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मुज़फ्फर इक़बाल सिद्दीकी

Abstract


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मुज़फ्फर इक़बाल सिद्दीकी

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अंकुर

अंकुर

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किलोल पार्क के मख़मली घास वाले लॉन में जब अंकुर पंगु-पंगु चलकर दौड़ लगता तो पीछे से वर्षा भी भागती। उसको हर पल डर लगा रहता कि अंकुर कहीं गिर न जाए। डेढ़ साल के अंकुर ने अभी-अभी चलना सीखा है। जैसे ही वह उसके पीछे दौड़ती वह और तेज़ दौड़ लगा देता। फिर वर्षा रुक गई तो दूर खड़ा अंकुर भी रुक गया। अंकुर इस इन्तिज़ार में था कि माँ पीछे दौड़ेगी तो वह और तेज़ दौड़ेगा। उसकी शरारतें दिन प्रति दिन बढ़ती जा रहीं थीं। लेकिन माँ तो माँ है उसने थोड़ा रुक कर अंकुर को चकमा देकर पकड़ ही लिया। और गोद में लेकर बैठ गई। कहने लगीअब तुम कहीं नहीं जाओगे। बहुत खेल कर लिया। लेकिन अंकुर भी किसी तरह उसके हाथ से छूट कर फिर भाग गया। उसके चूँ-चूँ करते जूतों की आवाज़ पता नहीं वर्षा को कितना सुख देती थी। दरअसल चाहती तो वह भी थी कि अंकुर के ये ढुल-मुलाते क़दम बहुत जल्द ही इस ज़मीन पर दृढ़ता से पड़ने लगें।

अभी वह अपने अंदर के विचारों में गुम ही थी कि बेटी सुरभि और पति विशाल पार्क के बाहर खड़े रेहड़ी वालों से कुछ खाने पिने का सामान ले आए। गर्मियों के दिनों में दो कमरे के फ्लैट में से थोड़ी राहत के पल रोज़ इस तरह शाम को पार्क में गुज़र जाते। 

जब अंकुर वजूद में आया तब से वर्षा की तो लाइफ स्टाइल ही बदल गई थी। लेकिन उसके पेट में आते ही कितनी लड़ी थी वह विशाल से। 

विशाल मैं किसी भी तरह इस गर्भ को धारण नहीं करुँगी .और न तुम मुझ से जोर-जबरदस्ती कर सकते। ये मेरी मर्जी है। हमने सुरभि के टाइम ही ये फैसला कर लिया था कि जो भी होगा। हमारा सिंगल चाइल्ड ही होगा। चाहे लड़का हो या लड़की इस से कोई फर्क नहीं पड़ता। फिर इतने दिन बाद। तुम अच्छी तरह जानते हो सुरभि नौ साल की हो रही है। समझदार हो गई। कुछ दिन बाद मुझसे कुछ पूछेगी तो क्या जवाब दूँगी उसे। 

देखो वर्षा। थोड़ा गंभीरता से सोचो। एक तो दुर्भाग्य वश हम दोनों की ऐज में बहुत अंतर है। अभी तुम्हारी ऐज है। तुम एफर्ट कर सकती हो। अगर हम दो चार साल रुकते हैं तो फिर ऐसा संभव नहीं होगा। 

लेकिन वर्षा कुछ समझने को तैयार नहीं थी बहुत रोई थी टेस्ट के पॉजिटिव आने पर। मम्मी-दीदी अपनी फ्रेंड सभी से सलाह करती। लेकिन सभी चुप हो जाते। उसको लगने लगा सब मिले हुए हैं। एक दिन तो वह डॉक्टर के पास खुद ही पहुँच गई। डॉक्टर ने केस हिस्ट्री जान कर बला टाल दी। बोली कल हस्बैंड को लेकर आना। फिर चुप बैठ गई। दिन निकलते जा रहे थे। इसके फैसले का कोई भी साथ नहीं दे रहा था। आज तो विशाल के घर आते ही उखड़ गई। 

