भाईचारा
भाईचारा
भाईचारा
कुछ दिनों बाद बाला को भी पारिवारिक समस्या का सामना करना पड़ा। उस समय कोरोना महामारी अपनी चरम सीमा पर थी। बाला के बेटे की शादी पहले से तय थी, क्योंकि दोनों एक ही शहर में और एक ही कंपनी में काम करते थे। अचानक बाला के बाबा का फोन आया। उन्होंने कहा कि शादी करना आवश्यक है, लेकिन महामारी के कारण यह संभव नहीं हो पा रहा है। साथ ही, दिवाली से पहले धार्मिक कारणों से भी विवाह नहीं किया जा सकता था। बाबा ने समझाया कि धार्मिक संस्कार सामान्य परिस्थितियो में की जाती है। महामारीने में उसका कोई वजूद नहीं होता। इसलिए तु कम से कम लोगों के उपस्थिति में उनकी शादी कर लो। कुछ नहीं होगा इसकी जिम्मेदारी मैँ लेता हूँ। बाला ने बाबा की बात मानते हूएं, उनकी शादी कोरोना में की थी । बाला बहूँत खुश था। जब कभी संकटों का दौर चलता हैं, तो वे लगातार आते है। बाला के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा था। अचानक उसे खबर मिली की उसके माता का स्वर्गवास हूँआ हैं । उसका भाई उसे उस अंतिम संस्कार में बुलाना नहीं चाहता था । उसकी एक जटिल कहानी थी।
बाला और बाबा बचपन के मित्र थे । वे दोनों ही थोड़ी दूरी पर एक ही वार्ड में उनके गांव में रहते थे। इसलिए बाबा का बाला के परिवार का बहुत घनिष्ठ संबंध था। उसका भाई भी बाबा के लिए उसके भाई जैसा था। आज भी भाई और भाभी बाबा के साथ उसी प्रेम से पेश आते हैं। बाबा और बाला के बीच भी उतने ही घनिष्ठ और पक्के संबंध हैं। हम दोनों ही सेवानिवृत्ति के बाद एक ही शहर में रहते हैं। बीच में बाबा और बाला का ज्यादा संबंध नौकरी के कारण नहीं रह सका, क्योंकि वह और मैं अक्सर तबादले पर रहते थे। अब वह और मैं सेवानिवृत्ति के बाद एक ही शहर में रहते हैं। हृदय की जमीन में प्रेम और अपनत्व की मिट्टी हमेशा मौजूद होने के कारण, हम बीच-बीच में कार से अपने पुराने मित्रों से मिलने अपने गांव में जाया करते हैं। काकी की स्मरण शक्ति लगभग कम हो चुकी थी। वह किसी को नहीं पहचान रही थी! एक-दो साल पहले काकी और मेरा मित्र साथ में रहते थे। वह हमेशा घूमते-घूमते रास्ता भूल जाया करती थी। फिर बाला को उसे ढूँढने में काफी मेहनत करणी पड़ती थी । इस लिए उसने अपने माता को बहन की मदद से बड़े भाई के छोटे गांव में रख दिया था। चाची को पेंशन मिल रही थी इसलिए आर्थिक कठिनाई नहीं थी। वैसे भाई और भाभी चाची की अच्छी देखभाल कर रहे थे। बाबा बीच-बीच में चाची से मिलने गांव जाता रहता था। लेकिन बाला गांव में जाने के बाद संबंध में कड़वाहट आने के कारण घर नहीं जा सका था । बाबा फिर चाची की प्रकृति का बाला को अंदाजा दे था। ऐसी स्थिति देखकर बाबा को ,वे पुराने प्रसंग याद आ रहे थे। बाबा और बाला दोनों अपने-अपने घर में छोटे थे। इसलिए हम दोनों ने सभी के विवाह में दौड़-दौड़कर काम किया था। उसके और मेरे भाई, बहन। जीजा हम दोनों को अपने साले और भाई की तरह व्यवहार करते थे। बाला और उसकी भाभी के बीच बिल्कुल मां और बेटे जैसे संबंध थे। लेकिन ऐसा क्या हुआ कि दोनों भाइयों में कभी न मिटने वाली कड़वाहट आ गई। इसे समझना बाबा के लिए असंभव था। बाबा ने बाला से कई बार पूछने की कोशिश की थी। वह कहता है कि उसे भी समझ में नहीं आया। उसके भाई ने पिता का गांव में जो प्लॉट था। उसे अपने नाम पर कर लिया था। उसे बिना बताए। वह तो वो प्लॉट उसी को देने वाला था। उसे वह चाहिए नहीं था।
