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Rashmi Trivedi

Romance Others

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Rashmi Trivedi

Romance Others

और मुझे फिर से प्यार हो गया...

और मुझे फिर से प्यार हो गया...

12 mins
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अपने दस वर्षीय बेटे आरुष को स्कूल बस में बिठाकर सोनाली लगभग भागते हुए घर में आई। उसने देखा, अमन जूते पहनकर बस ऑफिस के लिए निकलने ही वाला था। उसे देख सोनाली ने पूछा, "तुमने इतनी जल्दी नाश्ता भी कर लिया??"


अमन - हाँ सोनाली, आज एक बहुत ज़रूरी मीटिंग है, मुझे जल्दी जाना है!! चलो, अब मैं चलता हूँ। तुम्हारी चाय ठंडी हो रही होगी, अब तुम आराम से बैठकर नाश्ता करो!! ओके बाय...


इतना कहकर अमन तेज़ी से घर के बाहर निकल गया। सोनाली भी उसके पीछे पीछे घर के बाहर आ गई। उसने देखा, अमन सीधे अपनी कार में बैठा और बड़े गेट से बाहर निकल गया। जाते हुए उसने एक बार भी सोनाली की तरफ़ नहीं देखा!!


अपना उदास चेहरा लिये सोनाली ने दो तीन सीढ़ियां नीचे उतरकर मेन गेट बंद किया और वह चुपचाप घर के अंदर चली आई। आकर डाइनिंग टेबल पर बैठी तो देखा, चाय-नाश्ता बिल्कुल ठंडा पड़ा था। उसने बेमन से चाय की एक घूंट ली लेकिन दूसरे ही पल कप नीचे रख दिया। उसका कुछ भी खाने-पीने का मन नहीं कर रहा था।


फिर वह मुँह लटकाए उठी और किसी मशीन की तरह यंत्रवत उसने घर के सारे काम एक एक कर ख़त्म किए। आखिर में वह नहाने बाथरूम में चली गयी। आज नजाने क्यूँ उसका बहुत रोने का मन कर रहा था!! लेकिन क्यूँ?? क्यूँ कर वह इतनी उदास हो गई थी?? कुछ हुआ भी तो नहीं था!!


शॉवर के पानी के साथ उसने अपने आँसुओं को भी बह जाने दिया। जब मन हल्का हो गया तो वह बाथरूम से निकलकर तैयार होकर आईने के सामने बैठ गई। बहुत देर तक वह अपने आप को निहारती रही। फिर अचानक उसे आईने में पीछे रखी मेज़ पर अपनी डायरी दिखाई दी। वह उठी और मेज़ के पास ही रखी कुर्सी पर बैठ गई।


उसने अपनी डायरी खोली और एक कलम उठाकर बस लिखना शुरू किया!!


मेरी प्यारी डायरी,


आज मन बहुत उदास है। कुछ हुआ तो नहीं है, पर ऐसा लग रहा है बहुत कुछ हो गया है। जबसे यहाँ नवी मुंबई वाले घर में आई हूँ, बहुत अकेलापन महसूस करती हूँ। जब दादर में मम्मीजी-पापाजी के पास रहते थे तो कम से कम मन लगा रहता था।


वो लोग अपना पुश्तैनी मकान छोड़ना नहीं चाहते और अमन का ऑफिस नवी मुंबई में शिफ़्ट होने की वजह से अब इस घर में रहना पड़ रहा है।


आजकल अमन दिन रात बस अपने काम में ही व्यस्त रहता है। जानती हूँ वो यह सब कुछ हमारे लिए ही तो कर रहा है, मेरे और आरुष के लिए!!


लेकिन न जाने क्यूँ, मैं कभी कभी सोच में पड़ जाती हूँ, क्या यह वही अमन है, जो कितना भी बिजी क्यूँ न रहे, मेरे लिए हमेशा वक़्त निकालता था। तब तो हम एक दूसरे के पास भी नहीं रहते थे, लेकिन आजकल तो बस ऐसा लगता है, हम दोनों एक दूसरे के पास तो है पर साथ नहीं है।


जानती हो, दो दिन बाद हमारी शादी की सालगिरह है। देखते देखते हमारी शादी को बारह वर्ष हो गए है, लेकिन यूँ लगता है जैसे कल ही बात हो!!


