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अक्स

अक्स

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यह क्या लिखा है तुमने....

क्यों.? क्या हुआ.... तुम्हें पसंद नहीं आया.... या बहुत पसंद आ गया... कथाकार ने हँसते हुए पूछा..?

पसंदगी तो छोड़ो.... तुम्हारी रचनाएँ पढ़कर मैं तो अवाक हूँ कि कितने कंफ्यूज आदमी हो तुम....

कंफ्यूज और मैं...? ऐसा क्यों लगता है तुम्हें....?

क्योंकि तुम्हारी रचनाएँ वास्तविक धरातल पर नहीं होती हैं.... जाने किन आदर्शों की बात करते हो.... निष्पक्ष होने के ढोंग में तुम्हारी एकपक्षीय राय जग जाहिर होती है... चाहते हो कि सभी तुम्हारी राय से एकमत हो... तुम्हारे अंदर वह माद्दा ही नहीं है कि दूसरे का मत सुन भी सको..क्षमा करना... तुम एक आत्मकेंद्रित व्यक्तित्व

हो.... क्योंकि जहाँ तुम खड़े होते हो.... दूसरे की गुंजाइश छोड़ते ही नहीं हो....!

हा...हा...हा... तुम भूल रहे हो... मेरे साथ इतने लोग सहमत होते हैं... कुछ उनके बारे में भी तो सोच़ो...

सोचना क्या है.... सिरफिरों की भी अपनी एक जमात होती है.... जो सोचती है कि छोड़ो इसे इसके हाल पर...

थोड़ा हूँ ...हाँ करने में मेरा जाता क्या है....!

कथाकार को लगा कि वह किससे बातें कर रहा है....

कहीं यह मेरा अक्स तो नहीं...!


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