Sandeep Murarka

Classics Inspirational


4.0  

Sandeep Murarka

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जयपाल सिंह मुंडा

जयपाल सिंह मुंडा

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जन्म : 03 जनवरी 1903 

जन्म स्थान: टकरा पहानटोली, खूँटी, झारखण्ड

निधन: 20 मार्च 1970 

मृत्यु स्थल : नई दिल्ली

पिता : आमरु पाहन मुंडा

माता : राधामुनि

जीवन परिचय - झारखण्ड के जाने माने राजनीतिज्ञ, सांसद, पत्रकार, लेखक, संपादक, शिक्षाविद्, मजदूर नेता और हॉकी के अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी प्रमोद पाहन उर्फ जयपाल सिंह मुंडा का जन्म खूंटी जिले के टकरा गांव में ट्राइबल परिवार में हुआ था । जयपाल सिंह अत्यंत प्रतिभाशाली थे । पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने अपनी कौशल का परिचय खेल में भी दिखाया । जयपाल सिंह ने अर्थशास्त्र (प्रतिष्ठा) की परीक्षा अच्छे अंकों से पास की। इसके बाद वे इंडियन सिविल सर्विस (आईसीएस वर्तमान में आईएस) की परीक्षा में बैठे। उनसे पहले इस परीक्षा को पास करने वाले भारतीय धनी व आभिजात्य वर्ग से आते थे, जयपाल इनमें अपवाद थे। साक्षात्कार में सर्वाधिक अंक लेकर उन्होंने आईसीएस की परीक्षा पास की। इंग्लैंड में आईसीएस प्रोबेशनर के रूप में प्रशिक्षण लेने के दौरान उन्हें एम्स्टर्डम में होने वाले ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने का न्योता मिला। उनसे कहा गया कि भारतीय दल का हिस्सा बनने के लिए वे तत्काल एम्स्टर्डम रवाना हो जाएं। लंदन स्थित इंडिया ऑफिस से संपर्क कर जयपाल ने एम्स्टर्डम जाने के लिए छुट्टी मांगी। पर उनका आवेदन अस्वीकार कर दिया गया। उनकी दुविधा थी – देश के लिए खेलें या फिर आईसीएस में बने रहें। पर उन्होंने देश के लिए खेलना पसंद किया।

भारत लौट कर जयपाल ने बर्मा शेल कंपनी में वरिष्ठ कार्यपालक पद पर नौकरी की। नौकरी के दौरान कलकत्ता में रहते हुए 15 जनवरी 1932 को उनका विवाह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष व्योमेश चन्द्र बनर्जी की पोती तारा विन्फ्रेड मजूमदार से हुई । हालांकि, दोनों की शादी ज्यादा दिन तक नहीं टिकी। 7 मई 1952 को जहाँआरा जयरत्नम के साथ दूसरा विवाह किया , जो बाद में 1958 को राज्यसभा सांसद और केन्द्र में कई बार मन्त्री भी बनी । इनके दो पुत्र बिरसा एवं जयंत और एक पुत्री जानकी हुई ।

उन्होने नौकरी छोड़ दी और अध्यापन कार्य में रम गए, असीमित प्रतिभा के धनी जयपाल 1934 में अध्यापन कार्य के लिए अचीमोता कॉलेज, गोल्ड कोस्ट, अफ्रीका चले गए । वर्ष 1937 में वे रायपुर में राजकुमार कॉलेज के प्राचार्य नियुक्त हुए। अपनी उत्कृष्ट शैक्षणिक योग्यता , खेल में उपलब्धियों, असीम सामर्थ्य और नेतृत्व की क्षमता के बावजूद जयपाल जातिगत भेदभाव और रंगभेद के शिकार हो गए । राजकुमार कॉलेज विशेषकर भारतीय रियासतों और सामंती परिवारों के युवाओं के लिए था। ये लोग यूरोपीय छात्रों की सोहबत में यहाँ रहते थे। इन युवाओं के माँ-बाप को एक ट्राइबल के अधीन अपने बच्चों को शिक्षा दिए जाने की बात पची नहीं। अंग्रेजों को भी यह नागवार गुजरा। इसलिए जयपाल वहाँ से हटा दिए गए । उनके जीवनकाल में कई दिलचस्प मोड़ आए । जब वे अफ्रीका से भारत लौटे तो उनको 1936 में बीकानेर राजघराने ने उपनिवेशन मंत्री और राजस्व आयुक्त नियुक्त किया। इस पद पर कार्य करने के दौरान उनकी काफी प्रशंसा हुई। उनको पदोन्नति देकर बीकानेर स्टेट का विदेश सचिव बना दिया गया।

