Sanjay Aswal

Tragedy


4.4  

Sanjay Aswal

Tragedy


भंवर

भंवर

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मंजरी दमा की मरीज है, पर फिर भी कोठियों में काम कर वो अपना और अपनी बेटी का पालन पोषण कर रही है, वो नहीं चाहती थी कि जिन परिस्थितियों का सामना वो कर रही है, उसकी बेटी रूपा भी करे।

मंजरी चाहती है, उसकी बेटी इन अंधेरों में अपनी जिंदगी ना गुजारे, वो पढ़ लिख अपने सपनों को पूरा करे, आगे बढ़े अपनी जिंदगी को नई दिशा दे, क्या रखा है इन झोपड़ पट्टियों में, यहां हर ओर खौफ़ है बस अंधकार है, गंदगी है।

लूटपाट, चोरी, हत्या, बलात्कार तो आम है यहां, गरीबी के कारण कोई पढ़ना लिखना चाहे तो पढ़ नहीं सकता या ये कहे कि गरीबी उन्हें पढ़ने नहीं देती, लड़कियों की जिंदगी तो और भी नर्क है, उन्हें तो बस जानवरों कि तरह समझा जाता है, बड़ी होते ही जिस्म की मंडियों में बेचने के लिए दलाल मां बाप से ही इनका सौदा कर इन्हे हमेशा के लिए जिंदा लाश बना देते हैं, और मां बाप पैसे के लिए अपने खून को यूं ही जाया कर देते हैं। झोपड़ पट्टीयों की कुछ लड़कियां कोठियों में झाड़ू पोंछा बर्तन साफ करने का काम भी करती हैं, ये सब माहौल देख का मंजरी सहम जाती है, वो रूपा को इस भंवर से बाहर निकालने के लिए दिन रात कोठियों में काम करती है, ताकि ज्यादा पैसे मिल सके।

रूपा का पिता लालू एक नम्बर का पियक्कड़ शराबी, दिन रात दारू के नशे में धुत आवारा घूमता रहता है, उसे ना मंजरी की चिंता ना अपनी बेटी रूपा की, बस जब शराब के पैसे ख़तम हो जाते हैं, तो चला आता है, अपनी झोपडी में मंजरी की मेहनत की कमाई को लूटने और मारपीट कर सारे पैसे ले जाता है, मंजरी बेबस रह जाती है, क्या करे कैसे इस राक्षस से पीछा छूटे, लालू को अपनी बेटी की कोई चिंता नहीं उसे तो बस इंतजार है कि कब रूपा बड़ी हो और वो उसे उसके जिस्म का सौदा कर अपने शराब का जुगाड कर सके, मंजरी ये सब समझती है, तभी तो उसे रूपा की दिन रात चिंता खाए जाती है,और हो भी क्यों ना रूपा अब बड़ी हो रही है, आते जाते झोपड़ पट्टी के मर्दों और दलालों की गन्दी, ललचाई नज़रे उसे दिन रात ताड़ती रहती है कि कब मौका मिले और वो उसका शिकार करें।

रूपा जैसा नाम भगवान ने उसे उतना ही सुन्दर रूप भी दिया है, और साथ में नेक दिल भी, वो सदैव मां की मदद के लिए सोचती रहती है , मां ने उसे पड़ोस के स्कूल में दाखिला दिलवाया है, जहां वो खूब मन लगा कर पढ़ती है, पर अक्सर वो परेशान हो जाती है, जब अपनी मां को यूं परेशान देखती, उसे मां की बीमारी की चिंता खाए जाती है, मां इतनी कमजोर हो गई है और फिर भी दिन रात काम करती है, बस केवल मेरे लिए, तो वो और ज्यादा दुखी हो जाती है, सोचती है कि क्या ऐसा करूं कि मां का हाथ बंटा सकूँ।


उधर मंजरी दिन पर दिन बीमार रहने लगी है, उसके दवा के लिए जो पैसे बचाएं थे वो भी ख़तम हो गए हैं, कर्ज भी किस से मांगे, पुराना भी तो अब तक चुका नहीं पाई है,ऐसे में कौन दुबारा कर्ज दे उसको।

