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Vinita Rahurikar

Abstract

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Vinita Rahurikar

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देहरी

देहरी

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पीछे के दालान में बनी कोठरी के बंद दरवाजे पर नजर गढ़ाए बुआ स्तब्ध, आँखों में आँसू भरे खड़ी थी। बुआ के चेहरे पर ऐसी हताशा विवेक ने बीस वर्षों में कभी नहीं देखी थी। विवेक को सामने देख बुआ हड़बड़ा कर आँसू पोंछते हुए ऊपर अपने कमरे में चली गयी।

विवेक नजर घुमाकर कोठरी को देखने लगा " यहां तो अनाज आदि रखा जाता है, फिर इस दरवाजे को देखकर बुआ रो क्यों रही थी, वो भी भरी साँझ को।" 

कौतुहलवश वह वहीं खड़ा रह गया। दो ही मिनट बाद कोठरी का दरवाजा खुला और अपने कपड़े ठीक करती पुनिया थकी-हारी सी बाहर आयी और पिछले दरवाजे से बाहर हो गयी। अभी विवेक कुछ समझ पाता कि तभी चोरों की तरह फूफाजी वहां से बाहर आये। विवेक आड़ में हो गया, फूफा ऊपर घर में चले गए।

विवेक सन्न रह गया। पुनिया उस जात से थी जिसे आज भी गाँव के तथाकथित ऊँची जात वाले अपने घर की देहरी नहीं लांघने देते। वो पीछे के रास्ते से आती और काम करके चली जाती। लेकिन तन की देहरी...... 



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