खेल में योगदान- बचपन से ही जयपाल सिंह मुंडा को हॉकी खेलना पसंद था , उनकी प्रतिभा को एक अंग्रेज शिक्षक ने पहचाना और उन्हें 20 दिसम्बर 1918 को ऑक्सफोर्ड (इंग्लैंड) के सेंट जॉन्स कॉलेज में पढ़ने के लिए ले गये । इंग्लैंड में रहकर जयपाल सिंह ने उच्च शिक्षा प्राप्त की । ऑक्सफ़ोर्ड में रहते हुए खेल, विशेषकर हॉकी के स्तंभकार के रूप में उनकी प्रतिभा उभरकर सामने आई। 1924 में वे द टाईम्स इत्यादि प्रमुख ब्रिटिश पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से लिखने लगे। अपने आलेखों से वे पाठकों के पसंदीदा बन गए और उनको काफी सराहना मिली। 1925 में ‘ऑक्सफोर्ड ब्लू’ का खिताब पाने वाले हॉकी के एकमात्र अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी जयपाल थे। 1928 में एम्सटर्डम (नीदरलैंड) में होनेवाले ओलिंपिक के लिए उन्हें भारतीय हॉकी टीम का कप्तान नियुक्त किया गया । एम्स्टर्डम ओलम्पिक जाने वाली भारतीय हॉकी टीम में शामिल खिलाड़ी थे : जयपाल सिंह मुंडा (कप्तान), रिचर्ड एलेन, ध्यान चन्द, मौरिस गेटली, विलियम गुड-कुलेन, लेस्ली हैमोंड, फिरोज खान, जॉर्ज मर्थिंस, रेक्स नॉरिस, ब्रूम पिनिगेर (उप कप्तान), माइकल रोक, फ्रेडेरिक सीमैन, अली शौकत और सैयद यूसुफ़। उन्होंने इस सुनहरे मौके का लाभ उठाया और अपनी अगुआई में देश को पहली बार हॉकी में स्वर्ण पदक दिलवाया । फाइनल में भारत ने मेजबान नीदरलैंड को 3-0 से पराजित किया । हॉकी के मैदान में एक रक्षक के रूप में उनके खेल की खूबी थी अपने प्रतिद्वंद्वियों को गेंद पर काबू नहीं करने देना।

1929 में जयपाल ने मोहन बगान हॉकी टीम का गठन किया और बंगाल हॉकी एसोसिएशन के सचिव चुने गए । जयपाल इंडियन स्पोर्ट्स काउन्सिल के सदस्य भी रहे ।

1950 में जयपाल दिल्ली फ्लाइंग क्लब के अध्यक्ष बने, 1951 में ध्यानचंद हॉकी टूर्नामेंट के अध्यक्ष रहे । 1953 में पार्लियामेंट स्पोर्ट्स क्लब के मानद महासचिव बने । जयपाल छोटानागपुर हॉकी एसोसिएशन, दिल्ली हॉकी एसोसिएशन, दिल्ली क्रिकेट एसोसिएशन, दिल्ली फुटबॉल एसोसिएशन, दिल्ली फिशिंग क्लब, दिल्ली जिमखाना क्लब, दिल्ली गोल्फ क्लब, दार्जलिंग जिमखाना क्लब, ऑल इण्डिया काउन्सिल ऑफ स्पोर्ट्स, इण्डियन ओलम्पिक एसोसिएशन, नेशनल स्पोर्ट्स क्लब ऑफ इण्डिया, क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ऑफ इण्डिया, इण्डियन ओलम्पिक कमिटी इत्यादि खेल संगठनो में विभिन्न पदों पर शोभायमान रहे । 1957 से 1961 तक इंटरनेशल ओलम्पिक कमिटी द्वारा देश में खेलों की स्थिति पर गठित तीन सदस्यीय जाँच समिति के सदस्य रहे ।

समाज विकास में योगदान - समय समय पर उन्हें अपने गाँव व वहाँ के ट्राइबल्स की बदहाली एवं शोषण की खबरें पहुँचा करती थी, वे चिन्तन करने लगे कि ट्राइबल समुदाय के उत्थान के लिए क्या किया जा सकता है । वे 1940 में सदाकत आश्रम, पटना जाकर डॉ. राजेंद्र प्रसाद से भी मिले, किन्तु उनको कोई राह नहीं सूझी ।

