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Dr Jogender Singh(jogi)

Abstract


4.0  

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धरती का सितारा

धरती का सितारा

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ख्याली राम और सोहन लाल, दोनों थोड़ा बहुत मिलते । हां ! एक बात जो दोनों की शत प्रतिशत मिलती, वो है आधा दर्जन बच्चे। ख्याली राम के चार लड़के , दो लड़कियां तो सोहन लाल के तीन लड़के , तीन लड़कियां। क्यों दोस्ती है दोनों की । यह सभी के लिए जलने का कारण ।

"सुन सोहनू (सोहन लाल) एक बात पक्की है, जब तक शरीर में जान है, तभी तक की दोस्ती है। ननकी ,चाची ने सोनू के कान में फुसफुसाया , इधर उधर झांका फिर बोली, "बड़े बाप का बेटा है ख्याली , उसको क्या कमी। पक्का लिंटर वाला मकान है, इतनी सारी ज़मीन । तुम्हारे पास क्या रखा है। ले दे कर यह शरीर ! इसको भी उसके पीछे खपा दोगे तो बुढ़ापे में क्या होगा तुम्हारा?"

"सही कह रही हो चाची, भगवान कुछ न कुछ इंतजाम करेगा , बुढ़ापे में भी !" सोहनू झिझकते हुए बोला।"देख लो ! मेरा मन नहीं माना , तो बोल दिया , अपना समझ कर, बाकी तुम्हारी मर्ज़ी" चाची ज़ोर से बोली।

"बात तो तुम्हारी ठीक है चाची , पर ख्याली ऐसा नहीं है।

" हां भई वो तो देवता है'', ज्ञानू की याद है, पिर्थू (पिर्थ्वी सिंह) के लिए जान दे दी , बाद में चोर भी बता दिया बेचारे को। याद है ना।"सुन ! थोड़ा चौकस रहो । यह लो चाय पी लो ।"

" अरे चाची! चाय तुम पियो , अभी तो ख्याली ने पिलाई थी चाय। अरे , गरीबों की भी पी लिया करो कभी कभी। गुड़ की बनाई है , फ़ायदा करेगी । और यह चीनी तो सुना है , जानवरों की हड्डियों से साफ़ की जाती है। घोर कलियुग आ गया। धर्म भ्रष्ट कर के ही मानेंगे।"

"सुना तो है ,''सोहनू बीड़ी सुलगाते हुए बोला, पर दूध फटता नहीं चीनी की चाय में। गुड़ की चाय में एकदम से डाल दो ,तो दूध फट जाता है।"

"अरे धीरे धीरे ऊंचे से धार बना कर डालो तो कभी नहीं फटता । मैं तो सालों से बना रही हूं। यह चीनी /डालडा सब अब आएं हैं। हड्डिया कमज़ोर हो जाएंगी सबकी, आग लगे इस ज़माने में। ना आदमी असली , ना कोई सामान। और फूल (एल्युमिनियम) के बर्तन और आ गए, भगवान ही बचाए।"

"क्या कर सकते हैं ,। चाची ! ''चाय का आखिरी घूंट पीते हुए बोला। "लाओ ! गिलास धो दूं ! तुम्हारा भी, सोहनू ननकी का गिलास उठाता हुआ बोला।" "अभी आयेगी बहू धो देगी, रहने दे।

" हां ! धो तो देगी और एक घंटे सुनाएगी वो? लाओ मैं धो दूंगा।''सोहनू गिलास ले कर आंगन में आ गया। अच्छा चाची चलता हूं। हां बेटा ! ध्यान रखना अपना, कभी कभार मुझ बुढ़िया के पास भी बैठ जाया करो।

सोहन लाल कंधे पर रस्सी लटकाए , हाथ में कुल्हाड़ी लिए, सोचता जा रहा , ननकी चाची कह तो ठीक ही रही थी। क्या है मेरे पास ? खयाली के पास तो सब कुछ है। पर खयाली कितना ख्याल रखता है , मेरा। ननकी चाची भी ।कुछ भी बोलती है। तभी पैर में कांटा चुभ गया , अरे यह जूता एकदम बेकार हो गया है, । नया खरीदना है , पर कैसे खरीदूं? खयाली से मांग लूंगा उधार। पर अभी पिछला वापिस नहीं किया। मना कर दिया तो?

"किधर जा रहे हो ,तोपची ?और लंगड़ा कर क्यों चल रहे हो?" रघुनंदन ने आवाज़ लगाई।

"अरे ताऊ ! प्रणाम , लकड़ियां काटने जा रहा हूं, कांटा लग गया पैर में जरा सा", सोहनू बोला।

"बीड़ी पियेगा? "

"देर हो जायेगी , अभी पी कर आया हूं'' । 

 "सुन सुलगा ले , पीते हुए चले जाना । इसी बहाने , मै भी लगा लूंगा एक दो कश। आजा ! ऊपर आजा''। बुड्ढा मानने वाला नहीं , बीड़ी तो पीनी ही पड़ेगी, आगे से कभी इस रास्ते नहीं आऊंगा , सीढ़ी चढ़ते सोहनू सोच रहा था। कैसा चल रहा ? बीड़ी का बंडल निकालते रघुनंदन ने पूछा। "बढ़िया है सब, माचिस से दोनों बीड़ी सुलगाते हुए सोहन ने ज़वाब दिया।

"अच्छा मै चलता हूं, एक बीड़ी पकड़ाते हुए सोहनू उठ खड़ा हुआ।''

बड़ी जल्दी में हो"? 

