हमारा वर्तमान
हमारा वर्तमान
"महोदय आपका वक्तव्य बहुत प्रभावी था। सभा में बैठे सभी सभासदों ने आपकी उपलब्धियों का करतल ध्वनि से स्वागत किया है।"
आज वर्मा जी की रिटायरमेंट थी, इस अवसर पर वे अपना अंतिम भाषण दे रहे थे।
उनकी उपलब्धियों से प्रभावित होकर उनके सहकर्मी उनकी तारीफों के पुल बांध रहे थे और वर्मा जी भी अपने 'मुँह मियाँ मिट्ठू' बन प्रसन्न हो रहे थे।
यह सब देख सुनकर उब चुकी वर्मा जी की पत्नी ने घर लौटते समय वर्मा जी से अपने मन की बात साझा करते हुए कहा- "मेरी एक मित्र है। बहुत ही अच्छा योग करती थी। हम सबमें सबसे अधिक स्वस्थ व फिट वही थी।"
"वही थी! माने? आज नहीं है।"
"हाँ अब वह कई बीमारियों से घिरी हुई है।"
" तो अब उसने योग करना छोड़ दिया है!"
"हाँ! सही कहा, अब वह सिर्फ अपने अच्छे भूत का बखान करती है। जिससे उसका वर्तमान अपना अस्तित्व भूल कर सिर्फ उसके भूत को ही ताक रहा है। अब उसकी बातें सबको उबाऊ लगती है। किसी को भी उससे मित्रता रखने में कोई दिलचस्पी नहीं रही।"
"हूँ! समझा! तुम्हारा इशारा मैं बखूबी समझ रहा हूँ। आज पहली बार लग रहा है कि तुम ही मेरी सच्ची मित्र हो।"
कहकर वर्मा जी ने अपनी पत्नी की ओर सम्मान भरी नजरों से देखा।
