बाल मनोविज्ञान
बाल मनोविज्ञान
जब बच्चा जन्म लेता है तो उसको कुछ भी ज्ञान नहीं रहता है। उसकी मनोविज्ञान उसकी मानसिक विकास करती है।लेकिन जैसे जैसे उसकी उम्र बढ़ती है। तो कुछ कुछ ज्ञान होता है,मेरे माता पिता कौन है मैं कहाँ रहता हूँ?
लेकिन जब अपनी एक उम्र में पहुँच जाते है तो थोड़ा बहुत अच्छे बुरे का ज्ञान हो जाता है। सब की परवरिश अलग अलग समुदाय से और अलग जाति से होती है। लेकिन किसी की अगर वममानसिक विकास होता है तो वो उसके घर और स्कूल के साथ समाज मे रहने वाले लोगो से होता है।
विकास जिसकी उम्र अभी 7 साल है। और वो एक छोटे से मकान में रहता है, उसके माता पिता मजदूरी करते है। पूरा दिन विकास घर पर ही पड़ा रहता है। शाम को जब उमेश और सीता दोनों घर आते है तो विकास उनको पानी ला कर देता है।
“माँ, आज तो बहुत देर कर दी आने में ”। ( हाथ मे पानी देते)
“क्या करे बेटा काम भी तो बहुत था।” (उमेश हाथ धोते)।
“अच्छा.... लेकिन आप दोनों इतना मेहनत क्यो करते है।” (एक टक देखते)
दोनों उसकी बातों को सुन कर हँसने लगे और पानी पीते है।
“जब बड़े हो जाओगे तो सब समझ जाओगे”। ( खाना खाते)
कुछ देर बाद... “अच्छा अब सो जाओ रात हो गयी है”।
सुबह.....
सुबह सुबह विकास के माता पिता अपने काम पर चले जाते है। फिर विकास दिन भर कुछ लड़कों के साथ खेलता रहता है।
अरे...! राजू इधर आओ और खेलते है” ( विकास चिल्लाता कर)
राजू के साथ रोहन,विमल,सोनू भी आते है। और पास में बैठ जाते है।
यार .... हमारे पड़ोस में जो लड़का रहता है,वो बहुत अमीर है।उसके पास गाड़ी और बड़ा घर है। ( विमल बड़ी आँखे बना कर)
लेकिन....“. वो तो बहुत पढ़ने में भी तेज है।” ( सोनू सब को देख कर)
“लगता है इनके हाथ मे वो लकीरे है।जिससे अमीर होते है”(सोनू अपनी हथेली देख कर)
विकास सब की बाते बड़े ध्यान से सुन रहा था। लेकिन कुछ देर बाद वो वहाँ से चला जाता है।
रात को....
अब उसके दिमाग मे ऐसी बाते घुस गई थी कि उसको निकाल पाना मुश्किल है। अपनी हाथो की लकीरें देख देख कर बड़ा परेशान हो गया था।
“इसलिए मैं अमीर नही हो पा रहा हूँ। श्याद वो लकीर ही मेरे हाथ मे नहीं है।” मेरे दोस्त भी अमीर है एक मैं ही गरीब हूँ। (सोचते सोचते वो सो गया)
1 साल बाद....
अब विकास स्कूल जाने लगा था। लेकिन आज भी उसके दिमाग मे वही बात चल रही थी। अब वो पहले से ज्यादा उदास रहने लगा। लेकिन जब ऐसे हालात में उसके माँ बाप देखते है तो उनकी बड़ी चिंता होने लगी ।
“क्या हुआ बेटा ?...तुम इतने उदास क्यो रहते हो।” (सर पर हाथ फेरते)
हाँ....बताओ बेटा क्या हुआ?” ( प्यार से पूछता उमेश)
लेकिन...वो कुछ नहीं बोलता है,वहाँ से चला जाता है।लेकिन उसके माँ बाप को भी नहीं समझ मे आया कि क्या हुआ अचानक से इसको।
एक दिन....
