Sushma s Chundawat

Tragedy

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Sushma s Chundawat

Tragedy

दुर्घटना

दुर्घटना

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एक बहुत बड़ी आपदा आयी थी पूरे जंगल में..सभी जीव-जन्तुओं में भय फैला हुआ था। आपदा से निपटने के लिए कोई कारगर समाधान नहीं मिल पा रहा था।

जंगल के राजा द्वारा सभी पशुओं को अपने-अपने घरों में रहने तथा पूर्ण सावधानी बरतने के आदेश जारी कर दिए गए थे। डरे-सहमे जीव आदेशों का यथासम्भव पालन भी कर रहे थे परंतु हिरणों के समुदाय में एक गंभीर समस्या आ गयी थी, कुछ हिरण जो समुदाय के साथ नहीं थे, अन्य किसी जंगल में अटक गये थे, किसी कारण-वश उनमें से एक की मृत्यु हो गयी थी। मरने वाला हर दिल अजीज था अतः उसके अंतिम समय में शामिल होना अनिवार्य हो गया था परंतु जंगल के राजा का आदेश था कि किसी भी स्थान पर एक साथ ज्यादा भीड़ इकट्ठी नहीं हो सकती थी, इसलिए सभी हिरण एक साथ नहीं जा सकते थे अतः हिरण समुदाय के एक वयोवृद्ध सबके प्रतिनिधि बनकर जाने हेतु तैयार हुए, उनका ख्याल रखने हेतु एक युवा हिरण भी साथ रवाना हुआ।

दोनों गंतव्य की ओर चल दिये, अकस्मात् वे असावधानीवश एक ऐसे रास्ते की ओर मुड़ गये, जो भीड़ भरे कस्बे से गुजरता था और उनके लिए सुरक्षित नहीं था। एक बड़ी संख्या में भीड़, जिनके लिए हर राहगीर मात्र एक शिकार होता था, रास्ते में घात लगाकर बैठी हुई थी। भीड़ में कौन-कौन शामिल था? कौन से जानवर उस भीड़ का हिस्सा थे? कितने बालिग़, कितने नाबालिग थे? पढ़े-लिखे या अनपढ़ थे? इन सब प्रश्नों का कोई मतलब नहीं क्योंकि भीड़ की कोई पहचान नहीं होती !

ज्यों ही दोनों हिरण उनके इलाके में पहुंचे, भीड़ ने उन पर हमला बोल दिया। क्यों? किस लिए? स्पष्ट कारण किसी को ज्ञात नहीं।

सोची समझी साज़िश थी या महज एक संयोग कि आपातकाल और जंगल के राजा के आदेश के बावजूद इतनी भीड़ एक साथ इकट्ठा हो गयी !! सब कुछ अनुत्तरित है, बस यह पता है कि आत्मरक्षा के लिए दोनों हिरण भागे और संयोग से उन्हें जंगल की प्रजा के रक्षकों का साथ भी प्राप्त हो गया।

अब हिरण भयभीत नहीं थे, उन्हें अपने रक्षकों पर पूर्ण रूप से भरोसा था कि वे उन्हें बचा लेंगे, आखिर अनेक अपराध करने वालों को भी तो ये रक्षक अपनी निगरानी में न्याय के दरवाज़े तक महफ़ूज लेकर जाते ही थे, खूंखार अपराधी भी रक्षकों की वजह से ही भीड़ में से होते हुए कारागृह की ओर सुरक्षित ले जाये जाते थे, रक्षक दल उनका हाथ मज़बूती से थामें रखते थे, भीड़ के हमले से सुरक्षित रखते हुए और वो दोनों तो अपराधी भी नहीं थे, निश्छल मन के भोले-भाले जीव भला किसी का क्या बिगाड़ते।

अतः दोनों हिरण अब निश्चिंत हो कर रक्षक का हाथ थामे भीड़ के बीच में से होते हुए सुरक्षित इलाका पार करने के मानस से चल दिये परंतु अफ़सोस इस बार रक्षक स्वयं शेर की खाल में भेड़िया बनकर आया था, ज्यों ही दोनों हिरण भीड़ में से होते हुए गुजर रहे थे, रक्षक ने सहसा उनका हाथ छोड़ दिया।

इस धोखे से दोनों हिरण हतप्रभ रह गए, वयोवृद्ध हिरण ने बार-बार हाथ थामने का प्रयास किया परंतु हाय भाग्य ! पत्थर दिल द्वारा बेरहमी से उसके हाथ झटक दिये गये और अंततोगत्वा वे भीड़ की भेंट चढ़ गए।

वयोवृद्ध हिरण की आंखों में मरते वक्त भी भोलापन था, रक्षक पर भरोसे की चमक थी और होठों पर एक मासूम सी मुस्कान, ठीक वैसी ही जैसे ईसा मसीह की सूली पर चढ़ते वक्त उनकी मधुर मुस्कुराहट, ठीक उसी तरह जैसे ज़हर का प्याला पीते वक्त मीरा की मीठी मुस्कान पर सब एक झटके में खंडित हो गया ! बस रह गए हिरणों के उधड़े शव और रक्षक द्वारा किया गया एक अकल्पनीय विश्वासघात !!

कानून का अंधापन तो सुना था परंतु रक्षक का विश्वासघात ! अत्यंत शर्मनाक था !!



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