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Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Romance Fantasy


4  

Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Romance Fantasy


दिव्य शक्ति (6)

दिव्य शक्ति (6)

10 mins 165 10 mins 165

दिव्य शक्ति (6) ..

अनन्या से मेरी, तीन मुलाकातें और हुईं थीं और 2 वर्ष बीत गए थे। अनन्या के एक्सीडेंट वाले दिन के बाद ऐसे उससे, मेरी कुल 5 भेंट हुई थी। जो सभी हमारे पेरेंट्स की उपस्थिति में हुई थीं। 

अनन्या, मेरी छोटी बहन आयुषी की फ्रेंड हो चुकी थी। ऐसे में यह सहज बात होती कि अनन्या, आयुषी की देखा देखी मुझे, भैया संबोधित करने लगती। तब भी, अब तक मेरे से हुए उसके संक्षिप्त वार्तालाप में उसने, कभी मुझे भैया नहीं कहा था। बल्कि यह भी तथ्य था कि मुझे, देखने के बाद उसकी पलकें झुक जाया करती थीं। 

मैंने अनन्या को लेकर जब कभी भी विचार किया था तब उसे अपनी बहन जैसे नहीं सोचा था। उसे प्रेयसी, जैसा देखना मेरे लिए गए संकल्प, अनुसार इस समय के लिए वर्जित था। अपनी भावनाओं पर तो मेरा नियंत्रण था मगर यदि अनन्या, मुझे अपने ह्रदय में अपने साजन जैसा स्थान देती हो तो उस पर मेरा कोई वश नहीं था। 

मेरा छठा सेमेस्टर पूरा हुआ था और मैं, अवकाश में घर आया हुआ था। तब एक दिन अनन्या घर आई। अभी मैं, बीस वर्ष का और वह 17 वर्ष की थी। अन्य बार से अलग इस बार वह अपनी मम्मी के साथ न होकर, अकेली कार खुद लेकर आई थी। मैंने, उसे कार से उतरते हुए देखा था। मुझे लगा वह आयुषी से मिलने आई है। 

कुछ देर में आयुषी, अनन्या को लेकर मेरे पास आई एवं मुझसे बोली - 

भैया, अनन्या आपसे बात करना चाहती है। तब मैंने, अनन्या की ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा था। इस क्रिया में हमारी आँखे मिली थीं। रैनबो रेज़ का आदान प्रदान हमारी आँखों में होता हुआ, मैंने फिर देखा था। इससे मुझे यह स्पष्ट समझ आ गया कि हम दोनों के बीच विशेष कुछ है। जिसे मैं नहीं जानता हूँ। 

फिर अनन्या ने पलकें झुका ली थीं। ऐसे ही अपनी पलकें झुकीं रखते हुए अनन्या ने, हाथ जोड़कर मुझसे नमस्कार किया था। मैंने भी हाथ जोड़कर उसका अभिवादन किया था। तब वह कुछ बोलती इसके पूर्व ही मैंने, अनन्या से पूछा - आपके पास ड्राइविंग लाइसेंस है?

वह डर गई थी उत्तर में कहा - नहीं, अभी मेरी लाइसेंस की उम्र नहीं हुई है?

मैंने थोड़े शुष्क स्वर में कहा - आप, पिछले हादसा भूल गई हो क्या? 

अनन्या ने दबी आवाज में कहा - मैं, ड्राइवर के साथ में होने पर ही कार चलाया करती हूँ। आज ड्राइवर काका, नहीं आये हैं। आपसे बात करनी थी इसलिए अकेली आ गई, सॉरी। 

अनन्या के ऐसे डरने से मुझे उस पर दया आई। मैंने स्वर में मिश्री घोलते हुए कहा - 

चलो, आगे ध्यान रखना। (फिर पूछा) बताओ क्या बात करनी है?

अनन्या अब सहज हुई, उसने कहा - 

मेरा मेडिकल प्रवेश परीक्षा का परिणाम आ गया था। मुझे, आपके वाले कॉलेज में ही एडमिशन मिल रहा है। कल कॉलेज जाकर प्रवेश की औपचारिकताएं पूरी करनी है। 

मैंने बीच में ही अनन्या की बात काटी और प्रसन्नता से हँसते हुए कहा -

अनन्या बहुत बहुत बधाई, आप ने डॉक्टर बनने का लक्ष्य रखा था। इससे वह, अब आपके लिए सुलभ हो गया है।

तब आयुषी ने अनन्या के गले में बाहें डालकर, उसके गाल पर चूमते हुए कहा - वाह वाह अनन्या! बधाई, बधाई, बहुत बहुत बधाई! 

