Gulafshan Neyaz

Abstract


4.3  

Gulafshan Neyaz

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पति की कमाई

पति की कमाई

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वो सर नीचे किये बेफिक्र अंदाज़ मे चाय की चुस्की लिए जा रहा था । जैसे उसे कुछ मालूम ही ना हो इतनी ख़ामोश कैसे रह सकता है । क्या इसे मेरी कोई परवाह ही ना हो । इसे देख कर तो ऐसे लगता है जैसे मुझ से प्यार ही नहीं। करण मीरा के मन की बातो से बेफ़िक्र चाय की चुस्की लेने मे वयस्त था।

इधर मीरा मन ही मन जली भुनी जा रही थी। जलने भुनने की वजह ये थी। मीरा की सासु माँ ने आज मीरा को जली कटी सुनाई थी । और मीरा ने करण के घर आते ही सारी बाते एक सांस मे कह डाली करण बातो को ख़ामोशी के सुन ने के बाद बस इतना ही बोला। प्लीज मीरा एक कप चाय पीला दो । ये सुनते ही मीरा झल्लाते होये पांव पटकती हुई रसोई की तरफ चली गई ।


हुआ यूँ था की मीरा ने आज फिर सासु माँ से ब्यूटी पार्लर जाने के लिए पैसे मांगे तो सासु माँ ने सिर्फ इतना कहा बेटा अगले महीना तो गई थी तुम । अभी तो ना किसी की शादी हैं। ना कोई त्यौहार बाद मे चली जाना अभी थोड़ा घर का खर्च जायदा है । शिवम् की कॉलेज की फीस भी जमा करनी है। बस मीरा जल भून गई । पैसे पैसे का मोहताज बना डाला है । भिखरान वाली लाइफ है मेरी सब के अपने अपने खरचे है बस मेरे लिए ही पैसा नहीं मेरा ही पति कमाए और मैं ही उनके आगे हाथ फैलाव ये मुझ से ना होगा । कमर मे तो ऐसे चावी खोसती है । जैसे कितनी बड़ी तिजोरी की मालकिन हो। मेरी किस्मत ही फूटी थी जो इस घर मे शादी हो गई । सारे अरमान दिल मे धड़े के धड़े रह गए। और मगरमछ के आंसू रोने लगी करण ने मीरा के पास आते होय उसे समझने की कोशिश की ये छोटी सी बात है । "इतना क्यों परेशान होती हो । तुम तो खुद इतनी सुन्दर हो तुम्हे ब्यूटीपार्लर की क्या जरूरत तुम तो अप्सरा हो करण ने उसके आँखों मे झाकते होय कहा अब छोड़ो भी ये झूटी तसल्ली । "अरे बाबा अगले हफ्ते चले जाना चलो अब थोड़ा मुस्कुरा दो। " तो मीरा ने हल्का सा होंठ हिलाया तो करण ने राहत की सांस ली।


करण और शिवम् दो भाई थे । करण के पिता का देहांत हो चुका था । घर मे कमाने वाला करण ही था । शिवम् अभी ऍम बी ए कर रहा था । मीरा की सास घर की गार्जियन थी । वो घर को बड़े सलीके और तरीके से चलाती थी । मीरा आज़ाद ख्याल की लड़की थी । उसे ब्यूटी पार्लर किट्टी पार्टी बेफजूल की शॉपिंग की आदत थी । कुछ दिनों तक तो ठीक ठाक चला । पर मीरा का ये रवैया करण के माँ कोई अखरने लगा । वो चाहती थी की मीरा घर के जिम्मेदारी को समझें यहाँ मीरा के अलग ही राग थे । मेरी। पति की कमाई और मैं ही अपने सास से पैसे मांगू। पहले तो बात आये गई हो जाती । अब तो सास बहु मे अक्सर तकरार चलने लगी । इन सास बहु के बीच मे जो सबसे जायदा पीस रहा था । वो था करण एक तरफ माँ तो दूसरी तरफ बीवी वो मीरा को अक्सर समझने की कोशिश करता की आय सिमित है । शिवम की पढ़ाई घर का खर्च ऊपर से उसके रोज़ रोज़ के नय चोंचले का वो बोझ नहीं सह सकता ।