कॉलेज के समय में मेरी लिखी कविताएँ और कहानियों को पढ़ने के लिए कई बार तो अमन अपने क्लास भी मिस किया करता था। मुझे आज भी याद है, कैसे उसने एक दिन मेरी कविताओं का एक संग्रह मुझसे बिना पूछे प्रकाशन के लिए दे दिया था। उस संग्रह का जिस दिन विमोचन था, उसी दिन तो उसने मुझे शादी के लिए प्रपोज किया था!! ना कहने का तो सवाल ही नहीं आता था!! आख़िर मैं भी तो अमन को दिलोजान से चाहती थी!!


लेकिन आजकल वह कुछ बदला बदला सा लगता है!!


पिछले वर्ष अगर आरुष याद न दिलाता तो अमन तो हमारी शादी की सालगिरह भी भूल गया था। इस बार क्या होगा पता नहीं!!


क्या ज़िम्मेदारियाँ बढ़ने पर प्यार ख़त्म हो जाता है??

या जिम्मेदारियों के बोझ तले कहीं दब जाता है??

या फिर उम्र के साथ साथ प्यार कम हो जाता है??

कई वर्ष साथ साथ रहते रहते क्या उस प्यार को बस समझ ही लेना पड़ता है??

क्या उसे जताना ज़रूरी नहीं होता है??


पता नहीं...मैं नहीं जानती...

ऐसा नहीं है कि अब अमन मुझे चाहता नहीं!! मैं जानती हूँ, अमन आज भी मुझे उतना ही प्यार करता है, लेकिन कभी कभी उस प्यार को जताना भी ज़रूरी हो जाता है, यह बात मैं उसे कैसे समझाऊँ!!


आज जब उसने मुझे "सोनाली" कहकर संबोधित किया, तो न जाने क्यूँ मैं उस अमन को ढूंढ रही थी, जो कभी मुझे "शोना" कहकर पुकारा करता था। 


क्या मैं कुछ ज़्यादा की अपेक्षा कर रही हूँ?? या यूँ ही बात का बतगंड़ बना रही हूँ!! मुझे नहीं पता!! मैं तो बस इतना ही चाहती हूँ कि अपने काम और जिम्मेदारियों के साथ साथ अमन मुझे अपना थोड़ा सा वक़्त दे दे!! बस और कुछ नहीं...

.....


अपने मन की बात को अपनी डायरी में उतारने के बाद वह कुछ अच्छा महसूस कर रही थी। तभी उसे याद आया, कल तो उसे निरूपा जी के यहाँ जाना है।


निरूपा जी एक जानी मानी सामाजिक कार्यकर्ता थी। सोनाली उनके जीवन पर एक कहानी लिखना चाहती थी। जिसके लिए उसे निरूपा जी से मिलकर कुछ सवाब-जवाब करने थे। लेकिन अभी तक उसने कुछ भी तैयारी नहीं की थी। उसने अपने उलझे हुए मन को केंद्रित किया और वह जल्दी जल्दी अपने सवालों की लिस्ट तैयार करने लगी।


काम करते करते कब बेटे आरुष की स्कूल बस के आने का समय हो गया उसको पता ही नहीं चला!! वह जल्दी से अपना काम ख़त्म कर अपने आगे की दिनचर्या पर लग गई।


दूसरे दिन सुबह आरुष और अमन के घर से जाने के बाद सोनाली निरूपा जी के यहाँ चली गई। वहाँ बातों बातों में उसे वह सारी जानकारी मिल गई,जो वह अपनी कहानी के लिए चाहती थी। लेकिन इस चक्कर में उसे घर पहुँचने में थोड़ी सी देर हो गई।


जब वह घर पहुँची तो आरुष स्कूल से लौटा नहीं था। उसने मन ही मन भगवान का शुक्रिया अदा किया और स्कूल बस की राह देखने लगी!!