आयुषी ने शरारत से हर बधाई कहने के बीच में, अनन्या के गालों को चूम लिया था। मेरे सामने होने के कारण, आयुषी की इस हरकत पर, अनन्या लजा गई थी। ऐसे में उसके मुख पर सूर्योदय की सी लालिमा उभर आई थी। तब उसका किशोरवय आभावान मुखड़ा, सूर्य के भांति ही दमक गया था। उसकी घनी पलकें झुक गईं थीं। 

मैंने, आयुषी की शरारत के लिए, उसे आँखें दिखाई थीं। आयुषी ने, अपने कान पकड़ कर, आँखों में ही क्षमा याचक से भाव दिखाए थे। अनन्या की पलकें झुकी होने से, वह इसे नहीं देख सकी थी। 

तब सप्रयास अनन्या ने स्वयं को संयत किया था। उसने अपने साथ लाया मिठाई का उपहार पैक मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा - 

यह मम्मी ने आप सभी का मुहँ मीठा कराने के लिए भिजवाया है। मैंने, वह पैक ग्रहण किया था। 

उसे छेड़ने वाली कोई बात न कहते हुए मैंने, स्नेह एवं सरलता से कहा - आभार, आपका। 

अनन्या ने तब पूछा - मुझे यह पूछना है कि क्या कल आप, मेरे साथ कॉलेज चल सकते हैं? कल पापा, ज्यादा व्यस्त रहने वाले हैं। 

मैंने कहा - बिल्कुल अनन्या, मैं चल सकता हूँ। 

अनन्या ने कुछ कहने की जगह हाथ जोड़कर ही, आभार प्रदर्शित किया था। फिर वह आयुषी के साथ अलग कमरे में चली गई थी। 

अगले दिन मैंने, अनन्या को उसके घर से पिक किया था। मुझे स्मरण आया कि कार में इसके पूर्व जब, वह मेरे साथ थी तब, अचेत होने के कारण, मेरे द्वारा पिछली सीट पर लिटाई गई थी। यह पहली बार था कि आज वह, मेरे साइड वाली सीट पर बैठी थी। 

मुझसे पिछली भेंटों की अपेक्षा इस बार, उसमें पूर्ण आत्म-विश्वास दर्शित था। मैं, चुप ही कार ड्राइव कर रहा था। तब सामने सड़क की ओर देखते हुए उसने मुझसे कहा - आपको एक बात बताऊँ? आप विश्वास नहीं करेंगे। 

मैंने सरलता से कहा - हाँ, कहो। 

अनन्या ने कहना आरंभ किया - 

दो अवसरों पर एक विचित्र बात, मैंने अनुभव की है कि मेरी आँखे, जब आपकी आँखों से मिलती हैं तब, आपकी और मेरी आँखों से मुझे, रेनबो रेज़ निकलती और आँखों में प्रविष्ट होते दिखती हैं। पहली बार जब ऐसा हुआ तब मुझे, यह अपना भ्रम लगा। साथ ही मैंने सोचा कि यदि यह अगर, मेरी आंखों का कोई रोग होता तो मुझे, अन्य किसी को देखते हुए भी ऐसा लगना चाहिए था। मगर अन्य किसी को देखते हुए मेरे साथ, ऐसा कभी नहीं हुआ। 

फिर जब कल मैं, आपसे मिली तब दूसरी बार, मेरी और आप की दृष्टि आपस में मिलने के समय मैंने, ऐसा अनुभव पुनः किया है। क्या आप, विश्वास करते हैं कि ऐसा होना संभव है? और अगर ऐसा हो रहा है तो क्या यह सामान्य बात है?

अनन्या के बताने से मुझे पुष्टि हो गई थी कि हमारे बीच ऐसा होता है। 

तब भी अनन्या को उत्तर देते हुए मैं, अत्यंत सतर्क रहना चाहता था। 

मैं नहीं चाहता था कि इसके पीछे दिव्य शक्ति होने की बात, अनन्या से कही जाने से ऐसा प्रचार हो जाए। मैंने कहा - 

अनन्या, यह कोई असामान्य बात नहीं है। ऐसा होने में मुझे, विशेषता मात्र यह लगती है कि आप, मुझे, अन्य सभी से अलग दृष्टि से देखती हो। 