ऐसे ही स्कूल जाते जाते सड़क के किनारे एक पंडित को सब हाथ दिखा रहे है।उसको उन सब की बात याद आ गयी । वो भी वही खड़ा हो गया।
“ऐ बच्चे... क्या देख रहे हो” (उसको पास बुला कर)
“बाबा मेरा भी हाथ देखो,क्या मैं इस बार फ़ास्ट आऊँगा”।( हाथ दिखाते)
“बैठो बेटा... क्या नाम है तुम्हरा?”(हथेली पकड़ कर)
“विकास”
“कितने में पढते हो?”
“2 में”।
पण्डित उसकी हथेली पकड़ कर देखने लगता है,कुछ देर इधर उधर हाथ को घूमता है।
“बेटा तू इस बार फेल हो जाएगा और अगले साल नहीं पता कि पास होंगे कि फेल”
अब विकास और उदास हो गया ।वो 2 रुपया देख कर चला जाता है। उसको क्या पता कि लकीरो से भी बढ़ कर कुछ और भी होता है वो है मेहनत । विकास तो मेहनत तो बहुत करता है लेकिन उसको लगता है कि लकीरे होने से मैं फ़ास्ट आऊँगा।
अब पूरा दिन ऐसे ही घर पर चुपचाप रहने लगा ।
एक दिन...
उसकी माँ उसको प्यार से पूछती है की
“ बेटा आखिर किस बात की चिंता हो रही है तुम को और क्यो ऐसे रहते हो?”।
कुछ देर यक शांत रहने के बाद वो पूरी बात बताने लगा।जब उसकी माँ पूरी बात सुनी तो उनको समझने में देर नहीं लगी। और अब उसके दिमाग मे वो सब बैठ गया है कि उसको निकलना जरूरी है।
“अच्छा एक बात बोलू बेटा..”
“हाँ माँ ”...
“मैं भी हाथ देखती हूँ, लेकिन कभी तुमको बताई नहीं”।
“अच्छा...” बहुत दिन बाद विकास के चेहरे पर खुशी साफ दिख रही थी।
”तुम्हरे हाथो में एक लकीर ऐसी है जो तुम को नहीं दिख रही है,जब तुम मेहनत करोगे तो तुम फ़ास्ट आओगें।”
“क्या माँ” ( बड़े खुशी से)
“तुम खूब पढ़ो और कुछ मत सोचो जब एग्जाम दे लोगे तो तब एक सामान दूँगी जिससे तुम्हरे हाथ मे वो लकीर आ जाएगी”।
“ठीक है,मैं बहुत मेहनत करूँगा”।
3महीने बाद...
एग्जाम हो गया था और सब पास भी हो गए । जब उसकी माँ को उसका रिजल्ट मिला तो बहुत खुश हुई क्योकि उनका वो तरीका भी काम आया ।
“क्या हुआ माँ.. मैं पास नहीं हुआ ना.. इसलिए बोलता था जब तक वो लकीर नहीं रहेगी मैं पास नहीं हो सकता ”( उदास मन से)
“बेटा... तुम फ़ास्ट आ गए हो।”( खुशी से गोद मे लेकर)
“लेकिन माँ मेरे हाथ मे तो वो लकीर नहीं तो फिर कैसे?”( सोचते )
“यही तो मैं तुम को समझना चाहती थी तुम को कोई लकीर वाकिर से कुछ नहीं होता है। तुम साल भर इतना मेहनत किये हो बेटा की तुम्हरे हाथ की लकीरे ही बदल गयी है।”
इसलिए अपनी मेहनत पर यकीन करना सीखो ना कि कुछ लोगो के कहने पर। विकास को भी उसकी माँ अब और ध्यान देने लगे ।उसको भी समझ मे आ गया कि।मेहनत से ही लकीरे बनती है और मनोबिज्ञान ही हमे बढ़ा और गिरा सकती है।