बाद में बाबाने गाँव के एक भाई से, जो हमारा मित्र भी था और वह बाला के भाई का भी खास मित्र था। बाबाने उससे पूछा। अरे, तुम इनके संबंध सुलझाने की कोशिश क्यों नहीं करते ? उसने कहा, उसने बहुत समझाने की कोशिश की, लेकिन यह असंभव लगता है। बाबा ने उससे पूछा कि इसके पीछे कोई ठोस कारण है क्या? उसने कहा, निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता, लेकिन उसे लगता है कि तुम्हारे मित्र ने अपने पिता समान भाई द्वारा जो उसके लिए शादी का प्रस्ताव लाया था। वह तुम्हारे मित्र ने नकार दिया था। बाला ने अपनी सुविधा और मन अनुसार एक शिक्षिका से विवाह किया था। अरे उसकी पत्नी तो स्वभाव और रूप में बहुत सुंदर है। फिर कहाँ फटी। अरे जो संबंध उसके भाईने उसके लिए लाया था। वह भी सुंदर और अकेली थी, और संपन्न भी। लेकिन उसकी जायजाद थोड़ी विवादास्पद थी। तुम्हारे मित्र का भाई तहसील में होने के कारण, उसे आत्मविश्वास था कि वह सारे झंझट, अर्थात कानूनी परेशानियाँ दूर कर सकता था। उसका यह दांव सफल नहीं हूँआ था । इसलिए उसने इसे अपना अपमान समझा । और दोनों भाईयों में दरार पड गई थी। ऐसा उसे लगता है। इसलिए भाऊ का शायद गुप्त राज खुल गया होगा! लेकिन यह कटुता इतनी अफसोसजनक स्थिति तक जाएगी, ऐसा उसे नहीं लगा था । सभी तरफ कोरोना के कारण डर का माहौल था, इसलिए व्यक्तिगत संबंध दूर हो गए थे। इच्छा होने के बावजूद भी कोई किसी से मिलने नहीं जा सकता था।
बाला का एक दिन बाबा को सुबह फोन आया था। अरे माँ की मृत्यु हो गई हैं । ऐसी खबर मुझे गाँव से प्रदीप ने दी है। क्या तुम थोड़ा जानकारी प्राप्त करोगे? बाबा ने तुरंत भाऊ के मित्र को फोन किया और पूछताछ की। उन्होंने कहा उस भी तबीयत पिछले आठ-दस दिन से अच्छी नहीं है। अब बड़ी हिम्मत करके काकू के अंतिम दर्शन के लिए जा रहा हूँ। यह खबर बाबा ने बाला को दी थी । बाला अपने स्थानीय मित्रों से संपर्क में था । और उनसे बिनती करता कि बाला और अन्य परिवार के सदस्य तुरंत निकल रहे हैं । वे सभी मिलकर शव यात्रा निकालने में विलंब करने का प्रयास करो। बाला ने तुरंत अपने मित्र को ऐसी सूचना भी दी थी। बाबा की भी तबीयत अच्छी नहीं थी इसलिए वह बाला के साथ नहीं जा सका था । वह समन्वय करके निकला था। इसी बीच शवयात्रा भी निकल चुकी थी। लेकिन भाऊ ने इस बारे में किसी बहन को या किसी अन्य रिश्तेदारों को खबर नहीं दी थी। अंत में उन मित्रों को भाई को बताना पड़ा कि चाची का छोटा पुत्र और लड़की थोड़े ही समय में आने वाले हैं। हमें इंतजार करना होगा! भाई ने तर्क दिया कि बहुत समय हो गया है। प्रेत के साथ आनेवाले लोग कितनी देर तक इंतजार करेंगे? और वे रुकने के लिए तैयार नहीं थे। अंत में उन्हें भाई को चेतावनी देनी पड़ी थी । अगर आप इंतजार करने के लिए तैयार नहीं हैं, तो हमें पुलिस में शिकायत आपके खिलाफ करनी पड़ेगी। मित्र गाड़ी लेकर पुलिस शिकायत करने के लिए निकलने वाले थे, तभी कुछ वरिष्ठ नागरिकों ने भाई को समझाने की कोशिश की थी । सूर्य शरमाए और चंद्रमा मुंह छिपाए जैसी भाई की महानता दुनिया ने देखी थी। अंत में मजबूरी में इंतजार करना पड़ा।
थोड़ी देर बाद मेरा मित्र और मां की बेटीयां बाबा द्वारा दी गई सलाह के अनुसार सीधे मशान घाट पर पहुँच गए थे। मित्र और अन्य लोगों ने चाची का अंतिम दर्शन किया था। रिति अनुसार, बाला कनिष्ठ पुत्र होने के नाते प्रेत को अग्नि दी थी। और बाकी की विधियाँ भी पूरी की गई थीं। बुजुर्ग के चले जाने का दुःख नहीं था । लेकिन समय ने बाला को दुख दिया था। अगर बारिश से भीग जाए और पति द्वारा पीटा जाए तो किसे बताएँ? ऐसी स्थिति मेरे मित्र की हो गई थी। मां जिंदा रहते हुए बाला अपनी माँ के दर्शन नहीं कर सका था। जब माँ जीवित होती है, तो उसके सभी बच्चों का उस पर स्नेह होना स्वाभाविक होता है। व्यक्तिगत कारणों से इस स्नेह को तोड़ना कितना सही है। मरी हुई गाय का पाँच शेर दूध देना और फिर माँ के बहुत गुण-गान करना, इसका कोई मतलब नहीं है। दुख की बात है। जिसने बच्चों को जन्म दिया, उसकी मृत्यु भी उनमें की कड़वाहट को नहीं मिटा सकी। अर्थात्, रक्त के संबंधों से ज्यादा मानवी गर्व कितना बड़ा होता है। यह इससे पता चलता है। यदि मानव ने गर्व नहीं छोड़ा, तो उसके कितने दुखद और बुरे परिणाम परिवार को भोगने पड़ते हैं। इसको लेकर सभी को गर्व रखने वालों पर विचार करना चाहिए! मतभेद हो सकते हैं, लेकिन मन में भेदभाव नहीं होना चाहिए।
