Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Romance Inspirational


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Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Romance Inspirational


काश! काश! काश! (3)...

काश! काश! काश! (3)...

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मैं घर पहुँची थी। मेरे उस सहकर्मी के लिए मेरे मन में आदर एवं विश्वास था। उसी ने मेरे साथ बुरी हरकत की थी। जिससे मेरा हृदय संताप से भरा हुआ था। 

हमारे दोनों बच्चे, नैनी के साथ खेल रहे थे। मैं, प्रतिदिन घर आकर पहले, उन्हें चूमकर प्यार करती थी, मगर आज मैं ऐसा नहीं कर सकी थी। आज मैंने, उन्हें देखकर सिर्फ मुस्कुरा दिया था। फिर मैं, सीधे वॉशरूम में घुस गई थी। पहले गीज़र ऑन किया था फिर, लगातार 15-20 मिनट तक शॉवर लिया था। 

उसने, मेरे हाथों को गंदी भावना से छुआ था। इस कारण मुझे, अत्यंत ग्लानि हो रही थी। मैं कई कई बार, अपने हाथों को साबुन से धो रही थी मगर वह बुरी चुभन, मेरे मन से निकल नहीं पा रही थी।  

वॉशरूम से निकली थी तब भी मैंने बच्चों को, स्वयं भोजन नहीं खिलाया था बल्कि नैनी से कहा था - 

शालू, आज मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा है। बच्चों को, तुम ही खिला दो, और हाँ! आज उन्हें सुला कर ही तुम घर जाना। इससे तुम्हें देर हो जाएगी इसलिए मैं, साहब से, साथ में तुम्हें घर तक छोड़ने कह दूँगी। 

शालू ने कहा था - ठीक है दीदी। 

उस दिन ऋषभ को घर आने में देर हो गई थी। रात 9.30 बजे जब ऋषभ लौटे तो बच्चे सो चुके थे। मैंने कहा - ऋषभ, आज शालू को मैंने रोक रखा था। इसे आप, घर तक छोड़ आओ। 

ऋषभ को थकान के कारण, यह पसंद तो नहीं आया था। तब भी वे शालू को छोड़ कर आये थे। फिर वॉशरूम से आने के बाद ऋषभ, डाइनिंग टेबल पर आये थे। उन्होंने, मेरा उदास होना अनुभव कर लिया था। ऋषभ ने पूछा - 

क्या बात है, तुम आज उदास दिख रही हो?

मैं, अब तक अपने को रोके हुए थी। पति के सामने होने एवं उनके इस प्रश्न से, मेरे हृदय में रुकी हुई गहन दुःख की सरिता, आंखों के माध्यम से बह निकली थी। 

मेरे झर झर बहते अश्रुओं को देख ऋषभ सकते में आ गए थे। वे उठकर मेरे पास आये थे। उन्होंने, मेरे चेहरे को अपनी हथेली में लेने का प्रयास किया तो मैंने, इशारे से उन्हें रोक दिया था। फिर रोते हुए, संध्या से अब तक अपने पर बीती हर बात कह सुनाई थी। 

अंत में मैंने, अपने हाथों को देखते हुए कहा - मुझे समझ नहीं आ रहा है कि इनका, मैं क्या करूँ? मुझे, गंदे हुए इन हाथों से बच्चों एवं आपको छूने तक में अपराध करना सा प्रतीत हो रहा है। 

अब ऋषभ मेरे पास ही कुर्सी खींचकर बैठ गए। उन्होंने अपने हाथों में, मेरे दोनों हाथ ले लिए थे। और मेरी हथेलियों को दबाते हुए 5-7 मिनट तक ख़ामोशी से थामे रखा था। फिर मुझसे कहा था - लो, अब तुम सब भूल जाओ। 

ऋषभ कुछ पल चुप रहे थे, फिर कहा था - उसके बुरे स्पर्श का प्रभाव, तुम्हारे पति के प्रेम भरे स्पर्श से, अब खत्म हो गया है। 

मैंने, उन्हें प्यार से यूँ देखा था जैसे कि उनके द्वारा नाराज़गी न दिखाने पर, उनका आभार, आँखों के माध्यम से प्रकट कर रही हूँ। 

ऋषभ ने थके होने के बावजूद, भोजन स्वयं परोसा था। पहले कुछ कौर उन्होंने, अपने हाथों से मुझे खिलाये थे। तब हम दोनों ने चुप रहकर ही भोजन समाप्त किया था। 

उस दिन रोज की तरह, टीवी पर हमने कुछ नहीं देखा था। हम दोनों बिस्तर पर, सिरहाने से टिक कर पास पास बैठे थे। मेरे मन को ठीक करने के लिए बात ऋषभ ने आरंभ की थी, कहा - 