कुछ ही देर में उसने देखा, अमन की कार घर की तरफ़ आ रही थी। उसे देख सोनाली ने पूछा, "अरे आज तुम जल्दी आ गए!! देखो न अभी तक आरुष की बस नहीं आई है, मैं कबसे इंतजार कर रही हूँ!!"


उसकी बात सुन अमन ने कहा, "आओ गाड़ी में बैठो, हम स्कूल चलकर देखकर आते है!!"


सोनाली - लेकिन अगर वह घर आ गया तो घर पर ताला देख घबरा जाएगा!!


अमन - नहीं घबराएगा वो, अब वो बड़ा हो गया है !! चलो आओ, जल्दी बैठो!!


सोनाली ने अपने हाथ की घड़ी देखी, देर तो आज हो ही गई थी। कुछ सोचते हुए वह गाड़ी में बैठ गई। अमन चुपचाप गाड़ी चलाए जा रहा था। एक मोड़ पर गाड़ी के मुड़ते ही सोनाली ने कहा, "अरे अमन, तुमने गलत मोड़ ले लिया है। आरुष का स्कूल तो उस तरफ़ है!!"..


अमन ने उसकी बातों को अनसुना करते हुए गाड़ी की रफ़्तार को और बढ़ा दिया। जब सोनाली ने उसे ग़ौर से देखा तो अमन के चेहरे पर एक हल्की हल्की मुस्कान थी। सोनाली कुछ समझ नहीं पा रही थी!! जब एक सिग्नल पर आकर गाड़ी रुकी तो उसने अमन से पूछा, "अमन, मुझे सच सच बताओ, कुछ हुआ है क्या?? हम कहाँ जा रहे है??"


अमन ने उसकी ओर देखते हुए कहा, "हम एयरपोर्ट जा रहे है!!"


सोनाली ने हैरानी से पूछा, "एयरपोर्ट?? मगर क्यूँ??"


अमन - क्यूँ की हमें गोवा की फ्लाइट पकड़नी है!!


अमन ने बड़ी ही सहजता से कहा।


सोनाली - क्या ?? गोवा?? अभी?? और आरुष?? आरुष कहाँ है??तुम प्लीज मुझे कुछ बताओगे??


अमन - शोना, तुम कितने सवाल करती हो!! थोड़ी देर चुप नहीं बैठ सकती?? वैसे तुम्हें बता दूँ, आरुष को मैं स्कूल से माँ पापा के पास छोड़ आया हूँ और तुम यक़ीन नहीं करोगी, वह तो ख़ुशी से उछल पड़ा, जब मैंने कहा, दादा-दादी के यहाँ जाना है। वह बिल्कुल ठीक है!!

अब आज और कल बस हम दोनों ही है साथ!! समझी मेरी शोना!!


अमन के मुँह से "शोना" सुनकर सोनाली को लगा, जैसे उसका बरसों पुराना दोस्त, उसका प्यार उसे पुकार रहा हो!!


वह अपने ही सोच में डूब गई!! थोड़ी देर बाद वह कुछ कहती इससे पहले ही उनकी गाड़ी रुक गई। उसने देखा, वह एयरपोर्ट पहुँच चुके थे। अमन ने पार्किंग में गाड़ी पार्क की और वह दोनों एयरपोर्ट के अंदर प्रवेश कर गये।


सोनाली - अमन , तुम मुझे बताओगे प्लीज, आखिर यह सब क्या हो रहा है??"


अमन - तुम्हें क्या लगा था शोना, मैं अपनी शादी की सालगिरह इस बार भी भूल जाऊँगा!! नहीं, मैं नहीं भूला, मैं कुछ भी नहीं भूला हूँ शोना!!


सोनाली - तुमने...तुमने मेरी डायरी...


अमन - श..श..अब बिल्कुल चुप!! बस चुपचाप चलो मेरे साथ!!


सोनाली - लेकिन ऐसे... इस तरह..न कपड़े.. न बैग..न कोई सामान!!


अमन - क्यूँ क्या गोवा में कपड़े नहीं मिलते?? या वहाँ की सारी शॉप्स आज हड़ताल पर है?? तुम थोड़ी देर शांत नहीं रह सकती क्या!??