 "रात हो जाएगी , बहुत काम है? अच्छा ताऊ।"।

सोहन तेज़ी से लकड़ियां काटने लगा। एक घंटे में काभी बड़ा ढेर लग गया। रस्सी बिछा कर उसने एके गट्ठर बांध लिया ।रस्सी को इस तरह बांधा कि पीठ पर लाद सके। बाकी लकड़ियों का ढेर जंगल में ही बना लिया। बाद में ले जाऊंगा । उसने बंधे बोझे को थोड़ी सी ऊंची जगह पर रख, पीठ पर खेस (ओढ़ने वाली मोटी सूती चद्दर ) फैला ली औरअपनी दोनों बाजू एक/एक तरफ बनाए रस्सी के फंदों में फंसा लिए । ज़ोर लगा कर बोझा उठाए घर की तरफ चल दिया।

आंगन में ज़ोर से लकड़ी का बोझा पटक , सुस्ताने लगा । "बहुत भारी है बापू'' केतकी ने पूछा।

"नहीं बेटा , ज़्यादा नहीं, पानी ले आ बेटा।" केतकी पीतल के लोटे में पानी भर लाई। सोहनू एक सांस में पूरा लोटा पी गया। केतकी पास आ कर बैठ गई । "बापू जंगल में शेर मिला?"

"नहीं बिटिया , अब शेर नहीं मिलते।"

"क्यों बापू? "आदमी ने सब को मार दिया।"

"खाना लगा दूं , केतकी के बापू'' दयमंती ने आवाज़ लगाई। लगा दे। हाथ मुंह धो अभी आया। कांसे की थाली में आलू बैंगन की सब्जी और रोटी रख दयमंती ने सोहन को दी। पहला कौर बड़े चाव से चबाकर ,

"आचार है क्या''?

" नमक कम हो गया क्या? " नहीं , नमक एक दम ठीक है , बस मन कर गया''। तुम तो डरा देते हो केतकी के बापू, एक फांक आचार देती हुई दयमंती बोली। पीतल के गिलास में छाछ भर रख दी दयमंती ने। एक बात बोलूं , सुशीला जवान हो रही है, लड़का देखो उसके लिए।

"बात तो तुम्हारी ठीक है, केतकी की मम्मी , देखता हूं।"

"सुनो ! ख्याली भैया से पैसों की बात कर लेना ।"

"ठीक , कर लूंगा।"खाना खत्म कर , बीड़ी सुलगाते हुए सोहन बोला।

आंगन में खटिया डाल सोहनू लेट गया । तारों को देख सोचता जा रहा , मेरे सितारे तो टिमटिमाए भी नहीं , जगमग क्या करेंगे। थका था, सोचते सोचते आंख लग गई।

कुत्ते के रोने की आवाज़ से सोहनू की आंख खुल गई । इतनी सुबह कुत्ता रो रहा? डर गया अनहोनी के अंदेशे से। फिर सुशीला के ब्याह के बारे में सोचने लगा, शादी साधारण ढंग से कर दूंगा । ख्याली से उधार ले लूंगा। लड़के कमाने लगेंगे तो वापिस चुका दूंगा। यही ठीक रहेगा। उसने संतोष की गहरी सांस ली । जाने कब उसकी आंख लग गई।

" उठो, उठो दयमंती झिंझोड़ रही थी उसको । क्या हुआ ? जल्दी से ख्याली भैया के घर जाओ , मदन (ख्याली का तीसरे नंबर का लड़का) आया है। क्या हुआ? पता नही , रो रहा है।" सोहन उठ कर भागा ।

"क्या हुआ मदन? "बापू उठ नहीं रहे" मदन रोते हुए बोला। भागता हुआ सोहन ख्याली के घर पंहुचा , ख्याली को आंगन में लिटा दिया था। निर्जीव , शांत ख्याली । 

तेहरवीं के बाद , जमुना ने सोहन को बुलवाया " भैया यह रुपए आप के नाम के जमा कर रखे थे इन्होंने । आपकी बेटियों की शादी में मदद करने के लिए। अब यह तो नहीं रहे , उनकी यह अमानत आप के लिए।" सोहन के आंसू थम नहीं रहे, /"दगाबाज चला गया बीच में छोड़ कर ।इतना तो कोई अपना भी न करता।"जमुना भी फूट फूट कर रोने लगी। ख्याली मुस्कुरा रहा है, ऊपर से बहुत ऊपर से अपने प्यारे दोस्त को देख। सितारा बना ख्याली। दूर आकाश में, धरती का सितारा।

 



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