उसी दरम्यान बिहार और उड़ीसा के गवर्नर सर मौरिस हॉलेट ने जयपाल को बिहार और उड़ीसा विधायी परिषद (लेजिस्लेटिव काउंसिल) का सदस्य बनने का आग्रह किया , पर उन्होंने इस प्रस्ताव को बहुत ही शालीनता से ठुकरा दिया। इसके बाद गवर्नर और मुख्य सचिव रोबर्ट रसेल दोनों ने जयपाल सिंह से ट्राइबल्स के हित मे कार्य करने व सुझाव देने को कहा ।

जयपाल सिंह मुंडा रांची पहुँचे, अपने ट्राइबल्स लोगों के साथ रहने लगे। वर्ष 1946 में वे बिहार के एक आम निर्वाचन क्षेत्र से संविधान सभा के लिए चुने गए। 296 सदस्यों वाली संविधान सभा को संविधान निर्माण का कार्य सौंपा गया था। जयपाल ने पहली बार 19 दिसंबर 1946 को संविधान सभा में अपना ऐतिहासिक भाषण दिया। उन्होनें स्वयं को जंगली और आदिवासी कहते हुए अपना महान वक्तव्य प्रारम्भ किया -

- ‘’ As a jungli, as an Adibasi,” “I am not expected to understand the legal intricacies of the Resolution. But my common sense tells me that every one of us should march in that road to freedom and fight together. Sir, if there is any group of Indian people that has been shabbily treated it is my people. They have been disgracefully treated, neglected for the last 6,000 years. The history of the Indus Valley civilization, a child of which I am, shows quite clearly that it is the new comers — most of you here are intruders as far as I am concerned — it is the new comers who have driven away my people from the Indus Valley to the jungle fastness…The whole history of my people is one of continuous exploitation and dispossession by the non-aboriginals of India punctuated by rebellions and disorder.’’

अगस्त 1947 में जब अल्पसंख्यकों और वंचितों के अधिकारों पर पहली रिपोर्ट प्रकाशित हुई तो उसमें केवल दलितों के लिए ही विशेष प्रावधान किए गए थे। दलित अधिकारों के लिए डॉ अंबेडकर बहुत ताकतवर नेता बन चुके थे, जिसका लाभ दलितों को तो मिलता दिख रहा था, लेकिन ट्राइबल्स को अनदेखा किया जा रहा था। ऐसे में जयपाल सिंह मुंडा ने कड़े तेवर दिखाए और संविधान सभा में ज़ोरदार तरीके से अपना पक्ष रखा -

“आज़ादी की इस लड़ाई में हम सबको एक साथ चलना चाहिए। पिछले छह हजार साल से अगर इस देश में किसी का शोषण हुआ है तो वे ट्राइबल्स ही हैं। उन्हें मैदानों से खदेड़कर जंगलों में धकेल दिया गया और हर तरह से प्रताड़ित किया गया, लेकिन अब जब भारत अपने इतिहास में एक नया अध्याय शुरू कर रहा है तो हमें अवसरों की समानता मिलनी चाहिए।”

स्वतंत्र भारत को स्वरूप देने और उसके निर्माण में महिलाओं की भागीदारी पर जोर देने वाले जयपाल सिंह संभवतः पहले व्यक्ति थे , उनहोने कहा - “महाशय, मेरा अभिप्राय सिर्फ ट्राइबल पुरुषों से ही नहीं बल्कि महिलाओं से भी है। संविधान सभा में जरूरत से ज्यादा पुरुष हैं। हम चाहते हैं ज्यादा महिलाएं यहाँ हों…”

“मैं एक और दृष्टांत दूंगा। छोटानागपुर में यह रिवाज है कि हर सात साल पर वहाँ ‘एरा सेन्द्रा’ (जनशिकार) का आयोजन होता है। हर सात साल पर महिलाएं पुरुष का वेष धारण करती हैं और जंगलों में शिकार करती हैं। गौर कीजिये, पुरुष वेष में ये महिलाएं होती हैं। ये वो अवसर होता है जब महिलाएं, जैसा कि स्वाभाविक है, पुरुष की तरह अपनी वीरता का प्रदर्शन करती हैं। वे पुरुषों की तरह तीर-कमान, लाठियों, भालों और इस तरह के अन्य हथियारों से लैश होती हैं। "

