STORYMIRROR

Rajeev Rawat

Romance

4  

Rajeev Rawat

Romance

एक और ताजमहल-एक कहानी

एक और ताजमहल-एक कहानी

8 mins
403


अभी हमारी कार पहाड़ी के गोल गोल घूमते रास्ते से ऊपर चढ़ती चली जा रही थी। एक तो पहाड़ी कासकरा रास्ता और ऊपर से खिड़की के बाहर से झांकने पर नीचे दिखती हुई गहराई में कल कल बहती नदी, सच में डर लगता था। रीतू तोउसके कंधे पर ही सर रखे, डरी हुई बैठी थी। कभी कभी तो खतरनाक मोड़ पर वह उसके हाथों को जोर से पकड़ लेती। 


       वह तो अच्छा था कि अपने मित्र के कहने पर ट्रेवल एजेंसी का ड्राइवर ले लिया था। हलांकि वह कार चलाने में एक्सपर्ट थालेकिन इन खतरनाक मोड़ों पर रिस्क न लेकर अच्छा ही किया वरना रीतू इतनी जोर से उसकी बाहें पकड़ लेती थी कि उसको ड्राइव करना मुश्किल हो जाता।उसे रीतू का इतने प्यार से एक नन्ही बच्ची की तरह चिपकने से उस पर प्यार भी आ रहा था और सिहरन भी हो रही थी।आखिर हनीमून पर वह निकले थे। भाभी जी ने पहले से इस हिल स्टेशन पर बुकिंग करा दी थी। रीतू बहुत खुश थी लेकिन उसे इन रास्तोंमें एक अनजाना डर लगता था। 


        कुछ ऊपर आने पर अब थोड़ी सी सड़क समतल हुई थी लेकिन सामने दो किलोमीटर का माइल स्टोन अभी भी मुंह चिढ़ा रहाथा। ड्राइवर ने एक रास्ते में एक छोटा सा सुंदर ढाबा देखकर कार रोक दी और बोला--


"सर, आप लोग चाय - नाश्ता लेकर थोड़ा सा आराम कर लीजिए, दो किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई है मैडम जी भी रिलेक्स हों लें। "


कार के अंदर पता ही नहीं चल रहा था किंतु बाहर आते ही ठंडी हवा का झौंका उसके बदन में सिहरन दे गया, उसने रीतू सेशाल ओढ़ कर बाहर आने के लिये कहा। सामने छोटे से ढाबें में एक बुजुर्ग और एक लगभग पन्द्रह साल की लड़की थे। उसे आते देखलड़की उनके पास आ गयी और नमस्कार करते हुए बोली-


"साब, क्या लेंगे? "


उसने रीतू की ओर देखा जो पहाड़ी के नीचे, ऊंचे ऊंचे पेड़ो के बीच सर्प सी बलखाती बहती हुई नदी को एकटक देख रही थी। उसकी बातपर चौंक कर उसकी ओर देख कर बोली--


"मुझे अब हल्की सी भूख लग रही है। "


चढाई के डर से कि कहीं उल्टी न हो जाये, रीतू कुछ खाया भी नहीं था। उसने उस लड़की की ओर देखा जो उसके उत्तर की प्रतीक्षा मेंखड़ी थीl


"गर्म गर्म क्या बन सकता है?"


"-साब, आप कहें तो भजिया तल दूं।" 


उसने हां में सर हिला दिया तो वह चली गयी, वह बुजुर्ग धीरे धीरे सर झुकाये प्याज काट रहा था। 


आकाश में उड़ते हुए बादल इतने पास आ गये थे कि रीतू बच्चों की तरह पकड़ने की कोशिश कर रही थी, उसके उड़ते हुए बाल उसकेगालों को ऐसे छू कर ढक रहे थे, जैसे मानों आकाश पर चांद को बादल ढकने की नाकामयाब कोशिश कर रहे हों और चांद अठखेलियाँकरता हुआ, बादलों को परे करता हुआ, बाहर आ जाता था। चारों ओर रंगीन फूलों के पौधे लगे थे और फूलों सी भीनी भीनी खुशबू आरही थी। सचमुच बहुत खूबसूरत जगह थी।  वह और रीतू एक बड़े से पत्थर पर बैठे हुए गर्म गर्म भजिया खा रहे थे, तभी रिमझिम करता हुआ पानी गिरने लगा और रीतू भजिया मुंह में डाले हुए आपनी हथेलियों में पानीकी बूंदो को समेटने लगी। अचानक बादलों मे जोर से बिजली चमकी और बहुत तेज गड़गड़ाहट की आवाज आई, रीतू डर कर उसकेसीने से लग गयी। बारिश तन मन को भिगोंने लगी थी, वह अपनी बाहों में रीतू को उठाये, उस झोपड़े नुमा ढाबें में आ गया। 


