शीर्षक: बेगैरत बेटा
शीर्षक: बेगैरत बेटा
आर्यन: 'लव मैरिज' के गुरूर और पत्नी के प्यार में अंधा हो चुका एक बेगैरत बेटा। अहाना: आर्यन की पसंद (पत्नी), जो अपने रूप और मीठी बातों से घर को दीमक की तरह चाट रही है। रघुवीर और सावित्री: वो बूढ़े माँ-बाप, जो बेटे की खुशी के लिए उसकी हर ज़िद के आगे झुक गए थे। आर्यन ने जब अहाना से 'लव मैरिज' करने की ज़िद पकड़ी थी, तो पूरा समाज खिलाफ था। लेकिन रघुवीर सिंह और सावित्री ने अपने बेटे की खुशी के लिए दुनिया के ताने सहे और अहाना को अपनी बेटी मानकर घर ले आए। उन्होंने सोचा था कि बेटे की पसंद घर को स्वर्ग बना देगी, लेकिन उन्हें क्या पता था कि इस 'लव मैरिज' का नतीजा उनके लिए एक जीता-जागता नरक साबित होगा। शादी के कुछ महीनों बाद ही अहाना ने अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया। उसे रघुवीर की खाँसी से चिढ़ होने लगी और सावित्री के सीधेपन से नफ़रत। अहाना सारा दिन अपने मायके वालों की तारीफों के पुल बाँधती और आर्यन के माँ-बाप को नौकरों से भी बदतर समझती। एक शाम अहाना के मायके वाले घर आए। अहाना ने अपने माता-पिता को मखमली सोफे पर बिठाया और आर्यन उनके लिए महँगे मेवे ला रहा था। उसी वक्त रघुवीर सिंह अपने कमरे से पानी लेने बाहर आए। उनकी पुरानी धोती और लाठी देखकर अहाना की माँ ने मुँह सिकोड़ लिया। अहाना का पारा चढ़ गया। उसने सबके सामने रघुवीर सिंह के हाथ से पानी का गिलास छीन लिया और ज़हर भरे लहजे में बोली, "आपको समझ नहीं आता कि जब मेरे स्टैंडर्ड के मेहमान घर आएं, तो आप बाहर मत निकला कीजिए! मेरी इज़्ज़त का कुछ तो ख्याल रखिए।" रघुवीर के काँपते हाथों से गिलास छूटकर ज़मीन पर गिर गया। उन्होंने अपने बेटे आर्यन की तरफ देखा। उन्हें लगा कि जिस बेटे की 'लव मैरिज' के लिए उन्होंने समाज से दुश्मनी ली थी, वो आज अपनी पत्नी को ज़रूर रोकेगा। लेकिन आर्यन... वह अहाना की नाराज़गी से इतना डरता था, उसके प्यार में इतना अंधा और बेगैरत हो चुका था कि उसने सिर नीचे झुका लिया। वह चुपचाप खड़ा तमाशा देखता रहा। आर्यन की इस खामोशी ने अहाना का हौसला और बढ़ा दिया। उसने दरवाज़े की तरफ उँगली उठाते हुए चीख कर कहा, "बहुत हो गया ये रोज़-रोज़ का ड्रामा! आर्यन, या तो इस घर में ये गँवार लोग रहेंगे या मैं! और अगर तुम कुछ नहीं कह सकते, तो मैं खुद फैसला करती हूँ।" अहाना ने बढ़कर सावित्री का हाथ पकड़ा और उन्हें झटके से दरवाज़े की तरफ धकेल दिया। "निकल जाइए आप दोनों मेरे घर से! मेरी ज़िंदगी में आप लोगों के लिए कोई जगह नहीं है!" बूढ़ी सावित्री दरवाज़े की चौखट से टकरा कर गिर पड़ीं। रघुवीर अपनी पत्नी को उठाने दौड़े। उनकी आँखों से आँसुओं का सैलाब बह निकला। उन्होंने फिर एक बार मुड़कर आर्यन को देखा। आर्यन अब भी बुत बनकर खड़ा था। उसके होंठ सिले हुए थे। उसने अपनी पत्नी को रोकने के लिए एक हाथ तक नहीं बढ़ाया। रघुवीर सिंह ने काँपते हाथों से अपनी पत्नी को उठाया। उनका गला रुंध चुका था। वे भारी आवाज़ में बोले, "चल सावित्री... जिस बेटे को हमने दुनिया से लड़कर ये 'लव' दिया था, आज उसी ने हमें सड़क का 'भिखारी' बना दिया। ये मकान अब हमारा नहीं रहा।" दोनों बूढ़े शरीर अपनी बची-खुची साँसों का बोझ उठाते हुए उस घर से हमेशा के लिए बाहर निकल गए। दरवाज़ा अहाना ने बड़ी बेरहमी से बंद कर दिया, और आर्यन ने अपनी जन्म देने वाली जड़ों को अपनी ही आँखों के सामने कटते हुए चुपचाप देख लिया। लेखक का संदेश: "आजकल समाज में यही चलन बन गया है। 'लव मैरिज' और आज़ादी के नाम पर आजकल की औलादें इतनी अंधी हो जाती हैं कि उन्हें वो झुर्रियाँ और वो पसीना नज़र नहीं आता जिसने उन्हें पाल-पोस कर बड़ा किया। किसी से प्यार करना गलत नहीं है, लेकिन उस प्यार की खातिर अपने माँ-बाप को घर से बेदखल कर देना और पत्नी के जुल्मों पर चुप रहना, एक मर्द की नहीं, एक नामर्द की निशानी है। याद रहे, जो मिट्टी अपनी जड़ों को छोड़ देती है, वो सिर्फ धूल बनकर सड़कों पर उड़ती है।" - सुखविंदर की कलम से

