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Seema Verma

Abstract

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Seema Verma

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"बड़ी दीदी" अंक १२

"बड़ी दीदी" अंक १२

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       " मैं निराश नहीं थी" 


मेघना ... 

' लड़कियों की मित्रता की प्रकृति अक्सर समझ में नहीं आती '

उस दिन बातों ही बातों में मेघना,

" नैना ,तुम्हारे हाथ पकड़ लूं ? माफ करना जब मैं मजे में रहती हूं तब मुझसे बिना हाथ पकड़े बात नहीं की जाती है "

" मेरी जिंदगी में भी कोई है जिसके साथ रहकर मेरा आत्मविश्वास बढ़ जाता है लेकिन "

" लेकिन क्या मेघना ? " नैना ने मेघना के हाथ सहलाते हुए। 

" राहुल और मैं एक साथ काॅलेज में पढ़ते थे। हैरानी की बात यह है कि मेरे घरवालों को ना सिर्फ यह बात पता है बल्कि उन्हें तो राहुल के मेरे घर आने पर कोई आपत्ती भी नहीं है "

बल्कि डैडी तो उसे बड़े प्यार से ,

" हैलो व्याए, हाउ आर यू ! मेरे पास आओ " कह कर पास बिठाते हैं "

" फिर समस्या कहां है ? " 

" यही कि उसने अपनी पढ़ाई बीच में ही मीन्स अधूरी छोड़ दी है 

बस उसकी यह बात मेरे घरवालों को नागवार गुजरी। 

 पापा को नहीं, पर मम्मी को बहुत बुरी लगी।

" हां मेघना , तुम्हारी माॅम अपने बलबूते स्थापित हैं और एक समर्थ मां का हर व्यक्ति और स्थिति को मापने का अपना दृष्टिकोण होता है "

" मम्मी चाहती हैं कि अगर उसे पढ़ाई छोड़नी ही है तो फिर वह उनके साथ उनके पारीवारिक बिजनेस से जुड़ कर बिजनेस के गुर सीखे " 

" जबकि राहुल को भी मेरी तरह बिजनेस ‌‌में थोड़ी भी रुचि नहीं है "

" मेघा , इसका अर्थ तुम मुझसे भी ज्यादा मजबूर हो ? 

नैना...

स्टेज पर नाटक प्ले का पहला दिन ... और सामने नायक के रूप में शोभित था। मैं ने बहुत मेहनत की है। नाटक की कथा के एक-एक शब्दों को करीब दस दफा पढ़ कर उसमें निहित भाव समझने की कोशिश की है।

मेरे इस प्रयास में मेघना ने मेरा साथ दिया है।

नहीं तो मेरी अनुभव हीन आंखें मंच की चकाचौंध में और भी चौंधिया जाती।

पहले सीन के मंचन के बाद पर्दे के पीछे शोभित,

" अद्भुत ! बहुत प्रभावशाली है तुम्हारा अभिनय। शोभित ने सीन समझाते हुए नैना के गालों पर झूल रहे बालों की लट को पीछे करते हुए गालों को अनावश्यक रूप से सहला दिया था।

 नैना... के लिए उसकी इस हरक़त में समझने के लिए नया कुछ नहीं है। 

एक क्षण के लिए विद्रोह के भाव जगे ... ,

" हुंह ... साइनिंग अमाउंट वापस करके कल सुबह ही वापस चली जाऊंगी।

पर अगले ही पल चेतना सजग हुई ,

" मजबूरी है ? एक साथ इतनी इकठ्ठी राशि मेरे परिवार ने कितने दिनों से नहीं देखा है" 

 " नैना ! यह तुम्हारे जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है " 

शोभित ने सामने बैठे ऑडियंस पर नजर डाली ,

अगर यहां मेरे करीब बनी रहोगी तो बहुत आगे जा सकती हो "

नैना हंस पड़ी... थी 

उस दिन के उसके प्रदर्शन के बाद सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया , 

' नैना' सर्वश्रेष अभिनेत्री है।

श्रेया ...

