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Shailaja Bhattad

Abstract

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Shailaja Bhattad

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डर किससे

डर किससे

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बात उन दिनों की है जब मैं ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ती थी। डॉक्टर बनने की तीव्र इच्छा के कारण मैंने जीवविज्ञान लिया था। परीक्षा कक्ष में अभी आधा घंटा ही हुआ था कि पीछे से बार-बार मेरा नाम सुनाई पड़ने लगा।

 एक बार डरते हुए मुड़कर देखा ठीक पीछे बैठी छात्रा बार-बार किसी प्रश्न पर हाथ रखकर मुझे इशारों से अपनी उत्तर पुस्तिका में उस प्रश्न का उत्तर बताने के लिए कह रही थी।

 वैसे तो साल भर वह अन्य विद्यार्थियों पर अपना रौब दिखाकर डराकर रखती थी, लेकिन परीक्षा कक्ष से बड़ा भी कोई डर हो सकता है क्या?

 मैंने शीघ्र ही अपना मुँह मोड़कर अपनी उत्तर पुस्तिका पर ध्यान केंद्रित किया फिर जल्दी-जल्दी सारे उत्तर लिख, उत्तर पुस्तिका परीक्षक महोदया को सौंपकर,

जैसे ही बाहर आई मेरे ही इंतजार में खड़ी वह छात्रा मुझे आंखें दिखाते हुए कुछ बोलने ही वाली थी, कि तभी परीक्षक के तौर पर कक्षा में आई अध्यापिका, जो मुझे बहुत अच्छे से जानती थी ने मेरे कंधे पर हाथ रखकर उस छात्रा को घूरा।

 उसे तो मानो साँप सूँघ गया था। वह तुरंत वहाँ से नौ दो ग्यारह हो गई।


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