यह बहुत अच्छी बात है कि तुमने दो बच्चों के होने के बाद, जीवन में पहली बार, ऐसे बेड टच का सामना किया है। वरना तो, हमारे समाज में लड़कियों को इस बुराई से, समान्यतः किशोरवय में ही दो चार होना पड़ जाता है। यह द्योतक है इस बात का कि तुम्हारी परवरिश, तुम्हारे पेरेंट्स ने पूर्ण सजगता के साथ की है। 

मैंने कहा - जी हां, यह बात तो है। हमारे पापा, मम्मी हमेशा यह ध्यान रखते रहे थे कि हम बच्चे, किससे मिलते हैं, कहाँ मिलते हैं और किसी से हमारे मिलने का स्थान एकांत तो नहीं होता है। उन्होंने हमारे स्कूल-कॉलेज जाने आने के दिनों में यह भी ध्यान रखा था कि हम अधिक भीड़-भरे साधनों से जाएं-आयें नहीं। 

तब ऋषभ ने मुझे समझाने की मुद्रा में आते हुए पूछा - 

तुम्हारे मन में उस आदमी के बुरे व्यवहार की टीस मिट सके, इसके लिए तुम्हें कुछ विचारों को, अपने ध्यान में लाना होगा। 

मैंने तब पूछा - कौन सी बातें? कृपया शीघ्र बताइये। मैं, ग्लानि से मरी जा रही हूँ। 

तब ऋषभ ने मुझसे पूछा - तुम यह बताओ कि, जो पाश्चात्य संस्कृति अब, हमारे समाज में भी अपनाई जाने लगी है, जानती हो उसमें क्या होता है?

मैंने प्रश्नात्मक उत्सुकता से ही ऋषभ को देखा था। 

ऋषभ ने तब बताया - 

पाश्चात्य संस्कृति में स्त्री पुरुष भी, मिलने पर परस्पर हाथ मिलाया करते हैं। थोड़े अधिक परिचित अगर होते हैं तो वे, आपस में हल्के से आलिंगन भी किया करते हैं। कुछ अवसर पर उन्हें एक दूसरे के गाल पर चुम्मी लेते हुए भी देखना आम बात होती है। 

मैंने अब कहा - हाँ, हॉलीवुड मूवीज में मैंने, यह देखा है। 

तब ऋषभ ने कहा - ऐसे औपचारिक मिलन में कई बार, वहाँ युवतियों को बेड टच का सामना भी करना पड़ जाता है। अब अगर वो पश्चिमी युवतियाँ, तुम्हारी तरह मानसिक रूप से आहत हो जाएं तो वे हर दिन बाथटब में ही पड़ी रहें। 

मैंने समझ लिया था कि ऋषभ, क्या कहना चाहते हैं। 

ऋषभ ही आगे बोले थे - तुम इस हादसे को अब भूल जाओ। यह तुम्हारी नहीं उस आदमी की समस्या है। 

मैंने कहा - 

मेरा भूलना तो, किसी शुतुरमुर्ग की तरह, रेत में सिर छुपाने जैसा होगा। वह तो मेरे लिए नित दिन की मुसीबत रहेगा। एक ही ऑफिस में काम करते हुए मुझे, नित दिन उसका सामना करना है।

मेरा ध्यान नहीं देना उसके दुस्साहस में बढ़ोतरी का कारण हो जाएगा। इससे वह मुझे ही नहीं अन्य युवतियों को भी अपनी बुरी करतूत के दायरे में लेने लगेगा। आपकी दृष्टि में इसका क्या समाधान है?

तब ऋषभ ने कुछ मिनट विचार करने में लिए, फिर कहा - 

देखो, मैं भी अपने ऑफिस में कुछ लड़कियों एवं महिलाओं के साथ काम करता हूँ। कुछ प्रकरण हमारे कार्यालय में भी इस प्रकार के होते हैं। अतएव जब मैं, तुम्हें काम पर जाते देखता हूँ तो यह जानता हूँ कि कुछ ऐसी बातों का सामना तुम्हें भी करना पड़ता होगा। 

अतएव तुम्हें इस बात का दबाव अपने हृदय पर नहीं रखना चाहिए कि किसी की ऐसी बुरी हरकतों के लिए मैं, तुमसे कुछ कहूँगा। 

मैंने कहा - आपके, यह खुले विचार मैंने अनुभव किये हैं। 

ऋषभ ने इसकी अनसुनी करते हुए आगे कहा - 

दूसरी बात तुम्हें यह भी समझना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति में सभी गुण ख़राब ही नहीं होते हैं। वह हर समय ख़राब काम ही नहीं करता रहता है। 

इसी प्रकरण में तुम देखो वह व्यक्ति बुद्धिमान है जो अपने कार्यालयीन काम बहुत अच्छे से जानता है। यही कारण है कि कई बार तुम, उससे परामर्श करते हुए, अपने दायित्व एवं काम पूरे करती हो। 

मैंने विचारणीय मुद्रा में कहा - हाँ, यह आप सही कह रहे हैं। मगर जब उसने मेरा विश्वास तोड़ दिया तब मुझे क्या करना चाहिए?