-- का रक्तशून्य चेहरा तकिए का हिस्सा लग रहा है। आगे जीवन का सफर बहुत मुश्किल है। इस वक्त बिस्तर पर पड़ी श्रेया का शरीर कमरे के उदास वातावरण से एकाकार हो चुका है।‌ तकिए से सिर हटा कर सुशांत के घुटनों पर सिर रख कर निश्च्छल लेटी हुई है।

जिससे उसके सांसों की गर्मी अपने शरीर पर महसूस कर सके।

भय मिश्रित वह रात जैसे - तैसे करके कटी थी।

सुबह ... 

हर सांस के साथ जैसे मेरा जोड़- जोड़ बिखरने लगा है।

सुशांत अवाक ,मति विमूढ़ हो गया है !  

तब गौरांग ने मदद के लिए सहज भाव से अपने हाथ बढ़ाए। श्रेया को गौरांग के इस 'बहिनापे' पर रश्क हो आया।

श्रेया का चेहरा नदी के निरंतर आघात से घिस गये किसी पत्थर का सा हो गया है।

एकदम पारदर्शी, चिकना, रंगहीन त्वचा।

अस्पताल की यूनीफाॅर्म हल्की नीली है। जो उसके सफेद पड़ चुके चेहरे से मेल खा रही है।

ढ़ीली कमीज और पाजामा।

धीमी गति से चलती स्ट्रेचर पर श्रेया लेटी है।

उसने लेटे- लेटे ही गर्दन उलट कर साथ चल रहे सुशांत की ओर देखा। 

थोड़ी दूर आगे जा कर एक कमरे के बाहर गलियारे में जा कर स्ट्रेचर रुक गया। डाक्टर अभी नहीं आए थे। अंदर शायद तैयारी चल रही थी।

सुशांत अस्पताल के लंबे काॅरिडोर में चुपचाप खड़ा है। यहां की हवा में मृत्यु गंध है और यह गंध उसे परेशान कर रही थी।

वह अद्भुत यंत्रणा झेल रहा है मेरा मन भी किसी गीली लकड़ी जैसे सुलग रहा है धुआंता हुआ सा।

कुछ बेचैन, ,असह्य अस्थिर सा ...

"अपने प्रेमी के प्रति पूर्ण समर्पण... हमें कितना असहाय और असुरक्षित कर देता है ना ! "

-- डाक्टर आ चुके हैं। मुझे अंदर ले जाया गया

वे अपने सहयोगियों के साथ अंदर थे। सभी सफेद पोशाक में और तसल्ली देने वाले लगे। उसके बाद जारी हुए जांच के दरम्यान सारे दिन सुशांत से बात नहीं हो पाई।

मैं डाक्टर ,नर्सों से घिरी हुई दवाई, डेटाॅल से महकते कमरे में नीली यूनिफार्म पहने हुए सामने सपाट दीवार को देखती रही।

 लगातार ए .सी के चलते रहने के बाद भी मेरे हथेलियों में पसीना है।

मुझे मेरे कानों की कोर में कुछ गर्म गीलापन महसूस हुआ यह आंसू भी हो सकता है ? 

जिन्हें पोंछने के लिए मैं हाथ उठाना चाहती हूं।पर मन नहीं हुआ, इस अत्यधिक शांत - नीरव‌‌ अकेलेपन में यही तो मेरे साथ बने हुए हैं।

बाद में वे आंसू बगैर पोछे ही सूख गये थे।

" मैं ऐसा किस तरह कह सकती हूं कि मुझे डर नहीं लग रहा था ? "

फिर अंजाने में छाते जा रहे उस डर से बचने की अदम्य लालसा ने ही मुझे अस्पताल के बेड से उठा कर तूफानी वेग से मेरे बचपन में पहुंचा दिया।

उस बचपन के साम्राज्य में,

" जहां मैं हूं, नैना है, एवं पिता - मां के साथ है मेरा ननकाना। 

बचपन में हम अक्सर नानी के घर चले जाया करते थे और वहां महीनों - महीने रह कर आते।

मुझे नानी के सन से सफेद बालों में कंघी कर फिर उन्हें बिखेरने में अपूर्व आनन्द मिलता।

