suvidha gupta

Abstract Inspirational


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suvidha gupta

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बरखा, ब्यार और बगीचा

बरखा, ब्यार और बगीचा

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गांव में ज्येष्ठ के मौसम में कहां कभी बारिश होती है? वहां तो आषाढ़ और सावन में रिमझिम की फुहारें पड़ती हैं। हम, जब से उत्तर भारत से, यहां पश्चिमी भारत में आए हैं, तो जून से ही बरखा की बहार देखने को मिलती है। चारों तरफ, बरसात में नहाए पेड़-पौधे, मौसम की छटा को और बढ़ा देते हैं। मेरे घर के आंगन में एक बड़ा सा बगीचा है, जिसमें बहुत सारे पेड़-पौधे बड़ी शान से रहते हैं। एक तरफ जहां सफेदा, बांस, नीलगिरी, नीम, एरिका पाम हैं, तो दूसरी तरफ ढेर सारे क्रोटन प्लांट, मनी प्लांट और फर्न ने अपनी सुंदरता बिखेर रखी है। जब हवा तेज चलती है, तो नीलगिरी की खुशी देखते ही बनती है। ऐसे मदमस्त हाथी की तरह झूमता है कि बस पूछिए मत। नीम और सफेदा भी उसका पूरा साथ निभाते हैं। एरिका पाम, मेरे बगिया में नया-नया है इसलिए थोड़ा शरमाया सा रहता है। क्रोटन प्लांट का तो लगभग पूरा ही परिवार है। भांति-भांति के कईं प्रकार के हैं। मनी प्लांट की शोभा ही निराली है, छोटे और बड़े दोनों आकार में है। अभी पिछली बार ही तो जब मैं नर्सरी गई थी तो स्नेक प्लांट भी लाई थी। उसकी जान-पहचान भी दूसरे पौधों से अभी कम ही हुई है। कोने के दो गमलों में फर्न बड़ी खूबसूरती के साथ, चुपचाप से खड़े हैं। जैसे ही मैं अपनी खिड़की के पास आती हूं तो मुझसे बहुत बतियाते हैं।

घर के पास वाली इमारत से दो गुलमोहर के पेड़, मेरे आंगन में झांकते झांकते, अपना हक समझकर अंदर तक आ गए हैं। कभी-कभी तो, ऐसा लगता है, जैसे मुझे कह रहे हों, रोककर तो दिखाओ। हंसी भी बहुत आती है और प्यार भी बहुत आता है उन पर। सारी बगिया एक तरफ और मेरे प्यारे गुलमोहर दूसरी तरफ। नारंगी रंग के फूल ही फूल, छोटे-छोटे, हरे-हरे पत्तों के बीच में से झांकते, ऐसे मन को मोह लेते हैं कि बस नजर हटाए नहीं हटती। ऐसी मंत्रमुग्ध छवि होती है कि मन सब कुछ भूल जाता है। टहनियां इतनी ऊंची कि छूने को दिल करे। फूलों को हाथ में लेने को जी चाहे। पवन को भी शायद हृदय के भाव पढ़ने में देर नहीं लगती, ज़ोर से ब्यार चली नहीं कि फूलों की पूरी नारंगी चादर, पैरों तले बिछ जाती है। ऐसा लगता है कि वर्षा ऋतु भी आपका स्वागत कर रही हो। श्रावण के शंखनाद ने पेड़-पौधों की हलचल और बढ़ा दी है। जो थोड़े-बहुत फूल ऊपर की टहनियों पर बचे थे, वह भी सब मुझसे मिलने नीचे आ गए हैं।

