और बसंत खिल उठा
और बसंत खिल उठा
कोच्चि से मुन्नार की ओर जाने वाली सड़क पर शेखर की कार तेज़ गति से आगे बढ़ रही थी।
वसंत ऋतु के आने से प्रकृति का कण-कण खिल उठा था। रास्ते के दोनों तरफ हरेभरे चाय के बाग़ान, फूलों पर बहार,
हर तरफ़ रंग-बिरंगी तितलियाँ, मानव तो क्या पशु-पक्षी तक उल्लास से भरे हुए लग रहे थे।
लेकिन शेखर और शामली की ज़िंदगी मे अभी तक कोई बसंत नहीं खिला था।
कोच्चि एयरपोर्ट से शेखर ने कुछ दिन के लिए कार किराए पर ले रखी थी। कार चलाते हुए एक नज़र उसने शामली की ओर देखा,खिड़की से बाहर झाँक रही शामली बिल्कुल शांत बैठी थी। शेखर उसकी आँखो को स्पष्ट देख नही पा रहा था,लेकिन वो जानता था,उसकी आँखें नम हो गयी थी। कार चलाते चलाते भी उसे पिछली सारी बातें याद आ रही थी।
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दो वर्ष गुजर गए थे पर शामली अभी भी आकाश को भूल नहीं पायी थी। भूलती भी कैसे,भला अपनी ज़िंदगी को कोई भूला पाता है??!!!
आकाश में जैसे उसकी जान बसती थी। कितने खुश थे वो दोनों साथ मे। शेखर खुद भी तो इस बात का गवाह था।
कॉलेज का प्यार यूँ परवान चढ़ा की ज़िंदगी भर का साथ बन गया। दोनों के परिवार भी कितने ख़ुश थे इस रिश्ते से।
शेखर भी शामली को कॉलेज के दिनों से ही पसंद करता था। आकाश ने अपने दिल की बात सबसे पहले शेखर को ही बताई थी और फिर शामली की पसंद जानने के बाद तो शेखर ने एक अच्छे दोस्त की तरह अपने दिल की बात को दिल मे ही दफ़न कर दिया था। वो अपने दोनों दोस्तों के लिए खुश था।
नजाने किसकी नज़र लग गयी दोनों को। कंस्ट्रक्शन साइट पर जहा आकाश जॉब करता था एक हादसा हो गया और हादसे में आकाश सब को छोड़कर इस दुनिया से और अपनी शामली से बहुत दूर चला गया था।
आकाश के जाने के बाद शामली एक ज़िंदा लाश बनकर रह गई थी। अपनी हँसती खेलती दोस्त शामली की ये हालत शेखर से देखी नही जा रही थी। आखिर एक जमाने मे दोस्त से कुछ बढ़कर ही माना था उसने शामली को। दिल के गहरे खाई में वो मोहब्बत आज भी मौजूद थी। अपने दोस्त आकाश के जाने का गम भी उसे बहुत था।
सबने सोचा वक़्त के साथ साथ शामली संभल जाएगी, लेकिन दो वर्षों बाद भी शामली की हालत वैसी ही थी जैसे पहले थी। लाख कोशिशों के बावजूद भी उसकी हालत में कुछ सुधार नहीं हो पा रहा था। शामली के माता पिता उसकी दूसरी शादी के बारे में सोच रहे थे।
शामली की माँ ने उसके पिताजी से कहा,"नया घर, नया माहौल, नई जिम्मेदारीयां रहेंगी तो अपने आप संभल जाएगी, आखिर कब तक यूँ अकेली रहेगी मेरी बेटी??!!"