रूपा, मां की जगह कोठियों में काम पर जाने लगी है, वहां अपने हम उम्र लड़कियों को खेलते देख कर रूपा का भी बहुत मन होता है कि काश वो भी इनके जैसे खेलती, अच्छे कपड़े पहने,आराम की जिंदगी बसर करे, उसकी मन की इच्छाएं लगातार बलवती हो रही थी,पर वो कर भी क्या सकती है।

आज झाड़ू पोंछा बर्तन आदि काम निपटा के जब रूपा घर लौट रही थी, तो पास वाले नाले के आसपास बहुत भीड़ लगी थी, सुनने में आ रहा था कि कोई शराबी यहां पी कर गिर गया है, और दम घुटने से मर गया, पास जा कर देखा तो अपनी मां को रोते हुए पाया तो दिल धक सा रह गया, उसका बाप नाले में गिर कर मर गया, दिल बहुत दुखी था पर सकून था कि अब मां को बिना वजह गाली गलौज, मार नहीं खानी पड़ेगी, थोड़ा चैन से तो रहेगी उसकी मां अब।

समय धीरे धीरे गुजर रहा था, पर उनकी कठिनाईयों का कोई अंत नहीं दिख रहा था, रूपा ने स्कूल छोड़ कर पूरी तरह से मां को काम से आराम दे दिया और ज्यादा कोठियों में काम करने लगी, मां की तबियत ज्यादा खराब हो रही थी, रूपा यही सोच के परेशान है कि किससे मदद मांगे, कौन है उसका इस संसार में जो उसकी मदद करेगा।

एक दिन कोठी वाले साहब से कुछ पैसे उधार मांगे तो उन्होंने डांट दिया और धमकी दी कि अगर काम नहीं करना तो छोड़ दे किसी और को रख लेंगे, रूपा मन मासोज के रह गई, और फिर दोबारा मदद के लिए कभी किसी से नहीं कहा।

आज जब रूपा घर लौटी तो मां की हालत देख कर बहुत डर गई, मां लगातार खांस रही थी, उसे सांस लेने में बहुत दिक्कत हो रही थी, उसने मां को बची हुई दवाई दी पर मां को आराम नहीं मिल रहा था। फिर वो मां को सहारा दे कर पास के एक डॉक्टर के पास ले गई, डॉक्टर ने कई टेस्ट लिखे और एक लंबा चौड़ा दवाइयों का पर्चा थमा कर कहा कि दमा पुराना है, जो अब बिगड़ गया है, पूरे फेफड़ों में संक्रमण हो गया है, अगर सही से इलाज नहीं कराया तो इसका बचना मुश्किल है, रूपा घबरा गई, कहां से पैसे लाए, कौन उसकी मदद करेगा उसे समझ नहीं आ रहा था, इसी उधेड़बुन में उसे नरेश का ध्यान आया,ये वही दलाल है, जो झोपड़ पट्टी की लड़कियों का सौदा करता है, रूपा ने उसके पास जाने का मन बना लिया, गरीब की मदद आखिर करता भी कोई क्यूँ, और वो ऊपर वाला सिर्फ और सिर्फ उनकी किस्मत में कठिनाइयों का बोझ ही लिखता है, और ये कठिनाइयों का "भंवर" ही शायद उसकी किस्मत में लिखा है, तो वो भी क्या कर सकती है।

रूपा नरेश के साथ ग्राहक के पास से हो कर आई तो उसे लगा इस तरह से पैसे कमा कर वो अपनी मां की जिंदगी बचा सकती है, नरेश ने उसे कुछ पैसे दिए, जिन्हें लेकर वो सीधे दवाई की दुकान से सारी दवाइयाँ खरीद के घर पहुंची तो क्या देखती है, उसकी मां की जीवन की डोर को ऊपर वाले ने हमेशा के लिए काट दिया है, मां जो हमेशा उसके साथ होती थी मर गई, उसे यूं अकेला छोड़ कर।

रूपा स्तब्ध है आंखों से आंसूओं की धारा बह रही है और " भंवर " जिससे निकालने कि उसकी मां ने पूरी जिंदगी कोशिश की, आखिर में वही उसका जीवन बन गया।


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