“मैं आदिवासियों के इलाकों में आदिवासियों के बीच काफी घूमा हूँ और पिछले 9 वर्षों में मैंने 1,14,000 मील की यात्रा की है। इससे मुझे यह पता लगा है कि आदिवासियों को किस बात की जरूरत है और इस सदन से उनके लिए क्या उम्मीद की जा सकती है। उन्होंने आग्रह किया कि आदिवासियों के हितों और उनकी खासियत को संरक्षित किए जाने और उनके देखभाल की जरूरत है।” 

उन्होंने उरांव जनजाति का उदाहरण दिया - “इस असेंबली में सिर्फ एक ही उरांव सदस्य हैं। जबकि उरांव जनजाति भारत में चौथी सबसे ज्यादा जनसंख्या वाली जनजाति है।”

जयपाल सिंह के सशक्त हस्तक्षेप के बाद संविधान सभा को ट्राइबल्स के बारे में सोचने पर मजबूर होना पड़ा। इसका नतीजा यह निकला कि 400 ट्राइबल समूहों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया गया। उस समय इनकी आबादी करीब 7 फीसदी आँकी गई थी। इस लिहाज से उनके लिए नौकरियों और लोकसभा-विधानसभाओं में उनके लिए 7.5% आरक्षण सुनिश्चित किया जा सका।

ट्राइबल्स हितों की रक्षा के लिए वर्ष 20 जनवरी1939 को जयपाल सिंह मुंडा ने आदिवासी महासभा की अध्यक्षता की । 25 अप्रेल 1939 को झारखण्ड के ओड़िशा बार्डर पर सिमको नामक जगह पर अंग्रेजों ने सैकड़ों ट्राइबल्स को मार गिराया, जिसका पुरजोर विरोध प्रदर्शन जयपाल सिंह के नेतृत्व में आदिवासी महासभा ने किया । उन्होंने 1939 में 'आदिवासी सकम' नामक साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ की । ट्राइबल मजदूरो को उनका हक दिलवाने के लिए 16 मार्च 1947 को झींकपानी में आदिवासी लेबर फेडरेशन के अध्यक्ष बने । 1 जनवरी 1948 को सराईकेला खरसावां जिले में हुए नरसंहार के विरोध में 11 जनवरी 1948 को चाईबासा में भारी जनप्रदर्शन किया ।

आदिवासी महासभा के राजनीतिक विंग के रूप में 1 जनवरी 1950 को झारखण्ड पार्टी का गठन किया । 1952 के चुनाव में झारखंड पार्टी को काफी सफलता मिली , उनके मुर्गा छाप पर 4 सांसद और 32 विधायक जीते थे। स्वयं जयपाल सिंह लगातार चार बार 1952,1957,1962 एवं 1967 खूँटी से लोकसभा चुनाव जीतकर संसद में पहुँचे । जयपाल 3 सितम्बर 1963 को अल्पकाल के लिए उपमुख्यमन्त्री भी बने । बाद में झारखंड के नाम पर बनी तमाम पार्टियाँ इन्ही के विचारों से प्रेरित रही ।

वर्ष 1959 में जयपाल ने वर्ल्ड अफेयर्स काउन्सिल एवं यू एन ओ की बैठक को सम्बोधित किया, उसी वर्ष वे अमेरिका में ओकाहोंमा आदिवासी नेशन द्वारा सम्मानित भी किए गए ।

जयपाल सिंह मुंडा को ट्राइबल परम्पराओं और रहन सहन का अदभुत ज्ञान था, साथ ही वे वाकपटु और धाराप्रवाह वक्ता थे, अंग्रेजी, हिन्दी, बंग्ला, मुंडारी व संथाल कई भाषाओ पर उनकी पकड़ थी । भारत के संविधान में ट्राइबल्स को उनके अधिकार दिलवाने वाले जयपाल सिंह मुंडा को "मरङ गोमके" यानी महान नेता कहा जाता है। इनके विषय में लिखने के लिए जितना अध्ययन करता हूँ इनके विशाल व्यक्तित्व का एक नया अध्याय सामने आ जाता है । इन्हें खिलाड़ी कहूँ, या नेता, या पत्रकार, या स्वतंत्रता सेनानी, या झारखण्ड आंदोलनकारी, या अध्यापक, या मजदूर नेता, या कुशल वक्ता, या विद्वान लेखक - मरङ गोमके जयपाल सिंह मुंडा के चरित्र को शब्दों में समेटना असम्भव है ।

सम्मान - 1978 में कचहरी रोड़, राँची में जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम का निर्माण करवाया गया था , वर्ष 2004 में वहाँ उनकी प्रतिमा की स्थापना भी की गई है । उनके पैतृक गाँव टकरा , खूँटी में समाधिस्थल बना हुआ है ।


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