तुम समझते क्या हो। क्या एक नारी की भावनाओं की कोई कदर नहीं है। मैं ने कितने मुश्किल से इन बीते सालों में इंटीरियर डिजाइनिंग में अपना कैरियर बनाया है। अब जब मार्किट में मेरी एक पहचान बनी है तो मैं वापस बच्चे पलने की मशीन बन जाऊँ। तुम पति हो इसका ये मतलब नहीं कि मेरी किस्मत के फैसले भी तुम ही करोगे। सुरभि काफी है,हमारे लिए। वही हमारा बेटा है और बेटी भी। तुम भूल गए मैं ने बिसनेस करने का निर्णय भी तुम्हारी कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण लिया था। अब तुम्हारी जेब में चार पैसे क्या आ गए कि तुम्हारी मर्दानगी जाग गई। अगर लड़की हो गई तो फिर रोने बैठ जाना। 

नहीं वर्षा तुम ग़लत समझ रही हो। अब कोई गलती हो गई तो शायद ईश्वर को यही मंजूर है। मुझे तो कल भी लड़के-लड़की मैं कोई फर्क नहीं था और आज भी। अगर ऐसा होता तो हम लड़के के लिए इस बीच प्रयास करते। फिर डॉ गाँगुली ने भी हमें यही समझाया है न कि अगर आप एफर्ट कर सकते हैं तो एबॉर्शन का जोखिम नहीं लेना चाहिए। हो सकता है ऊपर वाले को यही मंज़ूर हो। फिर रही तुम्हारे बिसनेस की बात तो अभी किसी असिस्टेंट को अपॉइंट कर लो। कुछ दिन की बात है। मैं भी पीछे से सपोर्ट कर दूँगा। सुरभि अपने काम खुद कर ही लेती है। कुछ दिन के लिए अपनी मम्मी को बुला लेना। तुमने मेरे हर क़दम पर साथ दिया है। लेकिन पता नहीं क्यों आज मैं तुम्हें मजबूर कर रहा हूँ। प्लीज , प्लीज .और प्लीज मेरी बात मान लो। 

पता नहीं क्यों थोड़ी पिघल सी गई थी, विशाल के इस तरह गिड़-गिड़ाने पर। बहुत मन मसोस कर कर अपने आप को तैयार किया था उसने। 

ठीक है लेकिन तुम वादा करो रोज़ टाइम पर घर आओगे .और घर के कामों में साथ दोगे। मैं यहाँ जा रहा हूँ, वहाँ जा रहा हूँ, अभी आया तभी आया। बिल्कुल नहीं चलेगा। और हाँ सुरभि की पढ़ाई का कोई भी नुक्सान नहीं होना चाहिए। वह ट्यूटर के भरोसे बिल्कुल नहीं रहेगी। तुम्हें साथ में बैठ कर होम वर्क खुद करवाना होगा। अगर तुमने ज़रा भी लेतलाली बरती तो तुम जान ना। मैं केवल तुम्हारी बात रखने के लिए ही तैयार हूँ। ऐसा नहीं हो कि मैं यहाँ पड़ी रहूँ और तुम अपने दोस्तों के साथ पार्टियाँ करते रहो। 

विशाल ने तो उसे बाँहों में भरकर किस कर लिया। थैंक्स ए लॉट ... तुमने मेरी बात रख ली। 

पता नहीं कितने वादे करवा लिए थे उसने, इसके बदले। लेकिन विशाल भी उसके पूरे नाज़नखरे उठाने का मन बना चुका था। 

पति-पत्नी का रिश्ता ही भगवान् ने ऐसा बनाया है। एक दूसरे की भावनाओं की कदर करते हुए, एक दूसरे के लिए त्याग और समर्पण की भावना से जीते हुए ज़िन्दगी के सफर का पता ही नहीं चलता। इसीलिए तो पति-पत्नी की छोटी-मोटी तकरार दूध में मलाई के जैसी होती है। वक़्त गुज़रता जा रहा था। जैसे-जैसे ड्यू डेट नज़दीक आ रही थी वर्षा के नखरे बढ़ते जा रहे थे। लेकिन विशाल हर पल उसके पास, उसके साथ खड़ा था। 

फिर एक दिन ये चाँद उसकी गोदी में जब आया तो वर्षा की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा। अब तो उसकी ज़िन्दगी में विशाल की इज़्ज़त और बढ़ गई थी। विशाल के हृदय में भी वर्षा ने अपनी जगह पक्की कर ली थी।

उनकी ज़िन्दगी की बगिया में एक प्यारा सा नन्हा सा पौधा अंकुरित हो उठा था।  


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