अनन्या ने तब कहा - जी हाँ, यह बात तो है। आपने उस दिन मेरे प्राण रक्षा किये थे। अतः मेरी दृष्टि, आपको विशेष श्रद्धा से देखती है। 

इस पर मैंने कहा - आपके प्राण रक्षा मैंने नहीं, आपके पापा के उपचार ने किये थे। आपको, मेरे प्रति ऐसी श्रद्धा रखने की आवश्यकता नहीं है। 

अनन्या ने कहा - 

मुझे, मम्मी ने बताया था कि उस समय आपको कार चलाना ठीक से नहीं आता था। तब भी आपने, मुझे गंभीर घायल देखा तो आप किसी संभावित हादसे की परवाह नहीं करते हुए, कार से मुझे, शहर के बीच स्थित इंटरनेशनल हॉस्पिटल तक ले आये थे। ऐसे में क्यों मैं, आपको अपना नवजीवन प्रदाता नहीं मानूं?

मैं ऐसा श्रेय नहीं चाहता था अतः मैंने कहा - अनन्या इसे दूसरे कोण से देखो, मैंने ऐसा करके तब कितने राहगीरों और वाहनों पर दुर्घटना की आशंका उत्पन्न कर दी थी। 

अनन्या सरल हृदय लड़की थी। उसने सहमति से सिर हिलाते हुए कहा - 

जी हाँ, यह बात तो थी। किसी भी नौसिखिया को ऐसे अन्य किसी के ऊपर खतरा नहीं बनना चाहिए। मगर आपने, मेरे प्राणों पर संकट देख यह खतरा उठाया था। यह भी तो सत्य है,ना? 

मैं, चुप रह कर यह विषय बदलना चाह रहा था। मैंने, यह दर्शाया कि मेरा पूरा ध्यान अपने वाहन चालन में सड़क पर है। तब अनन्या ने अगली बात में मुझे घेर लिया था। 

उसने कहा - मैं, आपको विस्मित कर देने वाली एक और बात बताना चाहती हूँ। 

मैं ने संदिग्ध दृष्टि से उसे निहारा इसी क्रम में, हमारी आंखें मिली और फिर इंद्रधनुषी किरणों ने हमारी आँखों से आँखों तक जाने आने का मार्ग तय किया। 

इसे देख अनन्या ने फिर कहा - ओह! देखिये फिर वही किरणें। क्या आपने देखीं?

मैं असत्य कहना नहीं चाहता था। मैंने, अपने कंधे यूँ उचकाए जैसे कह रहा हूँ कि कैसी विचित्र बात करती हो,अनन्या? फिर अपनी दृष्टि सड़क पर केंद्रित कर ली। 

अनन्या आगे बताने लगी - 

हाँ, मैं बता रही थी कि दो वर्ष पहले जब आपकी और मेरी आँखों के बीच मैंने, इन इंद्रधनुषी किरणों को देखा था। तब से एक और बात मैंने अनुभव की है कि मेरी कुछ फ्रेंड्स, जिनके कुछ बॉयफ्रैंड्स थे और जो स्कूल में पढ़ने की जगह बेकार की बातों में पड़ती थीं, उन्होंने तब कुछ ही दिनों में ऐसी बात एवं हरकतें करनी बंद कर दीं थीं। बल्कि यह कहना ज्यादा उचित होगा कि दो वर्षों में हमारा स्कूल लड़कियों के चाल चलन की दृष्टि से आदर्श सा हो गया है। 

अब मुझे लगा कि मेरे साथ की दिव्य दृष्टि, अनन्या के साथ भी काम कर रही है। अंतर यह बस है कि मुझे दिव्य शक्ति साथ होने का आभास है, अनन्या को नहीं है। 

यही सोचते हुए मुझे शंका हुई कि मुझे मेरा बारहवीं की परीक्षा के समय सपना देने वाली दिव्य शक्ति का डेरा, उस दुर्घटना स्थल पर था। उसी ने एक दुर्घटना के बहाने वहाँ अनन्या एवं मुझे इकट्ठा कर दिया था। संभवतः तब ही वह दिव्य शक्ति, मुझमें और अनन्या में समा गई। फिर दिव्य शक्ति ने मुझसे भली प्रकार से कार चलवा दी थी। उस समय मैं, पूर्ण चेतन अवस्था में था एवं अनन्या अचेतन थी। अतः दिव्य शक्ति की तीव्रता का अंतर दोनों में रह गया है। 