उन दिनों पिता की पोस्टिंग बाहर रांची में थी और वे बीच- बीच में छुट्टियों में ही आ पाते थे। हम दोनों बहनों की झालरदार रंगीन फ्राक, आंगन में बड़ा सा अमरूद के पेड़ , बंसवारी में बैठ कर खट्टी - मीठी अमियां खाना , नानी का गर्मियों के दिन में खटिया पर चादर बिछा कर अमरस बनाना ये सब बातें एक - एक कर उमड़- घुमड़ कर दिमाग में आ रही है ंं।

जब तक हम वहां रहते वी आई पी बने रहते। ‌‌‌‌नानी रोज अच्छे- अच्छे खाने बनवातीं।

फिर बाद में आगे पढ़ाई करने के नाम पर पिता हमें अपने साथ रखने लगे थे। उन दिनों के भी सभी घटनाएं ... आंखों के सामने तैर रही थीं।

बहरहाल ,

" डन ! " 

डाक्टर का इतना कहना और मैं एक झटके से उपर आसमां में सैर करती हुई नीचे वृक्ष पर गिर कर अटक गई। 

और चल रही जांच के आने वाले रिजल्ट का सोच कर कांप गई।

श्रेया सरक कर बिस्तर के एक कोने में आ गई है। इस पूरी रात मुझे अस्पताल में ही रुकना है।

डाक्टरों के मुताबिक मुझे चौबीस घंटे ऑब्जर्वेशन में रखने की जरूरत है।

काले पानी की कोठरियों की तरह इस कमरे में अकेला पन, उदासी और सन्नाटा पसरा है।

इन्हीं एकांत क्षणों में मैं ने कहीं दूर से आती मेरी नानी की आवाज सुनी ...  

" बबुनी , जान रखिअ जे डरलू तो और डरइहं सन " तत्क्षण मेरे दिमाग में यह ख्याल आया जांच का रिजल्ट चाहे कुछ भी आए ,

" अगर मैं इस तकलीफ को छोटा करके देखती हूं तो शायद ठीक हो कर घर जाने का मार्ग जल्दी और अवश्य मिलेगा।

खैर ...

जांच का परिणाम आ गया था। जाहिर है मेरे हक़ में नहीं था।

सुशांत ने मुझे गले से लगाया और जोर- जोर से हिलक कर रोने लगा। 

"मेरे वक्ष की गांठें मामूली नहीं थी " सुन कर मैं एकदम से फ़क रही गयी।

 मेरे पैरों के नीचे की धरती खिसक चुकी थी। मन बुरी तरह से कांप उठा। तभी सुशांत 

ने शीघ्रता से अपने मनोभावों को छिपाते हुए सिर को एक प्रबल आवेग से झटका ,

" तुम आराम करो मैं डाक्टर से मिल कर आगे के इलाज की बात करता हूं "

मैं आराम कर सकती थी ?

मन में विचारों का भयंकर उथल- पुथल मच रहा है।

" क्या हूं मैं ! 

और मेरे इर्द - गिर्द प्रेम करने वाले ये लोग ? "

मैं उनके आंसुओ में खुद को डुबोना नहीं चाहती थी बल्कि अपनी कमजोर... ही सही मुस्कान का अक्श उनके चेहरे पर देखना चाहती थी।

ऐसा करके ... मानों उन सुराखों को ढंकना चाहती थी।

जिनका अभी और भी उघेड़ा जाना बाकी था , एवं जिनके पूरी तरह उघड़ने से पहले मेरे द्वारा उनका ढंका जाना जरूरी था।

मेरा मन था यह ! 

और उसकी सुपरसोनिक गति की रफ्तार तो देखिए ,

 उस दिन न जाने कहां से भूले-भटके ही सही नैना का फोन आ गया था मेरे फ़ोन पर जिसे मैंने नहीं गौरांग ने उठाया था ।

मुझे ऐसा लगा था कि मेरे पांव में जैसे पानी की बड़ी - बड़ी थैलियां बांध दी गई हैं।

 जिन्हें अलग करने की कोशिश में अगर उछाल मारूं तो डर है कि सारा पानी उछल कर वापस अपनी ही देह भिंगो जाएगा।

मां निश्चित रूप से दुखी थीं।

बहुत देर तक वे धीमी - धीमी आवाज़ में न जाने क्या गौरांग से बतियाती रहतीं।

उन्हें इलाज में आने वाले खर्चे की चिंता थी ,

" मेरे पास गाढ़े वक्त के लिए बचा कर रखे गये कुछ गहने हैं "

उनके माथे पर चिंता की लकीरें खींची हुई थीं। 

लेकिन मैंने अपने भयंकर संघर्ष - विमर्श और कठोर आत्म-पीड़न के बाद अपने इस ' नये- संकट' की स्थिति के प्रति सामान्य बने रहने और उबरने का मन बना लिया।

मेरा यह निर्णय ! 