कुछ ही घंटों में सोनाली ने अपने आप को अपने अमन के साथ गोवा में पाया। सब कुछ जैसे पहले से सुनियोजित था। एयरपोर्ट पहुँचते ही एक कार उन्हें लेने पहुँच चुकी थी। कार में बैठते ही पहले सोनाली ने एक बार अपने हुलिए के बारे में सोचा। निरूपा जी के यहाँ वह एक सिंपल सी साड़ी पहने ही तो गई थी। उसने अमन से कहा, "ज़रा, मेरा हुलिया तो देखो अमन!!"


अमन ने कुछ कहा नहीं। थोड़ी देर में गाड़ी एक बहुत बड़े मॉल के सामने रुकी। अमन ने सोनाली से कहा, "चलो आओ, अपना हुलिया ठीक करें!!"


दोनों वहाँ की सबसे शानदार शॉप्स में गये। सोनाली को कुछ भी नहीं सूझ रहा था कि उसे क्या लेना है!! वह बस इधर उधर देख रही थी। लेकिन अमन फुर्ती से काम ले रहा था। लेडीज़ सेक्शन में जाकर वह किसी खूबसूरत ड्रेस की तलाश करने लगा। काले रंग के एक खूबसूरत पार्टी वेअर गाउन पर उसकी नज़र पड़ी। उसने वह उठा लिया।


सोनाली - अमन , तुम क्या कर रहे हो?? वो ड्रेस तो बहुत....


उसकी बात पूरी होने से पहले ही अमन ने आकर उसके होंठों पर उंगली रखते हुए कहा, "अच्छी लगेगी तुम पर, आय नो!! अब चुपचाप यहाँ खड़ी रहो!!"


सोनाली ने देखा, अमन उस ड्रेस पर मैचिंग ज्यूलरी भी पसंद कर रहा था। फिर आई खूबसूरत सैंडल्स की बारी!! आज सारी शॉपिंग अमन ख़ुद ही कर रहा था!! सोनाली तो बस उसे खड़े खड़े निहार रही थी!! वह समझ चुकी थी, अमन ने शायद उसकी डायरी के पन्नें पढ़ लिए थे।


ढेर सारी शॉपिंग कर जब दोनों होटल रूम में पहुँचे तो अमन ने कहा,"शोना, आज जितना वक़्त लेना है तैयार होने में ले लो!! मैं अभी आता हूँ"।


इतना कहकर वह कमरे से बाहर चला गया।


दरवाज़े पर टेक लगाई खड़ी सोनाली मन ही मन मुस्कुरा रही थी। अमन की सारी हरकतों पर उसे हैरत हो रही थी। उसने अपना नया गाउन उठाकर देखा और वह ख़ुद ही शर्मा गयी। उसने घड़ी की ओर देखा, साढ़े आठ बजे थे!!


वह जल्दी से बाथरूम की ओर भागी!! लगभग आधे घंटे बाद उसने जब अपने आप को आईने में निहारा तो वह ख़ुद ही सोच में पड़ गई कि आखरी बार कब वह इतनी अच्छे से तैयार हुई थी। वह बेहद खूबसूरत लग रही थी।


तभी दरवाज़े पर एक दस्तक हुई और जब सोनाली ने दरवाज़ा खोला तो सामने अमन काले रंग के सूट-बूट में किसी राजकुमार सा उसके सामने खड़ा था!!


अमन - बहुत खूबसूरत लग रही हो!!


सोनाली ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "तुम भी!!"


अमन ने बड़े प्यार से अपना हाथ आगे किया, जिसे सोनाली ने धीरे से थाम लिया!! फिर दोनों होटल से निकलकर एक कार में बैठे।


सोनाली - हम कहाँ जा रहे है??


अमन - शोना, आज तुम कुछ ज्यादा ही सवाल नहीं कर रही हो?? यक़ीन मानो जहाँ भी जा रहे है, तुम्हें वह जगह बहुत पसंद आएगी!!


