अम्मा की अमानत
अम्मा की अमानत
आज अम्मा और बाबूजी बहुत खुश थे ..और हो भी क्यों ना ...? बड़के की शादी के लिए बहू जो देखने जाने वाले थे ..!
कुछ दिन ही तो हुए थे जब साहब सिंह की अपने ही गांव के प्राइमरी स्कूल में नौकरी पक्की हुई थी । पूरा गांव खुशी से झूम उठा था ।
बाबूजी... बड़के की नौकरी लगी है... ऐसे काम ना चलेगा.... गांव वाले बाबूजी से कहते ..और बाबूजी ने भी गांव के सभी लोगों को लड्डू के साथ दावत का अच्छा इंतजाम किया था ...!
पहली बार गांव का कोई लड़का सरकारी नौकर हुआ था। जो गांव के लिए गर्व का विषय था । लोग कहते... अब देखना अपने बच्चों को गांव का ही छोरा पढ़ाएगा ....तो अपने बच्चे भी इसकी तरह होशियार हो जाएंगे ।
तभी साहब सिंह के मामा आ गए और बोले.... जीजा जी सब तैयार है ना....??
हां... हां... पुत्तन... तुम चिंता ना करो ! सब कुछ तैयार है ।
बड़के भी चल रहा है क्या बहना ...?
हां ...हां ....पुत्तन ...हम तीनों ही चल रहे हैं। पुत्तन साहब की अम्मा का छोटा भाई था ।
तुमने लड़की वालों को सब बता तो दिया है ना पुत्तन..?
हां.... हां ... बहना...तू चिंता ना कर..! लड़की सब कुछ तैयार कर लेगी ...! बड़ी कमेरी है। तुम देखना उसे कोई फेल नहीं कर पाएगा ।
साहब के साथ उसकी अम्मा, बाबूजी और पुत्तन बैलगाड़ी में बैठकर रेलवे स्टेशन की ओर चल दिए। रेलवे स्टेशन गांव से दो कोस दूर था । रास्ते में गाड़ी वाले ने पूछा.... बाबूजी ...बहुरिया को ठीक से देख लेना। उसके हाथ पांव और नाक नक्श।
हां ..हां बबलू....इसी सबके लिए ही तो हम जा रहे हैं..! मामा लड़की पढ़ी लिखी तो है ना ... साहब ने बीच में ही उत्सुकता वश पूछा ।
हां ...हां बड़के ....लड़की.. पांचवी पास है और ...बड़ी ही सभ्य और सुशील है। रामायण चिट्ठी सब पढ़ लेती है।
और अंग्रेजी ...?
अरे बड़के... अंग्रेजी भी टूटी-फूटी जानती है..! तू चिंता ना कर ...तेरे मामा ने तेरे लिए हीरा ढूंढा है ..!! वह तो जीजा जी उसकी मां नहीं है... इसलिए उसके पिताजी जल्दी से उसके हाथ पीला करने की सोच रहे हैं । मैं तो कहता हूं ... अगर लड़की पसंद आए तो तुरंत बात पक्की कर लेना ...! ऐसी लड़की जल्दी नहीं मिलती। यह सब बातें करते हुए रेलवे स्टेशन आ गया और सभी लोग रेल में बैठकर लड़की के गांव पहुंच गए।
घर के बाहर लड़की के पिता खड़े हुए पुत्तन का और उसके मेहमानों का इंतजार कर रहे थे । तभी पुत्तन ने कहा... राम राम जी भाई साहब ..!
राम-राम पुत्तन ...आओ और बैठो ..! बेटा देख पुत्तन चाचा आए हैं और उनके मेहमान भी । जल्दी से पानी लेकर आ ।
लड़की का भाई सभी के लिए पानी और खोए की बर्फी ले आया। बड़ी स्वादिष्ट मिठाई है भाई साहब ...पानी के साथ मिठाई खाते हुए बाबूजी ने कहा...!
जी ...बिटिया ने बनाई है..! घर का सारा काम वही करती है । उसकी मां जब से गुजर गई ...वही सब कुछ संभालती है ।
आपकी बिटिया काफी जिम्मेदार लगती है।
तभी लड़की के बापू ने अपने लड़के से कहा... बबलू बेटा एक बाल्टी में पानी और लोटा ले आओ। सबके हाथ मुंह धुला दो । ताकि जल्दी से खाना खिलाया जा सके। सुबह के जल्दी चले हैं... भूख तो लगी होगी ना....!!
बबलू पानी लेकर आया और सभी के हाथ पांव धुला दिए। सभी के लिए जमीन पर आसन लगा दिए गए और फिर थालियां में परोसा हुआ भोजन आने लगा । कई तरह की सब्जी के साथ खीर पूड़ी कचौड़ी भी बनी थी । साथ में बाबूजी की प्रिय लौकी की बर्फी भी थी । सभी ने भरपेट खाना खाया ।
लड़की के पिता ने कहा ....बाबूजी खाना ठीक तो था ना.. बिटिया ने बनाया है ...कोई भूल चूक हुई हो तो ....उसे क्षमा कर देना...!
क्षमा..अरे यह कहो बिटिया साक्षात् देवी है..! कितना स्वादिष्ट खाना बनाया है और लौकी की बर्फी के तो कहने ही क्या ...! थोड़ी घर के लिए भी लेकर जाऊंगा ...घर पर भी तो खानी है ना मुझे..!
जरूर ...जरूर ...
भाई साहब अब बिटिया को भी बुला लो.. पुत्तन ने कहा.. बिटिया को तैयार करके उसकी चाची उसे ले आई । सबके पैर छुओ बिटिया ... चाची ने कहा..
