Ravindra Shrivastava Deepak

Tragedy


4.0  

Ravindra Shrivastava Deepak

Tragedy


जीत...एक संघर्ष

जीत...एक संघर्ष

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बार-बार दरवाजे पर दस्तक नें आराधना की चुप्पी तोड़ दी। दरवाजा खोलने के बाद वह फूट-फूट कर रोने लगी। "माँ मुझे अभी शादी नही करनी। बाबूजी, मुझे अभी शादी नही करनी। मेरी भी कुछ ख्वाइशें है। आप उसे कैसे नजरअंदाज कर सकते हैं।" इतना होने के बावजूद पंकज सिंह अपनें फैसले पर अडिग थे। उन्हें बस अपनी इज्ज़त की फिक्र थी।

"देख, आराधना। एक बार जो मैंने अपनी जुबान दे दी, फिर मैं उससे मुकरनेवाला नही। इसलिए ये शादी होकर रहेगी। रही बात तुम्हारे डॉक्टर बनने की सपने की तो तुम एक लड़की हो और तुम्हें इसकी कोई जरूरत नही। तुम्हारा पति ही तुम्हारे लिए सबकुछ है। लड़का और लड़की में ज़मीन आसमान का फर्क है। अच्छा तो यही है कि डॉक्टर बनने का सपना छोड़ घर चलाने की सोचो।"

तभी पंडित जी का कॉल आया।


"हेलो - पंकज जी।"

"जी नमस्ते पंडित जी।"

" क्या शुभ समाचार है। सुनाइये पंडित जी।"

"जी, अगले महीने के 22 तरीख का दिन बहुत शुभ है शादी के लिए। ऐसा दिन सैकड़ो साल पर एक बार आता है। (पंडितजी)"

" हा..हा.. बहुत बहुत धन्यवाद पंडित जी। हमसब तैयार हैं। नमस्कार पंडित जी।"

"लो सुशीला, पंडित जी का फ़ोन था। अगले महीने की 22 तारीख का शुभ दिन है। इसी दिन आराधना की शादी होगी। कह रहे थे कि ऐसा दिन सैकड़ो सालों बाद आता है। शादी की तैयारी करो। मैं समधी जी को इसकी सूचना दे देता हूँ।"

यह बात सुनकर आराधना और भी दुख के सागर में डूब गई। उसे अब लग रहा था मानो कि अब उसके जिंदगी में कुछ भी नहीं बचा। पर कर भी क्या सकती थी। अपने पिता के आगे उसकी एक ना चली। इस प्रकार निर्धारित तारीख को उसकी शादी हो गई। उसकी जो ख्वाहिश थी वह सदा के लिए उसके सीने में ही दफन हो गई। समय धीरे-धीरे बीतता चला गया।

मगर ना जाने क्यों आज भी आराधना के सीने में कहीं ना कहीं इस बात का ग़म था उसने अपनें ख्वाबों को हकीकत में बदल ना सकी। उसने अपनें ख्वाबों को पूरा नही कर सकी। शादी के बाद फिर भी वह पढ़ती रही। उसकी डॉक्टर बनने का जुनून अभी भी बरकरार था। मगर वह कहते हैं ना मुसीबतें जो है वह मनुष्य की परीक्षा लेती है। समय उसके धैर्य की परीक्षा लेती है। मनुष्य के साहस की परीक्षा लेती है। जिंदगी इतनी आसान भी नहीं होती। अभी आराधना को जिंदगी में कई परीक्षा देना बाकी था। जिंदगी में उसका संघर्ष बाकी था।

एक दिन अमित जिस कंपनी में काम करता था उस कंपनी को घाटा लगा। कर्ज चुकाने के बोझ तले वह कंपनी बंद हो गई। इसी क्रम में अमित की नौकरी भी चली गई। कमाई का जो एक जरिया था वह बंद हो गया। अमित ने कई कंपनियों में इंटरव्यू दिया मगर इसका कोई फायदा नहीं हुआ। थक हारकर वह शराब का आदी हो गया। नशे में आता था और आराधना से मारपीट करता था। उसे पढ़ने नही देता था। उसे हमेशा कोसता रहता था कि बड़ी आई पढ़नेवाली। पढ़कर डॉक्टर बनेंगी। औरत हो बस औरत की तरह रहो। मर्द बनने की कोशिश न करो। फिर हर छोटी मोटी बात पर उससे झगड़ा करता था। आज आराधना की दुनियां में गम के सिवा कुछ नही था।

समय के साथ उसके माता-पिता भी इस दुनिया में नहीं रहे। वह इस दुनिया में लगभग बिल्कुल अकेली सी हो गई थी।इसी क्रम में उसके दुनिया में नन्हें मेहमान ने दस्तक दिया। उसने एक बच्चे को जन्म दिया। उसनें उसका नाम उदय रखा।

समय बीता और उसके साथ उदय भी बड़ा होता चला गया। मगर अमित के नहीं कमाने से परिवार की आर्थिक हालत में सुधार नहीं हो रहा था। आज उदय 2 साल का हो गया था। फिर खुद आराधना नें नौकरी करने की ठानी और उसे नौकरी भी मिल गई जहाँ से अच्छी सैलरी भी मिलनें लगी और परिवार का काम चलने लगा। जिंदिगी थोड़ी पटरी पर आने लगी थी तभी एक दिन अचानक एक ख़बर आयी और फिर....

- ये कैसी खबर थी ?

- क्या कोई अनहोनी तो नहीं हुआ ?

- ज़िंदगी नें फिर कोई खेल तो नही खेला आराधना के साथ ?

इन सभी प्रश्नों के उत्तर अगले भाग में...


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