Sarita Maurya

Tragedy


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Sarita Maurya

Tragedy


गोरी सूरत

गोरी सूरत

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शुभ्रा ने पहली बार उसे देखा तो रेशम से पतले मगर घुंघराले बालों की बिखरती लटों से खेलती उसकी उंगलियां और शाम के धुंधलके में भी आंखों पर धूप का चश्मा चढ़ाये गुलाबी आभा लिये सुंदर सी लगी। शुभ्रा ने सोचा कि शायद वो भैया के साथ की कोई अध्यापिका होगी। अपनी अंतर्मुखी आदत के अनुसार उसने नमस्ते की, मेहमाननवाजी के लिए चाय बिस्किट रखे और अंदर चली गई। थोड़ी ही देर में पता चला कि आये हुए मेहमान खाना खाकर जाने वाले थे तो उसे बाहर निकलना पड़ा, उसने फिर से उस मेहमान पर एक नज़र डाली और अनुमान लगाया कि मेहमान शायद उसके परिवार से परिचित हो रही थीं। मेहमान विदा तो हो गईं लेकिन जाने क्यूं शुभ्रा का ह्रदय कसमसाने लगा और दिल में अजीब-अजीब खयाल आने लगे जैसे उसे उन मेहमान का आना बुरा नहीं लगा तो अच्छा भी नहीं लगा।

मेहमान के जाने के बाद जब नीचे से मकानमालिक की बहू ने आकर उसे छेड़ना शुरू किया कि उसकी नई और खूबसूरत भाभी आने वाली थी तो उसने मकानमालिक की बहू यानी मीरा भाभी को डांट दिया कि उन्हें अपने से छोटों से इस तरह का मजाक कभी नहीं करना चाहिये, वो भी तब जब उसकी भाभी पहले से उसके घर में है। चाहे जैसी हों लेकिन वो उस घर की सदस्य हैं और उनकी जगह कोई कैसे ले सकता है? उसे ग्लानि भी हुई कि उसे मीरा भाभी से ऐसे बात नहीं करनी चाहिये थी। लेकिन मीराभाभी भी कहां हार मानने वाली थीं, बोलीं तुम अभी बच्ची हो मुझसे शर्त लगा लो मैं गलत नहीं हूं। उसने मीरा भाभी से उलझने की बजाय चुप्पी साध ली।

हालांकि मीरा भाभी उसका इतना ध्यान रखती थीं कि जैसे वह उनकी किरायेदार नहीं बल्कि अपनी ननद हो, और चुहल करने का उसे हंसाने का कोई मौका नहीं छोडती थीं।

हालांकि अनुपमा भाभी से उसका बहुत लेनादेना नहीं था क्योंकि वह अपनी सबसे पहली याद यानी भैया की पहली पत्नी से मिले स्नेह और दुलार को कभी दिल से भुला नहीं पाई थी, उनका असमय संसार से चले जाना मां को मानसिक रूप से तोड़ गया था तो परिवार के अन्य सदस्यों के साथ वह भी कम नहीं टूटी थी। होता भी क्यों न! पांच साल की नन्हीं शुभ्रा बारात में जिद करके गई थी और लौटते समय अपनी भाभी को पल-पल घूंघट के भीतर से निहारती और सबको बताती आई थी कि उसकी नई भाभी कितनी सुंदर थीं और वह अपनी भाभी के साथ क्या-क्या करने वाली थी कितना खेलने वाली थी। पिता जी भी अपनी बेटी की बातों पर बलिहारी जाते थे कि बहू के आगमन से घर में रौनक आ गई थी। मानों घर की प्रथम बहू लक्ष्मी के साक्षात रूप में आई थीं, घर के हर सदस्य का मन मोह लिया था।

शुभ्रा में तो जैसे उनकी जान बसती थी, उसकी चोटी, कंघी, कपड़े, पढ़ाई हर चीज का ध्यान रखतीं, यहां तक कि जब मायके जातीं तो उसके लिए चूड़ियां, कंघी और जाने क्या-क्या डिब्बे में स्नेहस्वरूप भर लातीं। हालांकि तब वो सिर्फ इतना समझ पाती थी कि भाभी के पास जायेगी तो भाभी उसे पकड़कर उसकी चोटी गूंथ डालेंगी, इसीलिये हमेशा उनसे भागती रहती। लेकिन जब उसके सो जाने पर वो चुपके से उसके बाल खोलकर चोटी करतीं तो वह भाभी की गोद में अपना मुंह घुसा लेती ‘‘भाभी रहने दो न गर्दन में दर्द हो रहा है’’ और भाभी हंस कर कहतीं, बस पांच मिनट और बिटिया। वो पांच मिनट उसके सिर की सारी जूं खतम करके और उसकी लंबी चोटी गूंथ करके ही दम लेते। उनका असमय संसार से जाना पूरे घर की मुस्कुराहट को छीन ले गया। भैया के जीवन में जगह रिक्त हो गई।

