Gulafshan Neyaz

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डर

डर

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किसी ने कहा कोरोना से क्या डरना। हम मुसलमान है हम मौत से नहीं डरते। मौत तो बरहक़ है। कभी भी आ सकती है।

फिर इसके लिए क्या डर। जो हम कोरोना से डरे। मैंने कहा मैं भी मुसलमान हूँ । मौत से डर का तो पता नहीं पर कोरोना से डर लगता है। क्योकि इसमें तो सबसे पहले अपनों का साथ छुटता है। और अपने साथ अपनों को भी खोने का डर। कितनी भी बड़ी बीमारी हो जब इंसान को अपने परिवार का प्यार और देखभाल मिलता है। तो इंसान के अंदर जीने की तमन्ना जगती है। हौसला बढ़ता है। ये कोरोना तो सबसे पहले अपनों का साथ छुड़ाता है।

जीने से पहले मरने के बाद भी अपनों का साथ नहीं वो आपको गले लगाकर रो नहीं सकते। विधि विधान से अंतिम संस्कार नहीं चाहे वो किसी भी धर्म के क्यों ना हो अगर आप मुसलमान है। तो जनाज़ा की नमाज़ नहीं गुसल नहीं कफन नहीं। इस से बड़ी और खराब बात किसी मुसलमान के लिए और क्या हो सकती है। जो उसे लास्ट टाइम कफ़न और नमाज़ नसीब ना हो। उसे अपने उसके आखिरी आरामगाह तक छोड़ने ना जा सके। इसलिए मैं मुसलमान होते हुए भी मैं कोरोना से डरती हूँ।  


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