फलों से बीज निकालकर, पौधे लगाने का मेरा शौक भी, कुछ नया-नया है। आम, पपीता, लीची, नींबू, जामुन आदि की जब छोटी-छोटी कोपलें फूटी, तो मेरी खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा। बड़ी शान से उनको गमले में प्रत्यारोपण तो कर दिया, अब रोज उत्सुकता से निहारती हूं कि कब बड़े होंगे यह पौधे? वैसे, एक बात और बताऊं आपको, आम का एक बड़ा सा पेड़, साथ वाले भवन से, हमारे यहां तक चुपके से आ गया है। फलों का राजा आम, उस पर कोयल रानी, गाना गा-गा कर, जब सबको रिझाती है, तो मन मंत्रमुग्ध हो जाता है। 

घर के पिछले आंगन में दो दीवारों के साथ-साथ, दो लंबी सी, बड़ी-बड़ी क्यारियां हैं। उनमें मैंने एलोवेरा, तुलसी, पालक, धनिया, पुदीना और शिमला मिर्च के पौधे लगाए हैं। कद्दू का पौधा भी,कद्दू के बीज से, ना जाने कब कूदकर बाहर आ गया, पता ही नहीं चला। पर लगता बहुत प्यारा है। तोरी की बेल तो कुछ ज्यादा ही मतवाली है। अपनी ‌मनमर्जी से कहीं भी चली जाती है। पर जब उससे तोरी उतरती है, तो हमारे आनंद की सीमा ही नहीं रहती। ठीक रसोई के बाहर मैंने तीन गमले सजाए हैं। एक में कढी पत्ता, दूसरे में लेमन ग्रास और तीसरे में अजवाइन है। अजी, इनको छोटा समझने की गलती मत कीजिए। इन तीनों का भी, अपने आप में, बहुत ऊंचा कद है। अब देखिए ना, लेमन ग्रास के बिना, चाय पीना ही मुश्किल लगता है, और कढी पत्ते, अजवाइन की भी हर पल रसोई में गुहार लगी ही रहती है?

 फूलों की खुशबू के बगैर, घर का बगीचा और दिल का कोना, भला कहां पूरा होता है? हर फूल का अपना रंग, अपनी खुशबू, अपनी महक, बस अपनी ओर बरबस ही खींच लेती है। गुलाब और गेंदे के पौधे, हम लाए तो बहुत शौक से थे, लेकिन अभी तक कुछ रूठे-रूठे से लगते हैं। एक-दो बार फूल तो आए हैं, पर अभी कुछ शांत से हैं। ऐसा लगता है जैसे किसी सोच में पड़े हों। लेकिन मेरी प्यारी चमेली की बेल तो बहुत तेजी से बढ़ रही है। अरे हां, बेल से याद आया, मेरी गिलोय की बेल भी, चमेली की चमक से, पहले तो कुछ रूठी, लेकिन अब खुश है। मनभावन मोगरा की तो बात ही निराली है। उसके सफ़ेद फूलों को, जब मैं अंदर सजा देती हूं, तो पूरा घर खुशबू से भर जाता है। 

बस यही मेरी प्यारी छोटी सी फुलवारी है, जो हर पल, हर मौसम में मेरे साथ रहती है। आपके घर में भी अगर छोटी सी वाटिका है, तो आप निश्चित ही मेरी भावनाओं को समझ पा रहे होंगे। और अगर आपके घर में अभी तक पेड़-पौधे नहीं हैं, तो साहिब, अपने घर के किसी छोटे से कोने को इनके नाम करके तो देखिए, आपका जीवन ही महक जाएगा। और फिर आजकल के महामारी के समय में ज्यादा बाहर जाने की इच्छा ही नहीं होगी। क्योंकि यह ढेर सारे प्यारे-प्यारे मित्र, हर पल आपके साथ जो होंगे, ढेर सारी बातें करने के लिए। सारांश में, मैं यही कहना चाहूंगी कि व्यस्त रहिए, मस्त रहिए; घर पर रहिए,सुरक्षित रहिए। इन्हीं कामनाओं के साथ, मैं अभी लेखनी को विराम लगाती हूं। अगले लेख में मुलाकात होगी...


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