समय की मांग और इंसानी व्यवहार की जरूरत के अनुसार अनुपमा भाभी का भैया के जीवन में आना सबके लिए सुखद अनुभव भले ही न रहा हो लेकिन भैया के जीवन को पटरी पर आता देख सबने उन्हें मन से स्वीकार कर लिया था। ऐसे में किसी और की कल्पना या ऐसा मजाक भी सोचना शुभा्र के लिए कोसों दूर की बात थी कि अनुपमा भाभी के रहते उनके घर में कोई और औरत जगह ले सकती थी। इतनी छोटी उम्र में भी उसे अपने या किसी भी लड़की पर अन्याय बरदाश्त नहीं था। वह अनुपमा भाभी के व्यवहार की वजह से उनसे दिल से भले ही नहीं जुड़ पाई थी लेकिन कभी उनके लिए बुरा भी नहीं सोच पाती थी। ऐसे में जब मायके जाने से पहले वे उसे बताकर गई थीं कि वो घर में एक नया मेहमान लाने वाली थीं तो नये मेहमान के आने की खुशी में वह उनके बाकी रूखे व्यवहार को भुला चुकी थी। 

पंद्रह दिनों में उस गोरी सूरत का घर में दो बार आना हो चुका था और दूसरी बार तो उन्होंने उसका भी नाम पूछ ही लिया था। अनुपमा भाभी लौट आई थीं और खुशी-खुशी बता रही थीं कि अब वो कहीं नहीं जायेंगी क्योंकि सातवां महीना पूरा होने वाला था। आज उन्हें अपने पति का बेसब्री से इंतज़ार था। भैया ने जैसे ही उन्हें घर में देखा वे सबसे पहले शुभ्रा और सरस को एकांत में ले गये और ताकीद की कि उन्हें पता नहीं चलना चाहिये कि उनकी अनुपस्थिति में घर में कोई गोरी सूरत मेहमान बनकर आई थी। ऐसा नहीं था कि अनुपमा भाभी सांवली हों बल्कि खूबसूरत गेहुंआ रंग था उनका हां वो गोरी सूरत की तरह गुलाबी आभा वाली नहीं थीं और उनके बाल भी घुंघराले नहीं थे।

अनुपमा भाभी के आने के दूसरे दिन ही जब उन्हें रोते सुबकते जाने की तैयारी करते देखा तो शुभ्रा का माथा ठनका और ह्रदय मानों फटकर बाहर आ जाना चाहता था, वो लड़की होकर उस पीड़ा को समझ पा रही थी जिससे अनुपमा भाभी शायद गुजरने वाली थीं लेकिन बोल नहीं पाई क्योंकि 11 वर्षीया शुभ्रा बहुत कुछ जानती भी नहीं थी और फिर भैया से किये गये वादे को कैसे तोड़ती उसे समझ नहीं आ रहा था। उसका मन कर रहा था कि वह अनुपमा भाभी को सब कुछ बता दे, लेकिन क्या और कैसे ?

समय एक माह आगे सरक गया, एक दिन उसके लिए नया सूट आया जिसे पहन कर वह पहली बार अपने परिवार के साथ कहीं बाहर किसी के घर गई और जब वहां की तैयारियां देखीं तो वह हक्की-बक्की रह गई, क्योंकि भैया अनुपमा भाभी को मझधार में छोड़कर गोरी सूरत की मांग सजाने के लिए सबको साथ लेकर गये थे। 

समय तमाम सवालों को अपने पीछे छोड़ता और आगे निकल गया। शुभ्रा को पता चला कि अनुपमा ने एक पुत्र को जन्म दिया था और कई बार कई लोगों से गुहार लगाई थी कि उसे और उसके पुत्र को अपना लिया जाये लेकिन डर और शक्ति दोनों बहुत बड़ी चीज होते हैं। शुभ्रा को जब पता चला कि अनुपमा भाभी ने उसे भी ढूंढा था ताकि वह उनके दर्द को समझ सके और जान सके कि कैसे एक लड़की अनुपमा की सचाई को उसी के खिलाफ हथियार बनाकर न सिर्फ उसे कटघरे में खड़ा कर दिया गया वरन् चारित्रिक रूप से भी दोषी करार दे दिया गया, यहां तक कि उनके पिता की नौकरी चली गई और इसी गम में वे दुनिया से चल बसे। पता नहीं कितना रोई थी वह उस औरत के लिए जिसका नाम अनुपमा था, इसलिये नहीं कि उसका शुभ्रा से कोई रिश्ता था बल्कि इसलिये कि एक औरत के लिए दूसरी औरत का वजूद मिटा दिया गया था और ऐसा करने में एक मर्द के साथ एक औरत ने सहयोग किया था। 

