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कर ले यूँ ही कुछ गुफ्तगू

कर ले यूँ ही कुछ गुफ्तगू

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आज यूँ ही फुर्सत में बैठी हूँ। फरवरी का महीना है। विगत तीन-चार दिनों से गहरी बदरी छाई हुई है। कोहरा का पूरे दिन प्रकोप है। सूरज भगवान का कहीं भी भान नहीं हो रहा है।और ऐसे मौसम में मन में एक उदासी सी छा जाती है। शायद यह बरसात के मौसम में होता तो कवियों का कल्पना संसार जाग्रत होता। मन में जो मयूर छुपा हुआ होता है।वह नाचता। एक कवि ही तो हो सकता है जिसने शायद कभी मोर देखा हो या न देखा हो। देखा भी हो तो शायद कभी नाचते न देखा हो। पर अपनी कल्पना के मयूर से ता-धिन-ता पर नर्तन तो करवा ही देता है। अब मेरे मन का मयूर नाचने के मूड में तो कतई नहीं है। बल्कि वह बेमौसम के इस मौसम से आजिज भी है।

अब यह अहसास कि इस समय दिन है तो वह सोने की भी इजाजत नहीं दे रहा है। काम कुछ सूझ नहीं रहा है।बड़ी पापड भी बना नहीं सकती कि कुछ तो समय कटे। क्योंकि सूरज भगवान तो बादलों के पार छुपे हुए हैं। तो बड़ा यक्ष प्रश्न खड़ा है कि करूँ तो आखिर करूँ क्या ?

सोच रही थी कि कुछ लिख ही लेती हूँ। अपने स्वभाव के हिसाब से तो सबसे उचित तो यही हो सकता हैं कि कुछ ज्वलंत मुद्दे लूं ।फिर उन पर अपने आक्रोश को शब्दों के रुप में कागज पर लिख दूँ। पर हाय।उदासी के भाव बड़े गहरे चढ़ें हैं तो लेखनी में वह धार आयेगी कहाँ से। पर फिर क्या लिखूंँ।

तभी मन में स्कूल गये हुए हमारे चार वर्षीय पोते आयांश मिश्रा जी आ गये। और उनके साथ ही एक बात याद आ गई तो एक लंबी-चौड़ी मुस्कान भी कि मन ही मन मुस्कुरा दी मैं। बात यह है कि मूल नक्षत्र में जन्में हमारे आयांश बड़े ही क्रोधी प्रवृत्ति के हैं। जिद्दी तो इतने कि हर बात ही उनकी जिद होती है। भाव यह होता है कि हर बात मान ही लो। वरना वह हंगामा देखो कि बाप रे बाप।

आयांश मिश्रा जी जब डेढ़ साल के हुए थे।जरा-जरा बोलना सीखे थे। तभी से जब भी उन्हें गुस्सा आता था तो एक ही धमकी देते थे। दौड़ते हुए बाहर गेट तक जाना और रोते-रोते यह कहना कि। घल से भाग जाऊँदा।फिर कब्बी नहीं आऊंदा। सब के कलेजे हिल जाते। सब तो मान-मनुहार में व्यस्त हो जाते। पर मैं यह सोचते रहती कि आखिर इसने यह कैसे सीखा।यह तो उसने कभी किसी से सुना भी नहीं तो कहाँ से यह भाव उसके मन में आए। पूत के पांव तो पालने में ही दिख रहे हैं।जाने आगे क्या होगा रामा रे।

आयांश के बढ़ने के साथ-साथ यह तांडव भी बढ़ रहा था। सच कहूँ तो मेरे मन में चिंता भी बढ़ रही थी कि इसे प्यार से समझाने से कोई सुधार तो आ ही नहीं रहा है। तो क्या किया जाए। कुछ तो ऐसा होना चाहिए कि बच्चे के मन से यह बात जाए।वरना सच में कहीं इधर-उधर निकल ही जाए तो हम क्या करेंगे। मन सिहर उठता था।

एक दिन फिर आयांश का यह तांडव अपने पूरे रौद्र रूप में पीक पर था कि मैंने उसका हाथ पकड़ा और तेजी से बाहरले गेट पर ले जाकर खड़ा किया और तेज आवाज में जोर से घुड़की दी कि भागो यहाँ से। जहाँ जाना है।वहाँ जाओ। पीछे से गली के सारे कुत्तों को भी दौड़ा देती हूं। तुम आगे दौड़ो। वे सभी पीछे दौड़ेंगे। और अब तुमको घर में घुसने भी नहीं देंगे। जाओ जहाँ भी जाना है।

बस फिर क्या था। जनाब हक्के-बक्के। सीधे से घर के अंदर आ गये।अभी तक मनुहार ही देखे थे। डाँट-घुड़की से कभी पाला ही नहीं पड़ा था। पड़ा तो होश फाख्ता हो गये जनाब के।

उधम और जिद तो आयांश अभी भी बहुतेरे करते हैं पर घर से। भाग जाउँदा। कब्बी नईं आउँदा। की टेर दुबारा कब्बी नईं करते।

हाँ नईं तो। आयांश सेर है तो क्या, आयांश की दादी भी सवा सेर है।


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