पर मीरा मानने वाली कहा थी। उसे तो शॉपिंग का भूत सवार था। अपनी सास को जलील करने के लिए। करण की माँ सकुंतला देवी करण की हालत को समझती थी । इसलिए वो अक्सर मीरा को समझने की कोशिश करती। पर मीरा को कोई फर्क ही नहीं पड़ा । एक दिन तो हद ही हो गई। शिवम के कॉलेज भरने की फीस थी । मीरा के सहेली की शादी थी । मीरा ने उसी पैसे से अपने लिए साड़ी गहने लाली लिपस्टिक सब खरीद लिए । ज़ब शिवम ने फीस मांगे तो साफ इंकार कर दिया। शिवम मुँह लटका कर माँ के पास गया । ज़ब ये सब बात करण को पता चली तो उसने मीरा से पूछा तो मीरा बिफर पड़ी । बात इतनी बढ़ गई की करण ने मीरा पर हाथ उठा दिया। मीरा घर छोड़ माईके चली गई । करण और सकुंतला देवी ज़ब उसे लाने गए तो उसने अलग रहने केकी शर्त पर घर आना स्वीकार किया । करण और उसकी माँ के कदमो से ज़मीन खिसक गए । करण और शकुंतला देवी ने मीरा को मानाने की बहुत कोशिश की पर मीरा के अपने अलग ही तर्क थे । उसके पति की कमाई है । इसलिए उसकी मालकिन वो है ।

लास्ट मे सकुंतला देवी ने करण और मीरा को अलग कर दिया। करण मानने को त्यार नहीं था । पर सकुंतला देवी ने उसे समझा बुझा के मीरा के साथ रह्ने को कहा करण शुरू शुरू मे तो माँ और भाई का ख्याल रखता फिर धीरे धीरे वो मीरा के बातों मे आकर लापरवाह होता गया ।

अब मीरा पैसे को पानी की तरह बहाती देर से सोकर उठती अक्सर बाहर से खाना मांगती पार्लर जाती शॉपिंग करती । ये सब देखकर सकुंतला देवी उसे समझने की कोशिश करती तो उलटे उन्ही पर बिफर जाती मेरे पति की कमाई मैं जो करूं । पहले आपने राज़ किया अब मेरी बारी । सकुंतला देवी खामोश हो जाती ।

उन्होंने शिवम के पढ़ाई के लिए अपने साढ़े गहने बेच दिया । सिलाई बुनाई करती घर का गुज़ारा मुश्किल हो गया था । घर मे कमाने वाला सिर्फ करण ही था । वक़्त गुज़रता गया। करण वक़्त से पहले ही बूढा हो गया मीरा के फिजूल खर्ची और दो बच्चों के खर्च ने उसे वक़्त से पहले ही बूढ़ा बना दिया । शिवम की पढ़ाई पूरी हो गई और वो अच्छे कंपनी मे जॉब करने लगा । एक दिन ऑफिस से आते होय अचानक करण का एक्सीडेंट हो गया और वो चल बसा । मीरा के ऊपर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा । सेविंग के नाम पर उसके पास कुछ नहीं था । उसके ऊपर से दो बच्चे का बोझ । जिस राह पर क़ल सकुंतला देवी खड़ी थी । आज उसी रास्ते पर मीरा खड़ी थी । पर सकुंतला देवी ने मीरा को बिखरने नहीं दिया। उसकी हिम्मत बनी । दुख के घड़ी मे उसके साथ चट्टान बन कर खड़ी थी । मीरा के आँखों मे पछताप के आंसू थे । पर अब कुछ नहीं हो सकता था । उसने अपने नादानी मे एक माँ को अपने बेटे से एक भाई को अपने भाई से अलग किया । ज़ब उसे इस बात की समझ आई तब तक बहुत देर हो गई।


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