एक रात की बीबी....भाग 2
एक रात की बीबी....भाग 2
भाग1 से आगे क्रमशः...
नारायणी ने कहा.... क्षमा करें स्वामी ...अपने सत्संगियों के राशन की उधारी को चुकाने के लिए मैं लाला की "एक रात की बीवी" बनने जा रही हूं....
बीवी.... एक रात की.... मैं समझा नहीं .....
नारायणी ने उसे सारी बात विस्तार से बताते हुए कहा..... स्वामी... मैंने आपके भरोसे उसे वचन दिया... अब आप ही मेरे वचन की लाज रखना....!!
नारायणदास बोला... ठीक किया नारायणी..... इस नश्वर शरीर से जिस का भला हो जाए वह कम ही है..! अगर शरीर बेचकर भी सत्संगियों को जलपान कराना पड़े तो यह भी तो हमारे लिए सौभाग्य की बात है।
इतने में तेज हवाएं चली और फिर काले बादल घिर आए और बरसने लगे।
उधर लाला अकेले घर पर नारायणी के आने की राह देख रहा था। पर जब बारिश शुरू हुई तो उसे अपने अरमान धुलते दिखाई दिए।
उधर नारायणी जैसे ही घर से निकलने को हुई.. नारायण दास ने उसके सिर पर छाता तानते हुए कहा.... ठहर... नारायणी इस घनघोर बरसात में भला तू अकेले कैसे जा सकती है और फिर अगर तू भीग गई तो लाला को अच्छा न लगेगा । उसका मन दुखी हो जाएगा और नारायणी हमें अपने कर्मों या वचन से किसी को दुखी करने का कोई अधिकार नहीं । मैं तेरे साथ चलता हूं और जब तू उधर से वापस लौटेगी... तो तेरे साथ आ जाऊंगा..! तेरा साथ देना मेरी जिम्मेदारी और तेरे वचन की लाज रखना मेरा धर्म है! नारायणी छाता में थी तो नारायणदास बारिश में भीगता चल रहा था।
रास्ता पानी से डूबा हुआ था। काली अंधेरी रात थी। तभी जोर से बिजली चमकी..! नारायण दास और नारायणी ने एक दूसरे को एक पल के लिए गौर से देखा.. मानो उनकी आत्मा आपस में बात कर रही हो । नारायण दास की आत्मा कह रही थी... तू धन्य है नारायण दास... जो तुझे ऐसी पत्नी मिली ! जो तेरी खातिर खुद के शरीर को का सौदा तक करने को तैयार हो गई।
दूसरी ओर नारायणी की आत्मा कह रही थी... तू धन्य है नारायणी... जो इस जन्म में तुझे इतना समझदार पति मिला जो तुझ पर इतना विश्वास और भरोसा करता है! तेरी खातिर खुद को कष्ट दे रहा है!
यूं सोचते सोचते रास्ता कब कट गया उन्हें पता ना चला और लाला ठगिया राम का घर आ गया। नारायण दास ने बाहर बरामदे में बैठते हुए कहा... नारायणी अब तू जा.. और जब लाला की तृप्ति हो जाए तो उस से इजाजत ले तू चली आना ।
नारायणी ने लाला का दरवाजा खटखटाया ।लाला चौका। उसने सोचा इस बरसात में भला कौन आया । कहीं.. नारायणी की जगह कोई और तो नहीं ...वह डरते डराते दरवाजे के नजदीक पहुंचा और मोमबत्ती को आगे बढ़ाते हुए दरवाजा खोला..!
नारायणी तू.... तू इस भारी बरसात में....सचमुच आ गई.. या में कोई सपना देख रहा हूं....
तुम कोई सपना नहीं देख रहे लाला....नारायणी ने कहा ठगिया राम ने नारायणी को छूकर देखा और कहा ...मगर नारायणी इस तेज बारिश में.... तू तो बिल्कुल भी नहीं... भीगी.. ? ऐसा क्यों...?
नारायणी ने कहा ....ठगिया राम... मेरा भगवान मेरे साथ जो है...!!
तेरा भगवान.... मैं समझा नहीं...!
मेरा मालिक.... नारायण दास...
नारायण दास.... तेरे साथ है.... नारायण दास का नाम सुनते ही वह चौका..... फिर संभालते हुए बोला... कहां है तेरे बरामदे में बैठा है... ठगिया राम ....
