ज़मीन के कागज़ थे। ​रघुवीर सिंह की आवाज़ डूब रही थी, "पुत्तर, तूने मुझे 'मुसाफिर' कहा, पर ये बाप तुझे पराया कैसे कर देता? तू शहर की चकाचौंध में हार गया, पर ये देख... मैंने तेरे बचपन से अब तक तेरी हर छोटी जीत और हर बड़ी गलती के लिए पाई-पाई जोड़कर रखी थी। ये ज़मीन तेरे लिए है। तू हार कैसे सकता है? जब तक तेरा बाप ज़िंदा है, तू लावारिस नहीं है।" ​आर्यन ने उन काँपते हाथों को चूमा और अपनी आँखों के आंसुओं से पिता की उस मैली कमीज को धो दिया। उसे समझ आ गया कि दुनिया का सबसे मज़बूत कवच वो महँगा सूट नहीं, बल्कि बाप का वह पुराना लिबास है, जो फटने के बाद भी औलाद के वजूद को ढँक कर रखता है। ​लेखक का संदेश: ​"वक्त की आंधी में अक्सर शाखें अपनी जड़ों को बोझ समझने लगती हैं, पर वे भूल जाती हैं कि जब तूफान आता है, तो सिर्फ वही खड़ा रहता है जिसकी जड़ें (माता-पिता) गहरी होती हैं। पिता की फटी कमीज औलाद के लिए दुनिया की सबसे बड़ी ढाल है।" ​- सुखविंदर की कलम से


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