तभी वह बुजुर्ग तेजी से मुमताज़ भींग जायेगी, बिट्टो मेरी मुमताज भींग जायेगी कहते हुए एक छाता लेकर बाहर की ओर भागे, उसछोटी लड़की ने उनके हाथ पकड़ रखे थे और कुछ समझा रही थी लेकिन वह बाहर बरसते पानी में जाने की जिद कर रहे था। वह बार बार कोशिश कर रहे था कि बाहर चला जाये, तब लड़की ने पानी के साथ एक गोली उन्हें खिला दी, जिससे थोड़ी देर बाद नींद आ गयी और वह सो गये। 


 बाहर जोर से बारिश हो रही थी और वह दोनों ढाबे में बनी बेंच पर बैठे हुए थे। मन में उत्सुकता हुई और उसने उस भोलीलेकिन खूबसूरत छोटी लड़की से पूंछा--


"ये तुम्हारे अब्बा हैं? "


वह लड़की एक पल अपनी बड़ी बड़ी आंखो से उसे देखती रही फिर बोली - 


"हां साब, यह मेरे बाबा हैं। हम हिंदू हैं। "


"लेकिन यह तो किसी मुमताज का नाम ले रहे थे? "


वह एक मिनट चुपचाप बारिश की बूंदों को देखती रही फिर बोली-


"बाबा ने बताया था, मेरी मां को प्यार से मुमताज कहते थे। मेरी मां का नाम वैसे तो लाजवंती था। वह यादों में खो गयी-

--मेरे बाबा,वन विभाग में थे और उनकी ड्यूटी हिल स्टेशन के एरिया में लगी थी। एक बार उनकी बस यहीं पास में पंचर हो गयी, तब मेरेनाना और मेरी मां एक छोटा सा ढाबा चलाते थे। वह यहीं आकर चाय पी रहे थे और मेरी मां सभी को दौड़ दौड़ कर चाय दे रहीं थी। मेरीमाँ बहुत सुंदर थीं,बाबा ने उन्हें देखा तो देखते रह गये। उस दिन तो कुछ नहीं हुआ लेकिन अब बाबा जंगल में जांच के बहाने ढाबे पर उतरजाते और मां के हाथों भजिया चाय पीते और चुपचाप बैठे रहते और छुप छुप कर मां को नजरें छुपा कर ताकते रहते थे। रात की बस सेवापिस चले जाते। जब बार बार यही होने लगा तो मेरी मां को कुछ अंदेशा हुआ कि यह चाय का बहाना करके आते हैं, कारण कुछ औरही है। और उन्होंने ने नाना से यह बात कही। तब नाना ने भी इस बात को महसूस किया था, इसलिये एक दिन उन्हें आने के लिए मना करदिया। 


                एक दिन मेरे बाबा आये और नाना से अपनी शादी की बात कर बैठे लेकिन नाना ने कह दिया कि मैं अपनी बेटी की शादी, किसी बाहरी आदमी से नहीं करूंगा और मेरी एक ही लड़की है जो मेरा सहारा है, मैं तो ऐसे व्यक्ति से शादी करूंगा जो मेरे साथ ही रह सके। मेरे बाबा मां को इतना प्यार करते थे कि उन्होंने कह दिया कि वह नौकरी छोड़ कर इसी ढाबे में रह लेंगे। बाबा ने ऐसा किया भी अंत में नाना ने मां की शादी कर दी। 


 अब बाबा नीचे जाकर सामान लाते और मां चाय - पकोड़े बनाती। एक दिन नाना जी नहीं रहे। मां भी बाबा को बहुत प्यार करती थी। बाबा बताते थे कि वह जब तक सामान लेकर लौट नहीं आते, वह न खाना खाती और न सोती। धीरे धीरे बाबा और मां ने मेहनतकरके ढाबे के चारों और फूल के पौधे लगाने शूरू कर दिये, पानी की बोतल, बिस्कुट - नमकीन आदि सामान रखने लगे और अब उनकी मेहनत और लगन से बहुत गाड़ियां यहां पर रूकने लगीं। वह बताते बताते रूक गयी। ठंडी लगने लगी थी, हम लोग भट्टी के पास आ गये। 


"बावू साब, एक बार और गर्म गर्म चाय बना दूं। ठंडी कुछ ज्यादा ही हो रही है। "


उसका आग्रह न टाल सके, उसे और रीतू को वाकई ठंडी लग रही थी और हम उसकी पूरी कहानी जानने के लिए उत्सुक थे। उसने चायछान कर दी और बोली-


"-बाबू साब,बाबा ने बताया था कि एक दिन ऐसी ही पानी की बारिश हो रही थी, इसलिये नीचे से गाड़ियों का आना रोक दिया गया था, बाबा और मां उस चट्टान पर बैठे पानी का आंनद ले रहे थे।अचानक मां ने पूछा कि -


"आप तो पढ़े लिखे थे फिर मुझसे शादी क्यों की? मुझ में आपने ऐसा क्या देखा कि अपनी नौकरी भी दांव पर लगा दी।" 


बाबा ने कहा था कि--"तुम तो मेरी मुमताज हो।"


मां चुपचाप बाबा को देखती रही और बोली -" यह मुई, मुमताज़ आपकी कौन है?"