सोनाली ने अमन का हाथ अपने हाथ में लिया और उसके काँधे पर अपना सिर झुका दिया।


कुछ ही देर में कार एक जगह रुकी। जब सोनाली बाहर आई तो उसे पहले तो हर तरफ़ अँधेरा ही नज़र आया, लेकिन साथ ही साथ समुंदर की लहरों की आवाज़ से उसे पता चला कि वह किसी समुंदर किनारे पर है। उन दोनों को वही छोड़ कार वहाँ से चली गई।


अमन ने सोनाली का हाथ थामा और उसे समुंदर की ओर ले गया। ठीक समुंदर किनारे रोशनी से जगमगाती हुई एक कुटिया दिखी। पास जाने पर देखा तो पता चला, वह कोई कुटिया नहीं थी। बल्कि खुले आसमान के नीचे एक टेबल सजाया गया था, जिसे चारों ओर से रोशनी और फूलों से सजाया गया था।


टेबल पर गुलाब के फूलों का बुके रखा था। अमन ने सोनाली को गुलाब के फूल देते हुए कहा,"थिस इज फ़ॉर यू माय शोना!!"

यह पहली बार हुआ था कि सोनाली के पास कोई शब्द ही नहीं थे कहने के लिए!!


फिर उस सुंदर से माहौल में बैठकर दोनों ने खाना खाया। खाने के बाद अमन ने सोनाली से कहा, "अगर तुम्हें मैं फिर से गुज़रे हुए पलों में ले जाना चाहूँ तो चलोगी मेरे साथ??"


सोनाली - मतलब??


अमन ने पीछे मुड़कर देखा, वहाँ एक अटेंडेंट खड़ा था। अमन का इशारा मिलते ही वह कही चला गया और अचानक से एक बड़ा सा स्क्रीन उन दोनों के सामने जगमगाने लगा। रोमांटिक म्यूजिक के साथ एक के बाद एक अमन और सोनाली की तस्वीरें उस स्क्रीन पर चलने लगी!!


उनके कॉलेज की तस्वीरें, शादी, हनीमून की तस्वीरें.. आरुष का जन्म..

सोनाली को ऐसा लगा, जैसे एक पल में ही उसने अपना गुज़रा जीवन फिर से जी लिया हो!!


सोनाली - ओह अमन , तुमने यह सब कब किया और कैसे??? थैंक यू सो मच अमन!!


अमन - अभी तो बस शुरुआत है!!


सोनाली अमन का यह रूप देख हैरान थी!!


तभी दूर किसी गिरिजाघर के घंटे की आवाज़ सुनाई दी। दोनों ने घड़ी में वक़्त देखा, रात के बारह बज चुके थे। अमन ने उठकर सोनाली को गले लगाया और धीरे से कहा,"हैप्पी एनीवर्सरी शोना!!"


जिसका जवाब सोनाली ने भी दिया!!


अमन ने अपने जेब से एक छोटा सा बॉक्स निकाला और उसे खोलकर उसमें से एक खूबसूरत अंगूठी निकाल सोनाली के उंगली में पहनाई!!


सोनाली की आँखों में अचानक आँसू आ गए, उसने अमन को गले लगाते हुए कहा, "ओह अमन, मुझे माफ़ कर दो!!"


अमन - अरे क्यूँ पगली!! अपनी डायरी में वह सब कुछ लिखने की वजह से ऐसा कह रही हो !!

अगर तुम न लिखती तो मुझे पता कैसे चलता कि मेरी शोना इतनी उदास है?? माफ़ी तो मुझे मांगनी है!!


सोनाली - वो किसलिए??


अमन - अपने काम की वजह से तुम्हें वक़्त नहीं दे पाता हूँ इसीलिए!!


सोनाली - ऐसा मत कहो अमन!! मैं तुम्हें समझ सकती हूँ!!


अमन ने शरारती लहज़े में आगे कहा, "और एक माफ़ी... तुम्हारी डायरी चोरी-छिपे पढ़ी इसीलिए!!"


उसकी वह बात सुन दोनों ने एक साथ ठहाका लगाया और दोनों हाथों में हाथ डाल समुंदर किनारे चल पड़े!!


उस दिन सोनाली ने अपने मन की डायरी में लिखा, "ओह अमन ...मुझे फिर से प्यार हो गया है...तुमसे...एक बार फिर से...

समाप्त..



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