मुझे, विचारों में खोया देख अनन्या चुप रही थी। तभी हम कॉलेज की पार्किंग में पहुंच गए थे। ऐसे मुझे, अनन्या से इस विषय में आगे क्या कहना चाहिए और क्या नहीं, यह विचार करने का समय मिल गया था। 

कॉलेज में अनन्या की प्रवेश औपचारिकताएं पूर्ण करने में हमें अढ़ाई घंटे लगे थे। इस बीच हमने, कैंटीन में कॉफी भी पी थी। अब अनन्या से बात करते हुए, अनन्या से ज्यादा, मेरी पलकें झुकी हुईं थीं। मै अनन्या को इंद्रधनुषी किरणों पर फिर चर्चा का अवसर नहीं देना चाहता था। 

कॉलेज से लौटते हुए हम कार में फिर अकेले थे। आज जैसे अनन्या ने मुझे छेड़ने की जैसे शपथ ले रखी हो। 

कार कॉलेज गेट से बाहर निकलते ही उसने मुझसे पूछा - एक और अचंभित करने वाली बात बताऊँ, आपको? 

जैसे मैं, उससे हार गया हूँ, ऐसे समर्पण करता हुआ सा मैंने कहा - 

अनन्या हाँ बताओ, घर पहुंचने तक कोई तो बात करनी ही होगी, आप वही कह दो। 

अनन्या ने तब बताया - आज रात आप मेरे सपने में आये थे। आप इंद्रधनुष के रंगों का अर्थ मुझे बता रहे थे। 

ओह, मैं इन देवी के सपने तक में पहुंच गया, विचार करते हुए मुझे, हँसी आने को हुई जिसे, सप्रयास मैंने रोक लिया। फिर जिज्ञासा एवं अचरज से मैंने पूछा - 

भला रंगों में कैसा अर्थ होता है जो सपने में ही सही मैंने, आपको बताया है। 

तब अनन्या ने कहा - इसे रंगों में अर्थ कहिये यह इन का संदेश कहिये आप मुझे बता रहे थे कि -

एक दिव्य दृष्टि होती है। जिसके पास यह होती है उसकी आँखों से इंद्रधनुषी किरण निकलती है। इस दृष्टि से निकले रंग मानवीय दृष्टि में बुरी नीयत वाले दोषों का उपचार करते हैं। जिन आँखों में, एक बार दिव्य दृष्टि से उत्सर्जित यह इंद्रधनुषी किरण प्रविष्ट हो जाती है। उन आँखों की दृष्टि निर्मल हो जाती है वे आँखें यदि पुरुष की हों तो रंग अनुसार आदर्श संस्कार ग्रहण कर लेती हैं। उनकी आँखों के माध्यम से हृदय में यह स्थाई भाव समा जाते हैं - 

(बैगनी) - बहन बेटी को विश्वास दिलाता है कि उन्हें 

(आसमानी) - आदर पूर्वक एवं उनके आत्मसम्मान से समाज देखेगा। वे 

(नीला) - निर्भया रहकर जीवन यापन कर सकेंगी। वे 

(हरा) - हत्या-दुराचार एवं पुरुष छल की आशंका से मुक्त होंगी। उन पर पुरुष दृष्टि 

(पीला) - पिता-भाई जैसी स्नेहमयी होगी। हमारे समाज में माँ, बहन, बेटी एवं पत्नी का 

(नारंगी) - नारी गरिमा सहित जीवन, विश्व के लिए प्रेरणा बनेगा कि कैसे संपूर्ण नारी जाति, भारतीय नारी का अनुसरण करे। जिससे उनमें 

(लाल) - लाज का होना, विश्व में उन्हें, मनुष्य नहीं देवी तुल्य प्रतिष्ठित होना सुनिश्चित करे। 

ऐसे ही इंद्रधनुषी किरण यदि किसी पथभ्रष्ट नारी की आँखों में प्रविष्ट होती है तो उसका असर ऐसी नारी की दृष्टि ठीक कर देगी। उसमें नारी गरिमा का वास हो जाएगा। तब कोई पुरुष, उसके द्वारा छले जाने से निर्भय रहेगा। 

मैं कार चलाता जा रहा था एवं मंत्रमुग्ध, अनन्या को सुन रहा था। अनन्या चुप हो चुकी थी। 

मैं सोचने लगा था कि कदाचित दिव्य शक्ति ने, समाज को प्रभावित कर सकने में कम समय लगाने के लिए, अनन्या को भी माध्यम बना लिया है।     

(क्रमशः) 


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