vijay laxmi Bhatt Sharma

Tragedy

3.8  

vijay laxmi Bhatt Sharma

Tragedy

डायरी पाँचवाँ दिन

डायरी पाँचवाँ दिन

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330


प्रिय डायरी ये मेरा डायरी लिखने का चौथा दिन है पर मैंने इसे डायरी पाँचवाँ दिन इसलिए लिखा क्यूँकि इक्कीस दिन भारत बंद का ये पाँचवाँ दिन है और पहले दिन सिर्फ़ चन्द पंक्तियाँ ही लिख पाई थी। मन व्यथित था और परेशान भी। अब भी कोई ख़ास फर्क नहीं हुआ है व्याकुल तो अब भी हूँ पर सामान्य होने की कोशिश कर रही हूँ। भय मृत्यु का है या फिर आकाल मृत्यु का पता नहीं। डर हर मनुष्य रहा है अन्दर ही अन्दर बस एक दूसरे को हिम्मत दे अपना डर कम कर रहे हैं। मै भी इस डर से अलग तो नहीं। एक माँ हूँ बार बार ख़्याल आता है मुझे कुछ होता है तो मेरे बच्चों की देखभाल कौन करेगा इतना ही सोच पाती हूँ। माँ हूँ ना मेरी सोच ऐसे वक्त बहुत छोटी हो जाती है और मै सिर्फ़ अपने बच्चों के आस पास ही घूमती रहती हूँ।

महामारी बीमारी कुछ भी हो माँ सोचती है उसे हो जाए पर उसके बच्चों को ना हो और दूसरी ओर ये चिंता की मेरे बाद कौन इनकी देखभाल करेगा। माँ भी कितनी भोली होती है हर चीज़ की चिंता है उसे इसीलिए माँ को भगवान का दर्जा दिया गया है। निस्वार्थ और सरल होती है माँ। आज के दिन की सुरआत मैने भी माँ को याद कर किया आज फोन करूँगी माँ को सोचा और दिनचर्या में लग गई। बाहर सन्नाटा ही पसरा था पर एक दो अवज्ञा वाले लोग घूम रहे थे मैने खिड़की से झाँक एक नफ़रत की नज़र से देखा उन्हें इसलिए नफ़रत की ये अपने ही दुश्मन है।

महामारी की गम्भीरता को नहीं ले रहे साथ ही देश के दुश्मन भी हैं क्यूँकि देश को भी संकट में डालने में इनका ही योगदान होगा। खुद तो इस कारोना वायरस की चपेट में आएँगे साथ कई औरों को भी बीमार करेंगे। तरस आता है इन पढ़े लिखे गँवारों पर। खैर कुछ को आवाज़ दे चेताना चाहा मैने पर उन्होंने अनसुना कर दिया मै भी अपने कार्य में लग गई। सभी घर पर हैं तो कार्य भी ज़्यदा हैं। कोई मदद का हाथ भी नहीं है क्यूँकि मेड को पहले ही छुट्टी दे दी है। हर इंसान की ज़िंदगी महत्वपूर्ण है। ख़ासकर उसके परिवार के लिए वही इनसान उसकी दुनिया है उसके बच्चों के लिए वही स्वर्ग है क्यूँकि वो उनकी माँ है। वो सुरक्षित है आज उसे भी फ़ोन कर पूछा खुशी हुई घर पर है और खुश है। सबसे बड़ी बात घर पर रह एक ज़िम्मेदार नागरिक का फ़र्ज निभा रही है।

तसल्ली हो गई मुझे फिर काम ख़त्म करने लगी , जल्दी काम ख़त्म हों तो कुछ लिख पढ़ लूँ। अभी काम ख़त्म कर बैठी ही थी की स्क्यप पर माँ लंदन से भाई दूसरा भाई बहन सारा परिवार एकसाथ ऑनलाइन आ गए मन प्रसन्न हो उठा कुछ और माँगा होता काश सुबह सुबह सोचा ही था माँ को और सभी भाई बहन को फोन करूँगी और सब एकसाथ एक ही समय एक घंटा सभी ने खूब बातें की परिवार के साथ बड़ी खुशी मिली आज कई दिन बाद मन कुछ हल्का हुआ। सोचने लगी परिवार का कितना महत्व है हम सबके लिए, देखते ही मुरझाए चेहरे खिल उठते हैं और माँ को देख जीवन के सब सुख मिल जाते हैं आज का दिन तो बीत गया प्यारी डायरी कल कुछ नया सवेरा लाएगा इस उम्मीद के साथ आज माँ पर कुछ पंक्तियों के साथ विराम लूँगी।

रेगिस्तान में ठण्डी फुहार सी होती है माँ

परेशानी में आशीर्वाद सी आती है माँ।


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