नारायण की बात को परखने के लिए वह नारायणी को छोड़ मोमबत्ती लिए नारायण दास को देखने बरामदे में गया। देखा तो वह दंग रह गया । पानी से तरबतर नारायणदास अपनी पत्नी के इंतजार में बैठा था। उसने नारायणदास के सामने पहुंचकर उसके आगे हाथ जोड़ लिए।
नारायण दास ने कहा ...ना ....ना... ठगिया राम ...तुझे हाथ जोड़ने की क्या जरूरत है..? तू जल्दी से अपना काम निपटा लें और हमें जाने दे। क्यों अनुनय विनय में अपना समय नष्ट कर रहा है। देख तेरी इच्छा की पूर्ति के लिए नारायणी... तेरा इंतजार कर रही है..! तभी ठगिया राम... नारायणदास की बात सुन... पानी पानी हो गया.! वह उसके पैरों पर गिर पड़ा और अपने कृत्य के लिए क्षमा मांगने लगा! मुझे माफ कर दो... नारायणदास..! आज तक मैंने सभी लोगों को ठगा... पर आज ...पहली बार में स्वयं ठगा गया हूं...! मैंने अपने नीच कर्मों से राम को भी लगने में कोई कसर नहीं छोड़ी... पर राम ने आज मुझे ठग लिया और बता दिया कि संसार में वह भी मौजूद है... बस भीतर की आंखें चाहिए... उसे देखने के लिए..! नारायण दास ने कहा भाई... यह सत्संग की बातें फिर कभी हो सकती हैं...! पर इस समय तो अपनी शर्त पूरी करने का वक्त है ..तो उठो और अपनी कामवासना तृप्त करो ..! वैसे भी यह शरीर तो नश्वर है ।अच्छा है इस शरीर से किसी की तृप्ति हो जाए ।
ठगिया राम ने नारायण दास के पैर पकड़ लिए। इतने में नारायणी भी वहां आ गई। उसने कहा ...उठो लाला और ले चलो मुझे अपने बिस्तर पर ....कर लो अपने मन की... जिससे मैं तुम्हारे कर्ज से मुक्त हो जाऊं....!
लाला ठगीआ राम ने नारायण दास के चरण छोड़ नारायणी के पैर पकड़ लिए और बोला ...नारायणी मां... अपने बेटे को माफ कर दे ..! कुसंगति और बुरे विचारों ने मेरी आत्मा पर धूल जमा दी। आज अपने चरणों में स्थान पा लेने दो।
नारायणी ने कहा.... लालाजी जल्दी करो.... मुझे सुबह अपने सत्संगियों के जलपान की भी व्यवस्था करनी है।
लाला ठगिया राम आज अपना पथ बदल चुका था। उसने कहा ...नारायण मुझे अपना सत्संगी बना लो..! मैं इस जिंदगी से ऊब चुका हूं ।
नारायण दास ने ठगी राम को गले लगाया और वहां से विदा हो लिए।
प्रातः काल सत्संग प्रारंभ हुआ... तो वहां लाला ठगिया राम हाथ जोड़े बैठा हुआ था। लोग ठगिया राम को वहां बैठे देख आश्चर्य चकित रह गये । वे उसके व्यवहार से परिचित थे ।
ठगिया राम ने कहा.... आज से मैं ठगिया राम नहीं सिर्फ रामदास हूं ...आज मैं प्रभु द्वारा ठग लिया गया..! जब जागो तब सवेरा ...! सो आज मेरा सवेरा हो चुका है। आज से मैं आप सभी के सामने वचन देता हूं कि मां नारायणी के द्वारा बनाए जाने वाले जलपान की व्यवस्था मेरे द्वारा ही की जाएगी । मैं अपनी सारी संपत्ति नारायण दास व सत्संग संस्था को दान कर देता हूं। जिससे अपने बचे शेष जीवन काल मैं में अपने पूर्व काल का प्रायश्चित कर सकूं । वहां बैठे सभी लोगों को ठगीआ राम की बातों पर भरोसा ना था। पर ठागिया राम सच में बदल चुका था। उसकी आत्मा जाग चुकी थी। दो-तीन दिन के सत्संग में आने पर उसने अपनी सारी चल अचल संपत्ति के कागजात नारायण दास के चरणों में लाकर रख दिए और फिर एक दिन स्वयं ...वह कस्बा छोड़ कर चला गया..! उस प्रभु की तलाश में जिस के रस ने उसको बदल दिया था । जाते जाते वह एक पत्र संस्था के लिए छोड़ गया... जिसमें अपने कर्मों के लिए माफी और इस कर्म पर विश्वास करने का आग्रह किया गया था..! क्योंकि अभी भी उसके पूर्व समय के कर्म.... उसका पीछा कर रहे थे! अतः उसने वह स्थान छोड़ दिया ..! एक अनजान स्थान पर जाना ही उसने उचित समझा ।
उसमें अब नारायण दास और नारायणी का सामना करने की भी ताकत न बची थी । पर वह उनके सत्संग और कर्मों से सही राह पा चुका था ।
नारायणी फिर से एक बार नारायण की हो गई। जो हमेशा से ही उसकी थी।