शामली की माँ ने जब शामली से इस बारे में बात की थी, तब भी वो मौन थी,जैसे कुछ सुना ही ना हो।
थक हारकर शामली की माँ ने शेखर को बुलाया और सारी बात बताई। शेखर ने कहा,"आँटी जी, अगर आपको और अंकल जी को कोई ऐतराज ना हो तो मैं शामली को अपनी जीवनसंगिनी बनाना चाहता हूँ"।
शामली की माँ की आँखों मे ख़ुशी के आँसू आ गए, वो कहने लगी, "शेखर बेटा, तुम अगर हमारी शामली की ज़िंदगी को फिर से खुशियों से भर दो तो हमें क्या ऐतराज़ हो सकता है?! लेकिन दुख तो इस बात का है,शामली इस बारे में कुछ सुनना ही नहीं चाहती,मेरी बच्ची को मैं कैसे समझाऊँ?? वो तो मेरी एक नहीं सुनती"।
"आँटी जी ,आप बस मुझपर भरोसा रखिये,मैं बात करता हूँ शामली से", शेखर ने कहा।
माँ ने कहा, "अब तुम से ही सारी उम्मीदें है बेटा हमे"।
"थैंक यू आँटी जी,आप बिल्कुल चिंता मत कीजिये,मैं आज ही बात करता हूँ उससे"।
शामली की माँ ने कहा,"आँटी नही बेटा, माँ कहो, मैं तो तुम जैसे बेटा पाकर धन्य हो गई"।
उसी शाम शेखर शामली से मिलने फिर घर आया, उसने जैसे तैसे कर शामली को घर से बाहर,कही टहलकर आते है इस बात के लिए मना लिया। रास्ते के किनारे किनारे टहलते हुए दोनों आगे बढ़ रहे थे। शेखर इधर उधर की बातें कर शामली का मन टटोलने की कोशिश कर रहा था।
अचानक एक जगह शामली रुकी और शेखर से कहा,"देखो शेखर, मैं जानती हूँ माँ ने तुम्हे मेरी दूसरी शादी के बारे में बात करने के लिए भेजा है, लेकिन तुम तो सब कुछ जानते हो ना, मैं आकाश के अलावा किसी और के बारे में सोच भी नही सकती। मेरे लिए उसकी यादें ही काफ़ी है ज़िंदगी गुज़राने के लिए,अगर मेरी किस्मत में यही लिखा है तो मैं ऐसे ही जियूंगी। मैं माँ को पहले ही बता चुकी हूं, मुझे दोबारा शादी नही करनी किसी से,तुम भी माँ से कह देना"। इतना कहकर वो आगे बढ़ गयी।
शेखर भागते हुए उसके पास पहुँचा और कहने लगा,"अरे सुनो तो शामली, तुम्हें किसी और से शादी नही करनी तो मत करो, मुझसे ही कर लो प्लीज"।
जिस बात के बारे में कभी सोचा भी नही था वो यूँ अचानक सुनकर शामली रुक गयी और कहा,"क्या???? तुम पागल हो गए हो क्या??? मैंने कभी सोचा भी नही था कि तुम ऐसा कहोगे। आकाश के बेस्ट फ्रेंड कहते हो ना अपने आप को और यह बात कहते हुए तुम्हें शर्म नहीं आयी या फिर ये कोई भद्दा मज़ाक किया है तुमने???"
शेखर ने धीरे से कहा, "आकाश का और तुम्हारा भी बेस्ट फ्रेंड हूँ इसीलिए यह बात कह रहा हूँ। मेरी बात ध्यान से सुनो शामली और समझने की कोशिश करो, हम दोनों एक दूसरे को अच्छे से जानते है,तुम किस दौर से गुज़र रही हो मैं समझ सकता हूँ, मैं सिर्फ तुम्हें नही तुम्हारे साथ साथ आकाश की यादों को भी अपनाना चाहता हूँ। सोचो, अगर ऐसे हालात में तुम्हारी शादी किसी और से हो जाती है तो तुम कैसे निभा पाओगी उस अनजान व्यक्ति के साथ???
