Gulafshan Neyaz

Abstract


4.4  

Gulafshan Neyaz

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चलो गाँव की ओर

चलो गाँव की ओर

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ज़ब से कोरोना जैसी महामारी ने पूरी दुनिया में आफत मचाया है।

तब से लोगो को बड़ी सिद्दत से अपने गाँव की याद आ रही है। कुछ लोग कमाने के लिए कुछ लोगो ने बच्चो को पढ़ाने के लिए गाँव की गालिया सुनी की और शहर की गालिया और संकरी होती चली गई। क्या रखा है गाँव मे गाय के गोबर गर्द गोबार धुल फाक्ते रोड बिजली की आंख मिचोली। आज उन लोगो को भी गाँव की याद आ रही है

कुछ लोग तो ऐसे भी है। जो गाँव के लोगों को जाहिल अनपढ़ और गँवार समझते हैं।

गाँव के लोग जाहिल और गँवार नहीं होते। वो भोले होते हैं और वो रिश्ता दिल से निभाते हैं।

गाँव की गालिया अपनापन का अहसास दिलाती है वो चिड़या की चहचहाट ताज़गी लाती है। यंहा की धुल धकर मे भी अपनापन झलकता है। गाँव की हर चीज हर लोग अनमोल होते हैं। मैं नहीं चाहती की मेरा गाँव कभी शहर की बराबरी करे। और उसके चक्कर में कंक्रीट का ढेर बन कर रह जाय। गाँव का जीवन अनमोल है। बस उसे ज़ीने का तरीका आना चाहिए। तभी तो इस कोरोना जैसी महामारी में लोग कहते हैं चलो गाँव की ओर।


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