इस विकट परिस्थिति में मन मार कर हार मान लेने से बेहतर तो अवश्य है।

नैना ...

 उस दिन नाटक के स्टेज शो के मंचन का पहला सफलतम दिन था। जिसके पर्र्फौर्र्मेंश से यूनिट खुश थी। लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी थी उसे देखने के लिए।

मुझे श्रेष्ठ अभिनेत्री की पदवी मिल चुकी थी।

उस सफल शो के खतम हो जाने के बहुत देर  बाद में भी फुर्सत नहीं मिल पा रही थी।

मेरा मन मेघना से बातें करने का कर रहा था।  

लिहाजा फ्री होते ही मैंने उसे वीडियो काॅल लगा कर आज के अपने सफल अभिनय और नाटक की सफलता की खबर दे दी जिसे सुनकर वो बहुत ही खुश थी ,

" लौट कर घर आओ तो आज जश्न की तैयारी करती हूं " खुल कर हंसी थी।

मैं ने मुस्कुराते हुए फोन काट दिया।

अभी निकलने का सोच ही रही थी कि शोभित ने ,

" रात बहुत अधिक हो गई है। किस तरह जाओगी ? चलो मैं तुम्हें छोड़ देता हूं "

 अचानक सामने से 'हेमा राए' 

" हैलो , मेरा नाम हेमा राए है।  

उसके चेहरे पर तिरस्कार के भाव थे। इस नाटक में मेरी भूमिका को पहले हेमा राए ही निभाने वाली थी।

" तुम इस चेहरे पर स्टार बनना चाहती हो "

मेरे कान अपमान से गर्म हो गये। धमनियों में बहने वाला खून जमता हुआ सा लगा।

तो यही है , अत्यंत गोरी और रूपवान 'हेमाराए' ।  

नैना ने उसका उपर से नीचे तक उसका निरीक्षण किया। झालरदार शौर्ट पर बिना बांह वाली भयंकर लो कट गले वाली नन्ही सी ब्रा नुमा टाॅप जिसमें से अंदर झांकने की आवश्यकता नहीं थी। दोनों काम -कंदुक खुद ही बाहर की ओर छलक रहे हैं।

इस तरह उन्मुक्त हो कर बोलने की कला नैना की कल्पना से भी परे है।

उसके इस प्रश्न का सटीक उत्तर तो है नैना के पास परंतु यह उचित समय नहीं लगा। पहले सोच रही थी कुछ करारा जवाब दे फिर यह सोच कर छोड़ दिया ,

" इस खुशनुमा शाम को बेकार की बहसबाजी में क्यों बर्बाद करूं ? 

अपनी सफलता की खबर पहले श्रेया दी को बताती हूं यह सोच उन्हें काॅल लगा दिया जिसे गौरांग ने उठाया था ,

" ओ , कौन ये तो श्रेया दी का फोन है इसे किसने उठाया है ? वो खुद कहां हैं ? 

नैना हमेशा की तरह अपनी ही रौ में बोलती चली जा रही है वो दूसरे की सुनती कब है ?

" नैना , मैं गौरांग! दीदी की तबीयत .. कुछ ...

गंभीर, प्रेमिल, मधुर आवाज जिसे श्रेया दी के फोन पर सुन कर आश्चर्य नहीं हुआ था।

मैं जानती थी ,

देर- सबेर ही सही जिनकी प्रतिमूर्ति उसके हृदय के मन मन्दिर में सजी है वो कहीं ना कहीं से उसे ढूंढ़ ही निकालेंगे।  

तभी तो बेचैन हो कर बिना यह जानें कि कब... , क्यों ..., कहां... और किस तरह ... ? 

उसने अगली ही ट्रेन से अपने घर आने की सूचना दे दी है।

अगले स्टेज शो से पहले लौट कर आने के लिए।

आगे ...


क्रमशः


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