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Dipesh Kumar

Abstract


4.5  

Dipesh Kumar

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जब सब थम सा गया (तेरहवाँ दिन)

जब सब थम सा गया (तेरहवाँ दिन)

5 mins 203 5 mins 203


प्रिय डायरी,


अब दिन भी जल्दी नहीं कट रहे थे।ऐसा लग रहा था मानो वनवास चल रहा है।सब इसी आस मैं बैठा हुए हैं कि जल्द ही हम इस मुसीबत से बाहर निकले।

मेरी हमेशा की आदत है खाली समय मैं सोचने में निकालता हूँ।सुबह सुबह मैं बिस्तर में भी उठ कर यही सोच रहा था।सुबह उठ कर मैं अपने बालकॉनी में कुर्सी लगाकर बैठ गया।सूर्योदय देखना वैसे भी मुझे बहुत अच्छा लगता हैं।मंदिर में चल रहा भजन और शांत माहौल,चिड़ियों की आवाज़ और ताज़ा हवा का आनंद आप सिर्फ सुबह ही ले सकते हैं।कुछ देर बैठे रहने के बाद सूर्योदय हुआ।माँ ने बचपन से ही बताया हैं कि,"बेटा जब भी सुबह उठते हो तो धरती माँ और सूर्य देव को प्रणाम किया करो",क्योंकि ये साक्षात् देवी देवता हैं"।वैसे माँ ज्यादा पढ़ी नहीं हैं लेकिन जो ज्ञान उनके पास हैं शायद किसी और के पास होना आज के समय में संभव नहीं हैं मेरे घर में।

प्रातः काल की दैनिक नित्य क्रिया करके नीचे पूजा पाठ करके नाश्त करने बैठ गया।टीवी मैं समाचार चल रहा था।सुर्खियों में कल रात की प्रत्येक घटनाओं का वर्णन था।मैं खबर देखने लगा।पूरे भारत ने कल दिवाली सा माहौल रहा।प्रधानमंत्रीजी के बातो का सबने पालन किया।लेकिन कुछ जो मुर्ख हैं उनको तो भगवान् भी नहीं समझा सकते हैं।इसी बीच खबर आई की कहीं घर जल गए तो कहीं फसल।देखकर बहुत तकलीफ हुई।मैं भाई रूपेश से कहने लगा की जनता अपनी मूर्खता का प्रमाण देने में कभी पीछे नहीं रहती हैं,कल की घटनाएं देख कर मैं निराश होकर चैनल बदलने लगा।

आज महावीर जयंती थी।भगवान् महावीर जिन्होंने अहिंसा और मानवता का संदेश दिया।कुछ देर मैं उन्ही के बारे में देखने लगा।मन अब पहले से बेहतर था,इतने मैं बाहर से एक आवाज़ आई जो की सब्जी वाले की थी।मैं बाहर निकलकर सब्जी पूछने लगा और माँ आकर सब्जी बताने लगी।सब्जी लेकर मैं अंदर आ गया और गर्म पानी से सब्जियां धोने लगा।माँ से मैंने एक चीज़ कहा कि,"कोरोना ने एक चीज़ तो हम सभी को सीख दिया की कितनी सफाई से रहना चाहिए।"

इसके बाद मैं ऊपर अपने कमरे में आ गया।मोबाइल उठाकर देखा तो व्हाट्सएप्प पर सन्देश आये हुए थे।मैं बारी बारी सबका सन्देश देखने लगा।दरहसल सबने अपने दिया के साथ की फोटो भेजा था।कभी कभी मैं सोचता हूं कि स्मार्ट फ़ोन के चलते लोग क्या क्या भेजने लगते हैं।इसी बीच स्कूल के व्हाट्सएप्प ग्रुप में सन्देश था कि आप सभी की इस माह की तनख्वा से तीन दिन की तनख्वा मुख्यमंत्री एवं प्रधानमन्त्री राहत कोष में देने का निर्णय लिया गया हैं।यदि किसी को इससे समस्या हो तो बता सकते हैं।मैं सोचने लगा भला ऐसे नेक काम के लिए कोई मना करेगा क्या? इसके बाद मैं कंप्यूटर पर स्कूल का कुछ काम करने लगा। दोपहर के भोजन का समय हो गया था और मुझे भूख भी लग रही थी।एक बजे के लगभग मैं भोजन करके ऊपर अपने कमरे में आया और मोबाइल में गाने सुनते सुनते सो गया।तीन बजे मेरी आँख खुली तो गर्मी का आभास हो रहा था।मैं उठकर कुर्सी पर बैठ गया और पाठ्यक्रम की पुस्तक पढ़ने लगा।पांच बजे के लगभग मैं नीचे आया और अपने पेड़ पौधों की देख रेख करने लगा। घर के सभी सदस्य और बच्चे बाहर आँगन में खेल रहे थे।बच्चे वास्तव में भगवान् का रूप इस कठिन समय में भी हम सबको इन बच्चों की वजह से सकारात्मक ऊर्जा मिलती हैं।

