भूल चुके थे
भूल चुके थे
यह रचना किसी भी नियम की बाध्यता के आधार पर नहीं लिखी गई है ।
भूल चुके थे जिन्हें वो फिर याद आ गए,
कपड़ों में रखे कुछ खत मेरे हाथ आ गए।
आज रौशन है जिंदगी का कोना तो क्या,
आज फिर जिंदगी के वो दौर याद आ गए।
कहते हैं लोग, रोने कि आदत नहीं हमारी,
आज फिर इन आंखों में आंसू क्यों आ गए।
मिल जाते वो तो पोंछ देता उनके भी आंसू,
उन्हें भी क्यों पुराने अफ़साने याद आ गए।
नहीं पता किस शहर में रहता है वो आवारा,
उसके घर के रास्ते आज फिर याद आ गए।
