मोह का ज़हर: एक पिता का पश्चाताप
मोह का ज़हर: एक पिता का पश्चाताप
साठ साल के राजेंद्र ने अपनी जवानी में बहुत भयंकर गरीबी देखी थी। कई रातें भूखे पेट और फटे कपड़ों में गुज़ारी थीं। इसलिए जब उनके घर आर्यन पैदा हुआ, तो उन्होंने कसम खाई कि जो संघर्ष उन्होंने किया है, उसकी परछाई भी बेटे पर नहीं पड़ने देंगे। आर्यन ने जो भी माँगा, राजेंद्र ने अपनी हैसियत से बढ़कर, कर्ज़ा उठाकर भी उसकी हर ख्वाहिश पूरी की। उन्होंने सोचा था कि एक ना एक दिन तो हर इंसान को बूढ़ा होना ही है, और जब आर्यन बड़ा होगा तो उनके बुढ़ापे की लाठी, उनका सबसे बड़ा सहारा बनेगा। लेकिन यह उनकी बहुत बड़ी गलतफहमी निकली। उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि उनकी यही अंधी ममता आर्यन के लिए मीठा ज़हर बन रही है। समय के साथ आर्यन बड़ा हुआ, लेकिन हर ज़िद पूरी होने की आदत ने उसे पूरी तरह बिगाड़ दिया। वो गली के आवारा और क्रिमिनल लड़कों की संगत में बैठने लगा। उसे तरह-तरह के नशे की लत लग गई। देखते ही देखते घर का लाडला मोहल्ले का गुंडा बन गया। लोगों के साथ मार-पीट करना, बाहर चोरियां करना और जब बाहर से पैसे ना मिलें, तो नशे की तलब मिटाने के लिए अपने ही घर में हाथ साफ करना उसकी फितरत बन गई। घर का माहौल नर्क बन चुका था। आज रात के दो बज रहे थे। घर में ऐसा सन्नाटा था जो किसी बड़े तूफान के आने से पहले होता है। राजेंद्र अपनी खाट पर लेटे छत को घूर रहे थे। पास रखी मेज़ पर उनकी दिल की दवाइयों की शीशियाँ कई दिनों से खाली पड़ी थीं, क्योंकि उन्हें खरीदने के लिए घर में एक फूटी कौड़ी नहीं थी। तभी अंदर वाले कमरे से कुछ बर्तन और लोहे की अलमारी खुलने की आवाज़ आई। राजेंद्र की धड़कन तेज़ हो गई। वो काँपते पैरों से उठकर उस कमरे के दरवाज़े तक पहुँचे। अंदर का नज़ारा देखकर उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उनका इकलौता बेटा आर्यन, जिसे उन्होंने बुढ़ापे का सहारा समझकर अपनी सारी उम्र की कमाई देकर पाला था, आज एक चोर की तरह अपनी ही माँ की अलमारी खंगाल रहा था। उसकी आँखें नशे की तलब से लाल थीं और हाथ बुरी तरह काँप रहे थे। तभी आर्यन के हाथ में एक लाल डिब्बी आई—उसकी माँ के सोने के कंगन। राजेंद्र (रुंधे हुए गले और काँपती आवाज़ में): "आर्यन... ये क्या कर रहा है तू? अपनी माँ के गहने? मेरी दवाइयों के लिए घर में सौ रुपये नहीं हैं, और तू ये कंगन... उस ज़हर के लिए बेच देगा?" आर्यन ने झटके से पीछे मुड़कर देखा। चोरी पकड़े जाने की शर्म नहीं, बल्कि उसके चेहरे पर एक गुंडे वाला खौफनाक गुस्सा था। आर्यन (आँखें निकालते हुए, भद्दी आवाज़ में): "चुप कर बुड्ढे! अपना ये फालतू का ज्ञान अपने पास रख। और हाँ, पीछे हट जा वरना धक्का दे दूंगा, हड्डियां टूट जाएंगी तेरी इस उम्र में!" राजेंद्र को ऐसा लगा जैसे किसी ने उनके सीने में खंजर उतार दिया हो। राजेंद्र (आँखों में आँसू भरते हुए): "तुझे क्या कमी रखी थी मैंने आर्यन? खुद