चाय...
चाय...
तुम और सुबह की चाय दोनों एक समान है..
हर बार वही नयापन हर बार वही ताज़गी...
पर मुश्किल ये कि आपको चाय पसन्द नहीं... पसन्द नहीं, ये नहीं कह सकते,, छोड़ दिया पीना,, वैसे खाने पीने में तो साधु हैं आप, , रमता जोगी बहता पानी, बस जो मिल जाए,
पर हमारी बात हो तो ये साधुता ना जाने कहां गायब हो जाती है... फिर तो ऐसी ऐसी फरमाइश की सुनकर ही..... पर एक बात तो है, हम कितना भी चाहें, आपको चाय नहीं पिला सकते, बड़े मजबूत इरादे वाले हैं आप....
वैसे एक बात बताएं, आपके चक्कर में कई बार हमारी चाय एकदम ठण्डी हो चुकी है, वैसे गर्म चाय हम पीते ही नहीं, पर उतनी ठण्डी भी नहीं, जितनी आपके ख्याल उसे कर जाते हैं,
कई बार ये चोरी पकड़ में आ गई हमारी... माँ ने भाई ने भाभी ने कई बार टोका हमें.. हाथ में चाय का प्याला और नजरें ना जाने कहाँ, और ये सब आपके कारण..
वो गीत है न, तेरे कारण तेरे कारण तेरे कारण मेरे साजन, आपको तो बेहद पसन्द भी है ये गीत, खुद के उपर लगे आरोपों को हमारी जुबां से सुनना बड़ा पसन्द है न...
ओह, बात तो चाय की हो रही थी.. वैसे शादी की बात करने के लिए बुलाया गया तो क्या कहेंगे हम... माँ ने चाय पर बुलाया ????
माँ को बता देंगे कि जनाब चाय नहीं पीते, चाय क्या कुछ भी नहीं पीते, सच, बेहद सरल हैं तो काफी जटिल भी है आप... अरे भई, सिर्फ चाय नहीं पीते इसलिए जटिल नहीं, टिंडे खाते हैं इसलिए कहा, इस वक्त मुस्करा रहे हैं आप है न...
अच्छा एक बात तो बताइए न..
हम कभी मिले तो, क्या एक चुस्की चाय की लेंगे श्री ?????
जवाब का इंतजार कर रहे हैं, ओके