 तब बाबा ने शाहजहां और मुमताज़ के बारे में बताया कि शाहजहां मुमताज को इतना प्यार करते थे कि मरने के बाद ताजमहल बनवाया जिसको देखने के लिए बाहर से लोग आते हैं। तब मां ने हंसते हुए कहा था कि-


"मेरे मरने पर आप भी ताजमहल बनबाओगे न! ताकि लोग देखने आयें? "बाबा ने उस दिन तो मां का मुंह अपनी हथेली से बंद कर दिया था। 


    मैं उस समय छै माह की थी, बाबा सामान लेने नीचे शहर गये हुए थे कि अचानक बारिश होने लगी और दूर पहाड़ी पर बादल फटगया। पानी की तेज धारा बहने लगी और ढावे की मिट्टी कटने लगी थी। मां घबराई हुई बहुत कोशिश कर रही थी कि धारा का मुंह ढाबे से मुड़ जाये,वरना उनके सपनों की दुनिया बिखर जायेगी इसलिए जितने पत्थर उठा सकती थी, धारा को रोकने के लिए डालती रहीं लेकिन धारा तेज थी।


सुबह आकाश खुला, बाबा लौटे तो ढाबा तो बचा था लेकिन मां अंदर नहीं थी, मैं अकेली पड़ी रो रही थी, जब खोजा तो उस बड़े पत्थर में उनका मृत शरीर फंसा था, शायद मुझे और ढाबे को बचाने के लिए स्वयं धारा के सामने रूकावट बन कर बैठ गयीं होगी लेकिन ठंडे पानीऔर उसके प्रवेग से वह अपने को नहीं बचा पाई, किंतु धारा का रूख मोड़ने में सफल हो गयी थी। तब बाबा मानसिक संतुलन खो बैठे थे और उस चट्टान पर जब मां की अंत्येष्टि की गयी थी, तब से जब भी बारिश होती है, उन्हें मां की याद आ जाती है और दौरा सा पड़ जाता है। उस चट्टान पर कभी कपड़ा ढक देते हैं, बारिश होती है तो छाता लेकर खुद भींगते हुए खड़े रहते हैं और यही कहते हैं, यहाँ मेरी मुमताज लेटी है। 


हां वह ताजमहल तो नहीं बनवा पाये लेकिन पूरे पहाड़ी पर फूलों के पौधे लगा दिये और यह जगह पर्यटकों के लिए एक पोइंट बन गयी। उसके बाबा की नींद खुल गयी थी वह उठ कर बैठ गये। बारिश हल्की हो गयी थी ,वह चुपचाप छाता लेकर उस चट्टान के पास खड़े होकर उस खाली चट्टान को कपड़े से आहिस्ता आहिस्ता प्यार से पौंछ रहे थे, मानो अपनी मुमताज़ को सहला रहे हों और फिर छाते से ढककर खड़े हो गये। रीतू चुपचाप उस चट्टान को देख रही थी, फिर उसके कंधे पर सर रख कर उसकी आंखों में देखते देखते हुए बोली-


"क्या तुम भी मुझे इतना ही प्यार करोगे, मुमताज की तरह-? "


न जाने क्यों--उस बारिश में भींगते हुए अपने प्यार की ज्योति जलाये उस मोहब्बत के शाहजहां को देखकर उनकी आंखें नम हो गयी।वह दोनों भी बारिश मे बाहर आ गये। 


आज उनका तन और मन दोनों प्यार की बारिश में भींग गये थे। ऐसा लग रहा था जैसे उस चट्टान पर प्रेम की मलिका मुमताज़ आज भीअपनी खूबसूरती समेटे लेटी हो और फूलों से लदी वादी उसका ताजमहल हों जो उसके शाहजहां ने अपने हाथों से बनाया था। और उन महकती सुनसान वादियों में बहती हुई हवाओं के साथ मोहब्बत-ए-मुमताज कह रही हो कि प्यार के को संगमरमर और संपन्नता की दरकार नहीं होती बल्कि यह तो कहीं भी और कभी भी दिल की गहराईयों से उभरते अहसास - ए-इश्क और रक्त - ओ-जिगर से मिलकर सुनसान और वीरान पहाड़ों को भी अपनी मोहब्बत की इबादत से महका कर ताजमहल बना देता है। अभी भी हल्की बारिश हो रही थी लेकिन प्यार के दीवानों को इसकी परवाह कहां थी। वह दोनों उस अदृश्य ताजमहल को अटल देख रहे थे। 


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi story from Romance