कुछ देर बाद पुराने मित्र संदीप का फ़ोन आया और वो मुझसे मेरा हाल चाल पूछने लगे,पुरानी बातों के बारे में बात करते करते हम लोगों ने लॉक डाउन के बाद कहीं घूमने का प्लान बनाया।लेकिन फिलहाल अभी कोई उम्मीद नहीं थी।शाम के आरती का समय हो चुका था।आरती के बाद मैं रेम्बो को घुमाने ले गया तो बगल के खेत में मजदुर गेहूं की फसल का ढेर इकठ्ठा कर रहे थे।रात में गेहूँ निकालने के लिए मशीने आने वाली थी।मेरा घर शहर और ग्रामीण दोनों प्रकार का हैं।इसलिए मुझे ये वातावरण बहुत प्रिय हैं।रेम्बो को टहलाकर मैंने उसके बर्तन में खाना डाल कर दादीजी के कमरे में सबके साथ जाकर बैठ गया।

टीवी पर समाचार भी चल रहा था और खबर आ रही थी की लॉक डाउन बढ़ने की संभावना है,क्योंकि आज कोरोना संक्रमितों की संख्या 4000 पार थी।वास्तव में चिंता का विषय था।फिर क्या चाचाजी ने टीवी बंद किया और कहा,"ये खबर सुन सुनकर दिमाग खराब हो गया हैं।"फिर हमलोग चाचाजी और पिताजी के बचपन की किस्से सुनने लगे।दादाजी पहलवान थे तो पिताजी और चाचाजी भी पहलवानी में खूब इनाम जीत कर उनका नाम रोशन करते थे,और बता रहे थे की पहले इनाम के रूप में ट्रॉफी या मैडल नहीं बल्कि बर्तन और बादाम या दूध मिलता था।चाचाजी को बॉडीबिल्डिंग का बहुत शौक था,और कई बार उन्होंने बॉडीबिल्डिंग में भी कई उपलब्धियां हासिल की हैं।किस्से सुनते सुनते खाने का समय हो गया।खाने में आज दाल और बाफले बने थे।दाल और बाफले राजस्थान और हमारे क्षेत्र का प्रिय भोजन हैं और साथ में चूरमे का लडडू।वास्तव में रात के खाने का आनंद आ गया।बाफले दरहसल गोबर के कंडों को जलाकर उसकी आग पर बनाया जाता हैं और चूरमा इन्हीं बाफ्लो को छोटे छोटे बारीक टुकड़ों को घी और चीनी मिलकर बनाया जाता हैं।रात के खाने का आनंद आ गया।लेकिन टहलना बहुत जरुरी हैं ऐसे भारी भोजन के बाद,इसलिए मैं छत पर टहलने के लिए चला गया।जीवन संगिनी जी का फ़ोन आया और दिन भर का हाल चाल लेने लगी।कुछ देर बाद मैं नीचे अपने कमरे में आया और रस्किन बांड की कहानी की किताब पढ़ने लगा।कहानी की पुस्तकों को पढ़ने का अपना अलग ही मजा हैं।

बारह बज गए थे और मुझे नींद भी आ रही थी।इसलिए मैं अपने बिस्तर पर आ गया और आज की कहानी मैं लिखने लगा।अब मुझे लग रहा था कि इस महामारी के संकट में मुझे ऊर्जावान और सकारात्मक रहने का साधन स्टोरी मिरर के माध्यम से मिल गया है।इसको मैं अब हमेशा के लिए जारी रखूँगा।


इस तरह लॉक डाउन का आज का भी दिन समाप्त हो गया।लेकिन कहानी अभी अगले भाग में जारी रहेगी.











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