वक्त का पहिया रूकता नहीं! वैसे तो शुभ्रा कभी भी किसी रिश्ते को नहीं भूलती थी लेकिन इधर एक सप्ताह से जाने क्यें अचानक से अट्ठारह वर्षों बाद उसे मीरा भाभी सपने में दिखीं मानों साक्षात बैठी हों और उससे मिलने की मिन्नत करने लगीं। बेचैनी इतनी बढ़ी कि शुभ्रा की नींद उड़ गई, वो उन गलियों की तरफ मुड़ गई जिनमें उसने अपने वादे के अनुसार वापस प्रवेश नहीं किया था। डोरबेल बजाते ही अजीब से सन्नाटे के साथ एक बीस-बाइस साल के लड़के ने दरवाजा खोला, शुभ्रा ने उसे अपना परिचय दिया और मीरा भाभी को बुलाने के लिए कहा- क्षणभर में उसे देखते ही बुआ कहकर मीरा भाभी का बेटा उससे लिपट गया और फफक-फफक कर रोने लगा। ‘‘बुआ आपने इतनी देर क्यों कर दी, मम्मी आपकी याद में तड़पती हुई दुनिया से विदा हुईं, हमारे पास आपका कोई पता नहीं था, वो अपने कैंसर के कष्ट को भोगते हुए भी कहती थीं शुभ्रा को बुला दो कोई एक बार उसे दिखा दो। सारे परिजन मानों उसे कोस रहे थे कि वह दो दिन पहले क्यों नहीं आ सकी? उसका तनमन सब विदीर्ण हो गया। समझ नहीं पा रही थी कि रोये, अपने आप को कोसे या किसी तरह उस पल को वापस ले आये जब मीरा भाभी जीवित थीं ताकि उनके चेहरे पर मिलन के संतोष की रेखा तो खींच सके। लेकिन उसके हाथ रीते थे समय रेत की तरह मुट्ठी से फिसल चुका था। मीरा भाभी के घर से वापस निकलते समय उनके बेटे अमित ने उसके हाथ में एक लिफाफा थमा दिया जिसपर लिखा था-प्यारी ननद शुभ्रा के लिए ‘‘गोरी सूरत’’।

 शुभ्रा घर पहुंचने का इंतजार नहीं कर सकी और उसने रास्ते में ही धड़कते दिल से लिफाफा खोल दिया। नीले अक्षरों में उसके समक्ष कुछ शब्द वाक्य बनकर तैर रहे थे! प्यारी शुभ्रा, अनुपमा भाभी के साथ अन्याय हुआ ये तुम जानती हो और मानती भी हो इसका जितना मुझे विश्वास है उससे कई गुना उन्हें तुमपर था, वो कहतीं अगर मुझे वो लड़की मिल जाये तो उसके साथ मैंने जितना बुरा बर्ताव किया उस सबके लिए माफी मांग लूंगी और मैं जानती हूं कि वो इतनी विशाल ह्रदय है कि न सिर्फ मुझे माफ करेगी बल्कि मुझे छाया भी दे देगी और अपने भतीजे का हक भी। मगर अफसोस तुम नहीं मिलींं, और अनुपमा भाभी ने अपने पुत्र को बारह वर्ष तक पालपोस कर खो दिया, फिर उसके गम में स्वयं भी मानसिक संतुलन खो बैठीं और इस दुनिया से रूखसत हो गई।

अपने आखिरी दिनों में एक सुघड़ और अच्छे घर की बहु झुग्गी झोपड़ी में अपना जीवन काट रही थी और लोगों के घरों में बर्तन धोकर अपना गुजारा चला रही थी। वह ग्रेजुएट अपना मानसिक संतुलन खो बैठी थी लेकिन न जाने उसे तुमपर इतना भरोसा क्यों था? मुझे भी है कि एक दिन तुम मुझसे मिलने जरूर आओगी क्योंकि तुम मेरा प्यार नहीं भुला सकतीं। न जाने क्यों मुझे भी यकीन है कि अनुपमा की कहानी तुम बदल सकती थीं, कितना तड़पीं वो तुमसे मिलने के लिए लेकिन किसी ने तुम्हारा पता भी उन्हें नहीं दिया। क्या तुम्हे कभी अनुपमा भाभी या अपने भतीजे की याद भी आई? शुभ्रा किसे बताती कि उसे अनुपमा भाभी की याद भले ही आई या न आई हो लेकिन एक नारी की तड़प और अजन्मे शिशु के साथ हुए अन्याय ने उसे कभी चैन से सोने भी नहीं दिया, हां वो गोरी सूरत के आगे हार चुकी थी। 


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