बासी अखबार
बासी अखबार
अखबार पढ़ने का भी एक अलग मजा है और सभी का तरीका अलग-अलग होता है। कोई तो एक के बाद एक पन्ना पलट कर कायदे से पढ़ता है और कोई अपने पसंदीदा पन्ना पहले पढ़ता है। मेरा अख़बार पढ़ने का भी एक अलग तरीका है पहले मुख्य पृष्ठ पढ़ती हूं फिर आखिरी उसके बाद संपादकीय पृष्ठ फिर और कोई अन्य पृष्ठ लेकिन लगभग छः महीने हो गए हमारे घर अखबार नहीं आ रहा है। अब मोबाइल में ही "ई पेपर " पढ़ने लगी हूं इसमें एक फायदा है कि हर शहर का अखबार पढ़ सकती हूं। दो तीन शहरों का अखबार सब्सक्राइब कर लिया है जिन शहरों में मेरे बच्चें और कुछ अपने रहते हैं। मगर मुझे वो संतुष्टि नहीं मिलती है जो पन्ने पलट पलट कर पढ़ने में आता है। कुछ पुराने अखबार भी मेरे पास सुरक्षित हैं जिन्हें अपने साथ साथ लिए घूमती रहती हूं। आज सोचा वही निकाल कर पढ़ लेती हूं।
निकाल कर देखा , नवभारत टाइम्स , पटना संस्करण 8 जून 1987 मतलब 33 साल पुराना अखबार। यूं तो यह अखबार मेरे लिए इस लिए खास था क्योंकि इसमें मेरा पहला इंटरव्यू प्रकाशित हुआ था। लेकिन आज यह दूसरी वजह से विशिष्ट लग रहा है। यह चंद पन्नों का मामूली सा अखबार जिसकी कीमत महज साढ़े तीन रूपए से लेकर अधिकतम दस रुपए होगी लेकिन इस अखबार का सफ़र मेरे हाथों तक पहुंचने तक कितना संघर्षपूर्ण रहा होगा ???
सबसे पहले तो उन रिपोर्टर्स को समाचार एकत्रित करने के लिए , फिर फोटोग्राफर्स के लिए उसके बाद एक अहम भूमिका होती है संपादन का जिसे बहुत सोच समझकर करना होता है। अब बारी आती है प्रूफ रीडर की , तब छप कर तैयार हो पाता है यह अखबार जिसे एक नज़र पढ़ने के बाद बासी अखबार करार देकर किसी भी काम में उपयोग लाया जाता है। बड़े ही उपेक्षित और एक रद्दी सी चीज समझा जाता है। मैंने भी बहुत बार गलत इस्तेमाल किया होगा लेकिन कुछ दिनों से इन अखबारों की कद्र बढ़ गई मेरी नज़रों में। इस लॉकडाउन में जब अखबार आना बंद हुआ तब यूं ही एक दिन मैंने एक पुरानी मूवी देखने बैठी और देखने बाद यह समझ आया की यह मामूली सा अखबार के लिए हजारों लोग कितनी मेहनत करते हैं और किस किस तरह के ख़तरों से खेलते हैं कभी कभी तो अपनी जान तक गंवा देते हैं।
एक संपादक महोदय की जिंदगी तो और भी दयनीय देखा। सबसे बुरा तो उनकी टाइमिंग थी। दोपहर 4 बजे से रात के 11 बजे तक का जिसके लिए उन्हें अपने घर से ढ़ाई तीन बजे निकलना पड़ता था और रात के 11 बजे ड्यूटी खत्म होने के बाद एक डेढ़ बजे तक घर पहुंच पाते थें। जिसके वजह से उनकी दिनचर्या आम आदमियों से बिल्कुल अलग हो गयी। जब सारी दुनिया सुकून से सो रही होती है तब वो अपने घर पहुंचते। उनके बच्चें गहरी नींद में सो रहे होते थें। पल भर ठहर कर उन्हें देखकर अपने कमरे में चले जाते मगर तुंरत नींद भी नहीं आती है कुछ देर बाद सोते और सुबह जब नींद खुलती तो बच्चें स्कूल जा चुके होते थें। चाय और अखबार के शुरू होता दैनिक कार्यक्रम और होते होते फिर दो बज जाते। पत्नी से दो चार बातें करके फिर निकल पड़ते लोकल ट्रेन से कभी कभी ट्रेन में भी झपकी ले लेते और दफ्तर पहुंच जाते। फिर 11 बजे छुट्टी होते फिर वही लोकल ट्रेन और वही उनिंदी सा सफ़र .....।
मूवी तो खत्म हो गई लेकिन एडिटर साहब की बोरिंग सी जिंदगी मुझे व्यथित करने लगी। इस नौकरी से परिवार का भरण-पोषण तो हो रहा है लेकिन वो सभी से दूर अलग थलग से होकर रह गये हैं। अपना निजी परिवार , रिश्तेदार , आस पड़ोस , समाज , देश दुनिया सभी से दूर होकर जीवन व्यतीत करने को मजबूर ........। ऐसे में यह बासी अखबार मुझे बहुत कीमती लगने लगा। अखबार वालों के प्रति मन में आदर और सहानुभूति के भाव उमड़ने लगे हैं। ठीक इसी वक्त देश में पत्रकारों पर अत्याचार होने की खबर लगातार मिलने लगी है इतना ही नहीं एक के बाद एक पत्रकारों की हत्याएं होने की खबर मुझे विचलित कर गयी। हाथ में बरसों पुराना अखबार में खुशियां तलाशने लगी ......।
