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" जथा नाम--तथा गुण "

" जथा नाम--तथा गुण "

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कभी-कभी जीवन में अनायास ऐसा कुछ घट जाता है कि मामूली सी बातों से भी जीवन-दर्शन ही बदल जाता है। 

हमारे आसपास अनायास कुछ घटित होते ही रहता है पर हमारी स्थूल दृष्टि के पकड़ में नहीं आता है ?

मीमांसा के लिए सूक्ष्म दृष्टि अति आवश्यक है।


आंखों में तनिक तकलीफ थी। जरा भी ज्यादा पढ़ा-लिखा या ठंडी हवा लगी नहीं कि आंखों से निरंतर पानी बहने लगता था। बहुत दिनों से चला आ रहा था यह सब... मन ने कभी कहा ही नहीं कि यह कोई गंभीर समस्या हो सकती है। पर जिक्र तो होता ही था और कब पतिदेव ने डाक्टर से एप्वाइंटमेंट तय कर लिया...पता ही नहीं चला।

खैर.... अब जाकर दिखाना ही था।

छोटा सा क्लीनिक... पर डाक्टर साहब बड़े नामी हैं अपने फील्ड में। शहर के सबसे प्रसिद्ध आई स्पेशलिस्ट।

पहुंचे तो वेटिंग रूम में बड़ी भीड़ लगी हुई थी।

अंदर डाक्टर साहब किसी मरीज के साथ व्यस्त थे। मेरा तो अप्वाइंटमेंट तय था पर फिर भी प्रतिक्षा तो करना ही था।

बहुत से ऐसे लोग भी आ रहे थे जो नंबर नहीं लगाए हुए थे.... रिशेप्सनिस्ट एक स्टूल पर बैठकर उन सबके नाम नोट कर रही थी और नंबर दे रही थी।


 नाम कौशल्या बाई.... केतकी बाई...शकुन बाई....

अनायास बिला वजह रिसेप्शनिस्ट ने मेरी तरफ देखा और बोल पड़ी...." यह देखिए.... सब बाईयां ही हैं...देवियों ने जन्म लेना छोड़ दिया है शायद "....?

अनायास मजाक में कही गई इस मामूली सी बात से मेरे तो ज्ञान चक्षु ही खुल गए और मैं सोचने पर मजबूर हो गई कि सही कह रही है यह...बात तो वाकई गहरी है कि नाम की अहमियत की क्या अब समझ नहीं है या कहीं लोग...

 "शेक्सपियर की कही इस बात पर पूर्ण विश्वास तो नहीं कर बैठे हैं कि नाम में क्या रक्खा है ?"


 " गुलाब को गुलाब नहीं कहो तो भी रहेगा वह गुलाब ही... "

 " पर फिर कहा क्या जाएगा...कभी इस पर भी सोचा है " 

" नाम रखने का दृष्टि बोध जाएगा कहाँ " ?

" गुलाब अगर गुलाब न रहा तो गाल भी गुलाबी नहीं रहेंगें और गुलाबियत की मुलामियत भी " 


 " पंखुड़ियों की छुअन की वह गुलकंदी नरमाहट भी कहाँ बचेगी " उससे बने इत्र की खुशबू का नाम क्या होगा ..?


" गुलाब अगर रहे नहीं गुलाब... तो बबूल और गुलाब के फर्क का सौंदर्य बोध भी कहाँ 

बचेगा " ? 

" बबूल और गुलाब का फर्क हमेशा रहेगा "



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