शीर्षक: नीलाम हुए सपने और एक जाली कागज़
शीर्षक: नीलाम हुए सपने और एक जाली कागज़
रघुवीर सिंह के घर में आज कई सालों बाद चूल्हे पर मीठी खीर उबल रही थी। उनके चेहरे की झुर्रियों में एक अजीब सी चमक थी। उनके बेटे आर्यन को शहर की एक बहुत बड़ी कंपनी में पच्चीस हज़ार महीने की नौकरी जो मिल गई थी। "देख सावित्री, मैंने कहा था ना, मेरा बेटा एक दिन हमारी सारी गरीबी दूर कर देगा। उस एजेंट राकेश ने सच में हमारी किस्मत बदल दी," रघुवीर ने अपनी पत्नी से कहा। लेकिन उस खीर की मिठास के पीछे जो ज़हर घुला था, वो सिर्फ रघुवीर जानता था। आर्यन को यह नौकरी दिलाने के लिए रघुवीर ने अपनी वो दो बीघा ज़मीन गिरवी रख दी थी, जो उसके पुरखों की आखिरी निशानी थी। एजेंट राकेश ने बड़ी मीठी बातों में फँसाकर पूरे दो लाख रुपये ऐंठे थे। राकेश ने कहा था, "चाचा, आजकल बिना पैसे दिए चपरासी की नौकरी नहीं मिलती, मैं तो तुम्हारे बेटे को सीधा साहब बनवा रहा हूँ।" आर्यन ने जब वो चमचमाता 'ऑफर लेटर' अपने हाथ में लिया, तो उसे लगा जैसे उसने दुनिया मुट्ठी में कर ली हो। अगले दिन जब आर्यन शहर की उस गगनचुंबी इमारत के सामने पहुँचा, तो उसका सीना गर्व से चौड़ा था। उसने गेट पर खड़े गार्ड को अपना वो कागज़ दिखाया। गार्ड ने कागज़ देखा और आर्यन को अजीब नज़रों से घूरते हुए अंदर एच.आर (HR) मैनेजर के पास भेज दिया। मैनेजर ने उस कागज़ को हाथ में लिया, एक पल आर्यन को देखा और फिर उस कागज़ को फाड़कर डस्टबिन में फेंक दिया। आर्यन की साँसें अटक गईं, "सर... ये आप क्या कर रहे हैं? मैंने... मेरे पिता ने दो लाख रुपये दिए हैं इस नौकरी के लिए!" मैनेजर की आँखों में तरस आ गया। उसने अपनी कुर्सी से उठकर आर्यन के कंधे पर हाथ रखा और खिड़की के बाहर इशारा करते हुए कहा, "नीचे सड़क पर देख आर्यन। वो जो लड़के धूप में फाइलें लेकर धक्के खा रहे हैं ना? उनमें से किसी के पास बी.टेक की डिग्री है, तो किसी के पास मास्टर्स की। वो लोग दस-दस हज़ार की नौकरी के लिए तरस रहे हैं। तुम्हें क्या लगा? जो नौकरियाँ डिग्रियों से नहीं मिल रहीं, वो कोई दलाल तुम्हें दो लाख में बेच देगा? तुम्हारे पिता ने अपनी उम्र भर की कमाई एक जाली कागज़ के लिए लुटा दी मेरे भाई। यह एक बहुत बड़ा फ्रॉड है जो आजकल तुम जैसे सीधे लोगों को लूट रहा है।" मैनेजर के वो शब्द आर्यन के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतरे। उसका दिमाग सुन्न पड़ गया। वह पागलों की तरह उस एजेंट राकेश का नंबर मिलाने लगा... 'आपके द्वारा डायल किया गया नंबर अमान्य है...' आर्यन धड़ाम से उसी ऑफिस के बाहर फुटपाथ पर बैठ गया। उसके कानों में अपनी माँ की चूड़ियों की खनक गूँजने लगी, जो अब गिरवी रखी जा चुकी थीं। उसे अपने बूढ़े बाप के वो फटे हुए जूते याद आने लगे, जिन्हें पहनकर उन्होंने दो लाख रुपये इकट्ठे किए थे। आर्यन के पास फूट-फूट कर रोने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा था। वह सोच रहा था कि घर जाकर उस बाप को क्या जवाब देगा, जिसने उसके 'झूठे' भविष्य के लिए अपना 'वर्तमान' नीलाम कर दिया था। लेखक का संदेश: "आज के इस दौर में ठगी का बाज़ार इंसानी मजबूरियों और लालच का खून पीकर पनप रहा है। जब पढ़े-लिखे नौजवान डिग्रियाँ लेकर सड़कों पर धक्के खा रहे हैं, तो चंद पैसों में बड़ी नौकरी के सपने देखना सिर्फ खुदकुशी है। कोई भी सच्ची कंपनी नौकरी देने के पैसे नहीं माँगती। अपनी मेहनत पर भरोसा रखो, दलालों की मीठी बातों पर नहीं। क्योंकि दलाल सिर्फ सपने बेचते हैं, और बदले में तुम्हारी पीढ़ियों की कमाई लूट ले जाते हैं। जागृत बनिए, समझदार बनिए।" सुखविंदर की कलम से