शेखर की बात सुन शामली ने कहा,"लेकिन शेखर,तुम मेरे लिए अपनी ज़िंदगी तो यूँ खराब नही कर सकते, तुम्हे और भी अच्छी जीवनसंगिनी मिल जाएगी,जो तुम्हें उतना ही प्यार करे जितना कि तुम उसे करो, मैं तुम्हे दोस्ती के अलावा कुछ नही दे सकती"।
शेखर ने कहा," आज बात निकली है तो मैं तुमसे कुछ नही छुपाउँगा, मैंने जब तुम्हे कॉलेज में पहली बार देखा था तब से ही तुम्हें पसंद करने लगा था, बस कभी किसी से ज़िक्र नही किया। जब आकाश ने मुझे तुम्हारे बारे में बताया था दिल टूट गया था मेरा। लेकिन तुम भी तो उसीको चाहती थी इसीलिए मैं पीछे हट गया"।
"ओह शेखर,चुप हो जाओ, मुझे कुछ नहीं सुनना, कुछ नहीं समझना", कहते हुए वो घर की तरफ तेज़ी से बढ़ गयी।
शेखर चुपचाप बूत बना वही खड़ा रहा।
कुछ दिनों के लिए सब कुछ शांत हो गया था,लेकिन शामली की माँ ने दोबारा शादी का विषय निकाला, बार बार घर मे एक ही बात। इस बीच एक दो बार शेखर भी शामली से मिलने आया, वो चुप रहती और शेखर उसे समझाकर चला जाता। शामली से भी अपने माँ पिता का दुख देखा नही जा रहा था,आखिर हालात से परेशान होकर शामली ने शेखर से शादी के लिए हां कर दी।
बड़ी ही सादगी से दोनों का विवाह संपन्न हुआ। अब शामली शेखर की दोस्त नहीं बल्कि पत्नी बन चुकी थी। दोनों ने इस बदलाव को महसूस किया था। पहले सहज रूप से बात करने वाली शामली अब शेखर से ज्यादा बात नही कर पाती थी।
एक दिन शेखर ने शामली से कहा,"शामली,यूँ उदास मत रहा करो, मैं आज भी तुम्हारा एक अच्छा दोस्त हूँ। अच्छा, चलो,कुछ दिन के लिए कही घूम आते है। तुम बताओ, तुम कहाँ जाना पसंद करोगी??"
पहले तो शामली ने बात टालने की कोशिश की लेकिन शेखर के ज़िद के आगे उसकी एक ना चली। वो झिझकते हुए कहने लगी,"अगर मैं कहूँ की मुन्नार चलते है तो ले चलोगे मुझे वहाँ??"
शेखर ने ख़ुशी से चहकते हुए पूछा,"मुन्नार, केरल वाला मुन्नार हिल स्टेशन ना?? वाह,क्या जगह चुनी है तुमने, चलते है वही,मैं अभी जाकर सारे इंतज़ाम कर लेता हूँ"।
शामली ने शेखर को रोकते हुए कहा, "तुम्हें पता है ना.??....."
इससे पहले की शामली अपनी बात पूरी करती शेखर ने शामली से कहा,"हाँ, हाँ, मुझे पता है ये वही जगह है जहाँ तुम और आकाश अपने हनीमून के लिए गए थे, तो इसमें क्या बड़ी बात है, हम दोनों मिलकर अपने दोस्त आकाश की खूब सारी यादें ताज़ा करेंगे। तुम खुश हो ना?? बस मुझे और कुछ नहीं चाहिए"। अपनी बात कहकर शेखर जाने की तैयारियों के लिए निकल गया।
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अचानक कार रुकी और शेखर अतीत की यादों से बाहर आया। कार चलाते चलाते वो कब अतीत की गलियों में मूड गया था उसे खबर ही नहीं थी। उसकी और शामली की शादी को केवल पंद्रह दिन ही तो हुए थे पर उसे लगा एक अरसा सा बीतगया हो। कार रुकने पर शामली ने अपनी भीगी पलकों को पोछते हुए पूछा,"क्या हुआ शेखर??"
शेखर ने कहा,"कुछ नहीं, वो बस ऐसे ही। अरे वो देखो, क्या सही जगह कार रोकी है मैंने, देखो, वो रहा तुम्हारा "कॉटेज मुन्नार"। यही जगह बताई थी ना तुमने??!"
शेखर की कार जहाँ खड़ी थी उसके थोड़ा आगे ही "कॉटेज मुन्नार" था। शामली कार से नीचे उतरी और शेखर कार पार्क करने चला गया। शामली की आँखों के सामने से इसी जगह आकाश के साथ बिताये हर लम्हें एक एककर चलने लगे। छोटासा लकड़ी से बना हुआ कॉटेज था वो। कॉटेज के बगल में सीढ़ियों को लगकर मधुकामिनि का पेड़ लगा हुआ था।
शामली खूब देर तक उस पेड़ को निहारती रही, तभी शेखर सामान लेकर वहाँ पहुँचा और पूछा,"क्या हुआ,यहाँ क्यूँ रूक गई??"