लड़की ने सभी के पैर छुए तो घर वालों ने उसके चेहरे पर नजदीक से निगाह डाली...
रंग रूप से तो सुंदर लग रही है.... अम्मा ने बाबूजी से कहा । तनिक हमारे पास बैठो बिटिया... साहब की अम्मा ने उससे बोला । लड़की अम्मा के पास ही चारपाई पर बैठ गई ।
अम्मा ने पूछा... बेटी यह खाना तुमने ही बनाया ..
जी अम्मा....
और बर्फी.... बाबूजी बीच में ही बोल पड़े ...
मैंने ही बनाई है बाबूजी ....बोलचाल और रंग रूप से लड़की सभी को पसंद आ चुकी थी और आव भगत व संस्कार तो पहले ही पसंद थे।
बेटी... कहां तक पढ़ी हो ....अम्मा ने कहा ...?
गांव में ही प्राइमरी स्कूल था.. तो वहीं से पांचवा पास कर लिया था... अम्मा....
अरे ..मैट्रिक क्यों नहीं किया ... साहब सिंह ने उसे बीच में ही टोका।
जी ...वह....
तभी बाबूजी बोले... बड़के मैट्रिक कर लेती तो क्या तू उसे नौकरी करवाता । बहू पढ़ी है ..यही बहुत है ...
साहब चुप हो गया ....मगर शादी हो रही थी तो कुछ अरमान उसके मन में छुपे हुए पल बढ रहे थे ।
वह फिर से बोला .…अम्मा इसे अंग्रेजी आती है.. पूछो... पूछो ....
लड़की ने कहा... थोड़ी-थोड़ी आती है...
तो मुझे बताओ ..कुछ पूंछू...
बाबूजी ने बीच में ही टोका ... बड़के ...तूने अपनी मास्टरी बहु को अभी से दिखाना शुरू कर दिया ...!
अरे बाबूजी ...जमाना बदल गया है..! लड़की पढ़ी लिखी होगी तो बच्चे भी पढ़ लिख जाएंगे ।
हां हां ...तेरी अम्मा नहीं पढ़ी तो तू भी भला कहां पढ़ पाया ....? और हां अगर पूछना ही है तो एक दो प्रश्न ही पूछना ...ज्यादा बकबक की जरूरत नहीं है ...! मुझे और तेरी मां को लड़की पसंद है । क्यों बड़के की मां ।
हां हां... बेटा मेरी बहु बहुत सुशील है..! मेरी बहू तो हीरा है... हीरा....गले लगाते हुए अम्मा का हृदय बिन मां की बेटी के लिए द्रवित हो गया।
मन ही मन लड़की बहुत खुश थी...! ऐसे मां-बाप पाकर वह धन्य हो जाएगी ...वह मन ही मन सोचने लगी।
तभी बड़के ने कहा... अच्छा जब हमारी तुम्हारी शादी हो गई तो तुम मेरी पत्नी हो जाओगी। तो बताओ पत्नी को अंग्रेजी में क्या कहते हैं...
B ..B...
बी ..बी...
हां हां ...सही तो कहा बहू ने
पर अम्मा ...अरे कुछ और पूछना हो तो पूछ ले
अच्छा... और पति को क्या कहते हैं ....
लड़की ने कहा .....
A...G ....!
अरे यह कैसी अंग्रेजी पढ़ी है अम्मा ...
तू चुप कर ....मेरी बहू बिल्कुल सही पढ़ी है । ABCD उसे सब आता है । उसने सब कुछ अंग्रेजी में सही-सही ही तो बताया है ... कहते हुए अम्मा ने कहा.... सुनो जी ....वह अंगूठी और पायल निकालो ....बहू को पहना दूं ..और बात पक्की करूं ....बाबूजी ने अपनी कमीज के अंदर पहने इनर की जेब से दोनों चीज निकल कर अम्मा को दे दी और उन्होंने बहू को पहनाते हुए बात पक्की कर दी और घर चले आए।
पूरे परिवार के साथ आज पूरा गांव खुश था। गांव वाले बारात में जाने की बाट जोहने लगे । आज शादी को पूरे 40 साल हो गए ...ना अब अम्मा है ....और ना बाबूजी .. मैं खुद भी अब बूढ़ा हो चला हूं । साहब आज नए साल पर अम्मा बाबूजी की तस्वीर को साफ करते हुए मन ही मन सोच रहा था।
तभी हीरा ने उसे आवाज दी.... A G सुनते हो...खाना तैयार हो गया है । हाथ मुंह धो लो मैं खाना लगा देती हूं। मैंने सब कुछ वही बनाया है जो तुम सबको पसंद है खीर पूड़ी कचौड़ी और लौकी की बर्फी भी....आज नया साल जो है ।
हां हां ... खाना लगा दे ...आज बहुत थक गया हूं ...
लो खाना खा लो ...फिर तुम्हारे हाथ पांव दबा दूंगी ...!
साहब सिंह..खाना खाते-खाते हीरा को निहारने लगा । सच में घर की लक्ष्मी है यह... सच ही कहती थी अम्मा । मैं भाग्यशाली हूं जो अम्मा बाबूजी ने मेरा ब्याह इससे कर दिया । वह खाना खाकर चारपाई पर लेट गया । हीरा उसके हाथ पांव और सर को दबाने लगी । साहब को भी आज अपने अम्मा बाबूजी की बहुत याद आ रही थी। लेकिन वह आज उसके साथ नहीं है। बस उनकी अमानत स्वरुप उनकी बहू हीरा उसके साथ है ...जिसे वह हमेशा संभाल कर अपने साथ रखेगा.... और वह उसे तमाम खुशियां देगा जो उसके अम्मा बाबूजी उससे चाहते थे...
✍️ डॉ संजय सक्सेना
