हीर कुँवरी
हीर कुँवरी
बादशाह अकबर को भारतीय कला एवं संस्कृति से अगाध प्रेम था। उन्होंने अपने कार्यकाल में राजस्थानी और फारसी चित्रकला का समन्वय करके लघू चित्रकारी में बहुत अधिक काम करवाया था। ना सिर्फ चित्रकला, उन्हें गीत और संगीत की भी बारीक समझ थी। उनके दरबार में अनेक गीतकार और संगीतकार मौजूद रहा करते थे। उनमें से कई नामचीन कलाकारों को अकबर ने अपने साम्राज्य में मनसबदारी देन की थी। अकबर के दरबार में ना सिर्फ पुरूष कलाकार मौजूद थे बल्कि स्त्रीयाँ भी अपने फन से शहंशाह का दिल मोह लिया करती थी। ऐसी ही एक संगीतकार – हीर कुँवरी भी थी जो धनुषाकार स्वरमंडल, बखूबी बजाती थी। वह तानसेन की शिष्या थी। राजस्थान की रहने वाली यह खूबसूरत राजपुतानी ना सिर्फ गीत संगीत में कुशल थी, बल्कि अस्त्र-शस्त्र चलाने में भी निपुण थी। एक बार मियाँ तानसेन की नजर इस कन्या के हुनर पर पडी। उन्होंने उसकी कला को और ज्यादा प्रोत्साहन मिलने हेतू फतेहपुर ले आने का फैसला किया।
फतेहपुर में हीर कुँवरी ने अपने फन से सभी मन मोह लिया। बादशाह अकबर, जो की कलाकारों का सम्मान किया करते थे, उन्होंने उसे अपनी कला को और ज्यादा महारत हासिल करने को कहा। अकबर ने उन्हें नाम दिया हरका-बाई। वह भिन्न-भिन्न उस्तादों से अपने फन को और ज्यादा धारदार बनाने में अपना अधिकतर समय व्यतित कर रही थी। तलवारबाजी और तीर-कमान में उन्हें विशेष महारत हासिल थी। एक बार हरका बाई ने अपने गुरू तानसेन से पुछा कि ऐसा कोई राग है, जिसे सुन कर सभी पशु-पक्षी और मानव एक साथ, एक ही तल पर मंत्रमुग्ध हो सके?
तानसेन ने कहा कि ऐसा तो कोई राग अब तक नहीं बना है, जो ये चमत्कार करके दिखा सके। किंतु हरका बाई इस बात को मानने से इंकार कर रही थी कि एक ही ईश्वर की विभिन्न संताने किसी एक सुत्र में बँधने के लिये तैयार नहीं है। उन्हें बस जरूरत थी तो एक ऐसे बंधन की, जो किसी को भी बंधन ना लगे, बल्कि प्रेम के इस सुरीले धागे में बँधने को सभी लालायित हो। हरका बाई जंगल में जाकर सूरों को इस तरह लयबद्ध करने का यत्न करने लगी जिसकी स्वर लहरीयाँ सभी को मंत्रमुग्ध करने में सक्षम हो।
बहुत समय बीत गया, बादशाह अकबर को हरका बाई दरबार में नजर नहीं आ रही थी। उन्होंने मियाँ तानसेन से इस बारे में पुछा तो उन्होंने बताया कि आजकल वह एक ऐसे राग की खोज कर रही है जो सभी जंगली जानवरों और इंसान को एक ही जगह पर आकर एक साथ रहने को बाध्य कर सके। कोई किसी का दुश्मन नहीं ना कोई किसी की हत्या करने की इच्छा करना चाहेगा।
“ये तो सृष्टी के नियमों के विरूद्ध हो जायेगा।“ बादशाह अकबर ने शंका जाहीर की।
“महाराज, यह मात्र एक प्रयोग है। मैं जानता हुँ ऐसा कोई राग ना कभी था, ना कोई इसे इजाद कर पायेगा। कुछ ही दिनों में हरका-बाई वापस दरबार में आकर पुर्ववत अपने कार्य में निमग्न हो जायेगी।“ तानसेन ने विश्वास जताया।
“आमीन, सुम्मा-आमीन।“ बादशाह अकबर ने इबादत की।
समय बीतता गया कि एक दिन बादशाह को यह खबर मिली कि हरका-बाई ने एक ऐसे राग की खोज कर ली है जो सभी जंगली हिंस्र और अहिंसक पशुओं को अपने सामने आकर एक साथ बैठने पर मजबूर कर देती है। बादशाह अकबर इस मंजर को देखने की तीव्र इच्छा व्यक्त की। उन्होंने तुरंत सेना की एक तुकडी को अपने साथ जंगल में चलने को कहा। कुछ ही देर में वे सभी घोडों पर सवार हो उस जगह पर पहुँच गये, जहाँ हरका-बाई अपने स्वर-मंडल पर उस अनोखे राग को बजा रही थी। उसमें से निकलने वाली स्वर लहरीयाँ किसी को भी मदहोश करने के लिये काफी थी। बादशाह अकबर अपने घुटनों पर बैठ कर उस राग का आनंद लेने लगे। उन्होंने देखा कि हिरण, भेडिया, खरगोश, बतख, बकरीयाँ, लोमडी और हजारों पक्षी आकाश में एक साथ डोल रहे थे। ऐसा स्वर्गिय दृष्य देखकर उन्हें एक अल्लाह और सभी उसकी औलादे इस बात पर भरोसा हो गया।
सभी दरबार में लौट आये। बादशाह अकबर नें ऐसी अभुतपूर्व महिला का सत्कार करना चाहा। उन्होंने हरका-बाई से विवाह कर उन्हें मलिका-ऐ-हिंदोस्तान का खिताब बक्शा। बाद में उन्हें मरियम उज़-ज़मानी के नाम से भी जाना गया, जिनके जानिब से राजपुत्र जहाँगीर का जन्म भी हुआ। ऐसी अभुतपूर्व महिला को शत-शत नमन।