शामली के मुँह से निकल ही गया, "जब पिछली बार आकाश के साथ यहाँ आयी थी,यह पेड़ पूरा सफ़ेद फूलों से लदा हुआ था।
शेखर ने कहा,"इस बार भी खूब फूल खिलेंगे इस पर,देखो कितनी कलियां लगी है"।
उस दिन बहुत दिनों बाद शामली के चेहरे पर हल्की सी ही सही पर मुस्कान तो आयी थी।
दोनों ने कॉटेज में चेक-इन किया और फ्रेश होकर पैदल ही निकल पड़े आसपास घूमने।
चारों ओर पहाड़ों की ढलान,उन पर चाय के बगान। कटे-छँटे चाय के पौधों की झाड़ियों के बीच से ऊपर जाती चक्करदार सड़क। बीच-बीच में घने वन। ऊँचे, नाटे, छायादार .........तरह-तरह के वृक्षों, लताओं और वनस्पतियों से लदे हुए पहाड़। इन्हीं पहाड़ों में से एक के शिखर पर था उनका कॉटेज। कॉटेज के पीछे छोटी सी नदी भी बह रही थी और इन सबके साथ बसंत ऋतु तो था ही जो वातावरण को एकदम ख़ुशनुमा बना रहा था।
अब यह मौसम का जादू था या शेखर की तपस्या का फ़ल, पता नहीं पर शामली आज ख़ुश लग रही थी। आज वो शेखर से खूब बातें कर रह थी। उनकी बातों में भले आकाश हमेशा मौजूद रहा लेकिन शेखर ने कितनी सहेजता से हर बात का सम्मान किया था, शायद यही बात शामली के हृदय को छू गयी थी।
दिनभर की थकान के बाद जब दोनों अपने कमरे में लौटे,तो फ्रेश होने के बाद शेखर ने चुपचाप अपना तकिया लिया और सोफ़े पर जाकर सो गया। शामली ने कुछ कहा नही,वो भी चुपचाप बेड पर आकर सो गई। आज बहुत सारी पुरानी यादों को ताजा किया था उन्होंने, थकान तो होनी ही थी। कभी कभी यादें भी बहुत थका जाती है हमे।
दो-तीन दिन यूँ ही बीत गए।
इन चंद दिनों में शामली शेखर को धीरे धीरे जानने लगी थी।
अब धीरे धीरे आकाश का ज़िक्र बातों में कम होने लगा था। शामली अपने आप को शेखर की हर बात से प्रभावित महसूस कर रही थी। एक रात को जब शेखर सो गया, शामली को नींद नही आ रही थी वो खूब देर तक शेखर को देखती रही। वो ख़ुद ही समझ नहीं पा रही थी ये उसके साथ क्या हो रहा है,क्यूँ वो अब शेखर के बारे में इतना सोचने लगी थी।
फिर वापसी का दिन आया। कॉटेज के मैनेजर ने कहा था वो गाड़ी पार्किंग से निकाल देंगे। शेखर और शामली दोनों कॉटेज के बाहर खड़े अपनी कार का इंतजार कर रहे थे।
शेखर ने कहा,"देखो, अब तुम्हारे इस पेड़ पर खिल गये ना फूल??"
शामली ने मधुकामिनि के पेड़ को देखा, पूरा पेड़ अब सफ़ेद सुगंधी फूलों से भर गया था।
उसने मुस्कुराते हुए कहा,"हाँ आज तो सच मे यह पेड़ खिल उठा है"।
शेखर ने फूलों से भरी एक छोटी सी डाली तोड़ी और शामली को देते हुए कहा,"मेरे लिए तो आज ही असली बसंत खिला है"।
शामली ने शरमाते मुस्कुराते हुए फूलों स्वीकार किया। शेखर भी जान चुका था इसी मुस्कुराहट के साथ ही शामली ने ज़िंदगीभर के साथ की हामी भरी है।
उनकी कार आकर उनके सामने खड़ी थी। दोनों ने अपना सामान रखा और कार में बैठकर निकल पड़े साथ साथ ज़िंदगीभर के सफ़र के लिए...........