फटे कपड़े पहने, पर तुझे सब कुछ दिया। सोचा था बुढ़ापे में तू मेरा सहारा बनेगा, और आज तू बाहर गुंडों के साथ मवालियों की तरह घूमता है, चोरियां करता है! क्या यही दिन देखने के लिए पाला था तुझे?" आर्यन (चिढ़ते हुए, डिब्बी जेब में डालते हुए): "हाँ तो एहसान किया था क्या? पैदा किया है तो शौक तो पूरे करने ही पड़ेंगे ना! मेरा दिमाग मत खा बुड्ढे, मुझे जाने दे वरना आज इसी घर में आग लगा दूंगा!" आर्यन ने राजेंद्र को एक ज़ोर का धक्का दिया। राजेंद्र लड़खड़ाकर दीवार से जा टकराए। आर्यन दरवाज़े की तरफ बढ़ा, लेकिन तभी राजेंद्र ने फुर्ती से बाहर निकलकर दरवाज़ा बाहर से बंद कर दिया और ताला लगा दिया। आर्यन (दरवाज़ा पीटते हुए, बौखलाहट में): "खोल दरवाज़ा बुड्ढे! वरना दरवाज़ा तोड़कर तेरी जान ले लूंगा आज! खोल इसे!" राजेंद्र दरवाज़े के बाहर ज़मीन पर बैठ गए। आज उनके आँसुओं में ममता नहीं, बल्कि एक खौफनाक कठोरता आ गई थी। उन्होंने जेब से अपना फोन निकाला और काँपते हाथों से एक नंबर डायल किया। राजेंद्र (भारी आवाज़ में): "हैलो, पुलिस स्टेशन? इंस्पेक्टर साहब, मेरे घर आ जाइए। एक चोर ने मेरी पत्नी के गहने चुराए हैं... हाँ, वो मेरा अपना बेटा है। उसे यहाँ से ले जाइए, इसके पहले कि मैं खुद इसका गला घोंट दूँ।" अंदर से आर्यन ने जब ये बात सुनी तो उसका नशा जैसे एक झटके में उतर गया। आर्यन (सहमी हुई लेकिन गुस्से भरी आवाज़ में): "तू पागल हो गया है? तू मेरा बाप है या कसाई? अपने ही खून को पुलिस के हवाले कर रहा है? मेरी ज़िंदगी बर्बाद हो जाएगी!" राजेंद्र (कठोर और दर्द भरी आवाज़ में): "तेरी ज़िंदगी तो उसी दिन बर्बाद हो गई थी आर्यन, जब मैंने तेरी हर गलत ज़िद पूरी की थी। मेरे लाड़-प्यार ने एक बेटे को मारकर एक दरिंदे को पैदा किया है। सुन... अगर आज मैंने तुझे ऐसे ही छोड़ दिया, तो तू कल किसी का खून करेगा। मैंने तुझे बिगाड़ा है, अब मैं ही तुझे सुधारूंगा। अगर तुझे इंसान बनाने के लिए मुझे सारी उम्र तेरा सबसे बड़ा दुश्मन भी बनना पड़े ना... तो मुझे वो मंज़ूर है।" कुछ ही देर में सायरन की आवाज़ आई। पुलिस आर्यन को घसीटते हुए ले जा रही थी। राजेंद्र का अंधी ममता वाला मोह आज टूट चुका था, और एक सच्चे पिता ने जन्म ले लिया था। सुखविंदर की कलम से: "मैंने अपने आस-पास ऐसे बहुत से परिवार देखे हैं जहाँ माँ-बाप पहले तो बच्चे को बहुत लाड़-प्यार देते हैं, उसकी हर ज़िद पूरी करते हैं, यह सोचकर कि बुढ़ापे में बच्चा उनका सहारा बनेगा। लेकिन बाद में वही बच्चा उन्हें खून के आँसू रुलाता है। उनका सहारा बनना तो दूर, उनकी बर्बादी का कारण बन जाता है। आजकल का समय बहुत खराब चल रहा है। बाहर नशे और गलत संगत का खौफनाक जाल बिछा है। अपने बच्चों से प्यार ज़रूर कीजिए, लेकिन उस प्यार में उन्हें इतनी आज़ादी मत दीजिए कि वो बर्बाद हो जाएं। बच्चे की गलतियों को समय रहते सुधारना ही असली परवरिश है, वरना बाद में पछताने के अलावा कुछ नहीं बचता।"
