अनोखा पत्र
अनोखा पत्र
मेरी प्यारी जिंदगी,
बहुत बहुत प्यार
कुछ पल खामोशियों मे बिताए तो लगा ,जिंदगी के शोर में खुद से मिले बहुत समय हो गया ।जिंदगी के बारे में बुरा भला सोच रही थी कि समुंदर के किनारे हुई तुमसे मेरी मुलाक़ात याद आ गई।हाथों से फिसलती रेत से मैंने एक बार पूछा कौन है तेरी सहेली ?रेत ने मुस्कुराकर कहा वहीं जो तुम्हारे साथ हमेशा चलती है और धीरे से फिसल जाती है।मेरी फिसलन दिखती है और महसूस भी होती है पर वह चंचला एहसास देकर ,फिसलकर ना जाने कहां खो जाती है ।मत पूछ उसका नाम है....."जिंदगी" तुमसे मिलना मुझे रोमांचक लगा ।रेत ने मुझे तुमसे मिलवाया।
मुझे तुमने अपने बारे में बहुत कुछ समझाया कि जिंदगी एक दौड़ है, जिंदगी में संघर्ष हैं पर इस सकारात्मक तरीके से किया जाए तो उत्सव की तरह लगती है मैने पूछा तुम इतनी कठिन क्यों हो ? तुम बोलीं ....दुनिया आसान चीजों की कद्र नहीं करती। जिंदगी आसान नहीं होती मुझे आसान बनाना पड़ता है कुछ अपने हुनर से,कुछ सीखकर कुछ सहन करके और कुछ सही समय पर सही निर्णय लेकर।बिना संघर्ष मंज़िल नहीं मिलती और मैं किसी के लिए नहीं रुकती। तुमने कहा था कि तुम एक पहेली हो और मेरी सहेली हो। जीवन को संगीत मानकर जियो आनंद मिलेगा।
पर जिंदगी तुम्हारी चाल इन दिनों कुछ तेज़ हो गई है कुछ चीजें पीछे छूट रही हैं तुमसे मेरी विनती है जिंदगी……जरा धीरे चलो... कई कर्ज चुकाने हैं ,कुछ दर्द मिटाने हैं कुछ रिश्ते संभालने हैं क्योंकि तुम्हारी तेज़ गति से बिगड़े कुछ रूठे रिश्तों को मनाना है और कुछ रोतों को हंसाना है।
कुछ इच्छाएं अभी अधूरी हैं , कुछ काम पूरे करने बाकी हैं।
आज तुम्हारी बातें याद आईं तो तुम्हे पत्र लिखने बैठ गई।फिर कभी जब तुम्हारी पहेली सुलझाने में उलझन होगी तो तो तुम्हें पत्र लिखूंगी।
प्यार भरे नमन के साथ पत्र समाप्त करती हूं।
"जब पत्र भेजने लगी तो जिंदगी हाथ से फिसल चुकी थी"

