बैरी बारिश
बैरी बारिश
कुशाल बस स्टाप पर खड़े इधर-उधर देख रहा था, बस को आने में वक्त था तो आते-जाते हर चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रहा था, कोई गमगीन तो कोई खुश दिख रहा था, चेहरे को पढ़कर ह्यूमन थिंकिंग का रिसर्च करने में माहिर था कुशाल..!
कि अचानक बारिश शुरु हो गई लोग छत ढूँढने लगे इधर-उधर भागने लगे, पर सामने की बिल्डिंग से करीब एक ३० साल की लड़की बारिश की परवाह किये बगैर फूटपाथ पे नि:स्तब्ध सी खड़ी रही, कोई भाव नहीं था चेहरे पर कोई अंदाज़ा नहीं लगा सका कुशाल उसकी भीतर हलचल का..!
मेकअप, काजल बह रहा था पर उसका चेहरा उतना सुंदर था की कुशाल मन ही मन हँसकर बोला क्यूँ लगाती हो मेकअप जब इतना सुंदर हो..! बिल्कुल मेरी कल्पना में बसा रुप, पर ये क्या लड़की बार-बार आँखें क्यूँ पौंछ रही है क्या रो रही है ?
या बारिश के पानी से परेशान है, क्या समझूँ ? बारिश से परेशान होती तो किसी छत के नीचे खड़ी रहती ना,
क्या बारिश बहाना है उसके दर्द को बरसने का, रोने को ढो रही है बरसात की बूँदों संग ? क्या हुआ होगा क्यूँ रो रही होगी..!
क्या ये मेरा वहम है इतनी सुंदर लड़की को कोई क्यूँ परेशान करता होगा।
ना ना शायद रो ना भी रही हो पर ना जिस तरहा से आँखें पौंछ रही है, पक्का रो रही है..!
सामने की फूटपाथ पे बस रुकी लड़की चली गई, सौ सवाल कुशाल के मन को आज तक परेशान करते हैं जब भी बारिश होती है..!
वैसे तो बहुत लोगों को देखा, पढ़ा पर क्यूँ उस अजनबी के लिए कितने भाव उभर आते हैं, सबके चेहरे को पढ़ने वाला मैं मात कैसे खा गया उफ्फ़ बैरी बारिश ने गणीत जो बिगाड़ दिया।
काश की मैं उसके इतने करीब होता की पानी मीठा है की नमकीन पहचान पाता, मीठा होता तो पी लेता नमकीन होता तो सिर चढ़ा लेता, उसे यूँ सड़क पे खड़े परेशान ना होने देता..! कल्पना में बसे रूप का कमाल था या चेहरे पढ़ते-पढ़ते शायद हर भाव रूह में उतर गये हैं, कुशाल इतना तो इमोशनल नहीं था।