ऋषभ ने कहा - 

कल ही तुम, उससे ऑफिस के केंटीन में मिलो। उसके साथ चाय या कॉफी लो। ऐसा करते हुए तुम, उसे, तुमसे क्षमायाचना कर सके यह अवसर दो। कैंटीन में अन्य टेबल पर और भी लोग होंगे। यह ध्यान तुम्हें रखना है कि, अब से एकांत में, उससे कभी नहीं मिलना है।

मैंने सहमति में सिर हिलाते हुए पूछा - अगर वह क्षमायाचना करता है तो मुझे क्या कहना चाहिए। 

ऋषभ ने कहा - तब तुम्हें, उससे यह कहना है कि 

“मैं, यह मानते हुए कि मेरे साथ की गई घिनौनी हरकत, आपकी किसी भी नारी के साथ अंतिम बुरी करतूत है मैं, आपको क्षमा करती हूँ। आपको ध्यान रखना है कि आगे कभी किसी भी सहकर्मी या अन्य युवती को तुमसे ऐसी कोई परेशानी नहीं होना चाहिए”।  

मैंने कहा - 

अभी तो उस पर यह दबाव है कि मैं उसकी शिकायत एचआर में कर सकती हूँ इस कारण वह सहमत कर लेगा। मगर इस बात की क्या गारंटी है कि कुछ समय गुजरने पर, भविष्य में कभी ऐसी कामुकता, अपने पर हावी न होने देगा?

ऋषभ ने कहा - क्षमा करते हुए उसे, तुम अवगत करा देना कि उसकी हरकत तुमने मुझे (पति ऋषभ को) बता दी है। 

तब मैंने कहा - हाँ, ऐसा कहने से मुझे लगता है कि उस पर आशा अनुकूल अच्छा प्रभाव पड़ेगा। 

मैं चुप हुई थी फिर विचार करते हुए आगे ऋषभ से, मैंने पूछा - किंतु अगर उसने माफ़ी नहीं माँगी तब क्या होगा?

ऋषभ ने कहा - आज तुमने उस की हरकत पर जैसे रियेक्ट किया है वह, तुमसे माफ़ी अवश्य माँगेगा। 

मैंने सहमत करते हुए पूछा - अब मुझे, आपसे एक और बात पूछना है। 

ऋषभ ने कहा - बताओ।

मैंने कहा - उसकी पत्नी नेहा जी से, मेरी मोबाइल पर बात होती हैं। उनसे मैं, कैसा व्यवहार करूँ? वो तो बहुत अच्छी महिला हैं। 

ऋषभ ने कहा - उन के सामने तुम्हें, यह दिखाना ही नहीं है कि कुछ हुआ है। वरना उनके और उनके निर्दोष बच्चों पर, उसकी बुरी करतूत की बुरी छाया पड़ सकती है। हाँ, मगर याद रखना कि अब, उनके घर तुम्हें कभी नहीं जाना है। 

ऋषभ से इतनी बात करने के बाद मेरे हृदय पर से लगभग सारे संताप मिट गए थे। मैं ऋषभ के सोचने के तरीके से सहमत हुई थी। मैंने उचित माना कि उसे, भूल सुधार का एक मौका दिया जाना चाहिए। मैंने ऋषभ से कहा - 

आपने मुझे, मेरी बिगड़ी मानसिक दशा को, अपने आत्मीय साथ से, कुछ समय में सामान्य कर दिया है। 

पहले मेरी ऑफिस जाने की हिम्मत ही नहीं रही थी। मगर अब मुझ में साहस एवं आत्मविश्वास का पुनः संचार हो गया है। मैं. कल से ही फिर ऑफिस जाऊँगी। 

“जब मैंने कोई बुरा काम किया ही नहीं है तब मुझे किसी से डरना क्यों चाहिए।"

ऋषभ ने खुश होकर कहा - ये हुई ना ऋषभ की पत्नी वाली बात! 

मैं उनके कहने के अंदाज़ से हँस पड़ी थी। 

फिर मेरी कही गई बात से ऋषभ का मन, शरारत पर उतर आया था। वे मुस्कुराये थे। फिर कहा - 

मेरे साथ तो तुम बहुत खराबी से पेश आती हो। चलो अपना मूड ठीक करने के लिए तुम अब, मेरे साथ वह ख़राब बात कर लो। 

कहते हुए उन्होंने, मुझे अपनी बांहों में दबोच लिया था और ऊपर, लिहाफ खींच लिया था …. 



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