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न देम्...न देम्

न देम्...न देम्

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ए बाबू तनि हमके सड़क पार करा देम्।

बाबू ने देखा कि आखिरी अवस्था में अनुमानतः

अस्सी-बयासी वर्षीय जीर्ण शीर्ण सी काया, एक हाथ में बैग टांगे हुए चिरौरी के भाव से देख रही है। अब बाबू इंसान ही त़ो ठहरे....मन में इंसानियत जागना स्वभाविक है..।

अरे... क्यों नहीं अम्मा...जरुर पार करवा दूंगा।

बाबू ने अम्मा का हाथ थामा.... और चलती सड़क में सड़क पार करवाने लगे।

सड़क पार करवा कर बाबू के मन में गहरे संतोष का भाव आ गया। आखिर आज उनके हाथों पुण्य का काम जो हो गया। आशीर्वाद तो मिलेगा ही।

अच्छा बाबू .... जीया...सुखी रहा...

अब अम्मा सड़क पर देखीं कि एक स्कूटर वाला आ रहा है। तनि हाथ दीं...स्कूटर वाला रुका...

ऐ बाबू... बड़ी देर से खड़ीं हम्म...कौनो टैम्पो वाला नाहीं दिखल....जरा अगले चौराहे पर हमार घर बा...तनि छोड़ देम्...।

काहे नहीं अम्मा....बैंइठीं...। अम्मा बैइठ गईं... चौराहे पर तक नहीं... स्कूटर वाले ने दस गली पार कर घर तक अम्मा को छोड़ा।

अच्छा बाबू....जीया...सुखी रहा...

स्कूटर वाले ने भी लगे हाथ एक वृद्धा की मदद कर पुण्य लाभ ले लिया। न अम्मा ने घर पर रुक एक गिलास पानी पीने पूछा....न स्कूटर वाले ने ऐसी कोई आशा की थी।

दरवाजे से घुसते ही अम्मा ने देखा कि दूधवालाअपने महीने का पैसा लेने के लिए खड़ा हुआ है... वह बहू से हिसाब करने कह रहा था और बहू कह रही थी कि अम्मा से मांग लेना।

अम्मा तो आ गईं.... दूधवाले को आशा बनी....आज तो पैसे लेकर ही जाऊंगा, तीन महीने से टरका रहीं हैं।

का रे... फेर आ गइले... रोज फेरा लगइले से थकतै नइखे... जा अब ना देब कौनो पइसा वइसा...हमरे पास नइखे।

ऐसे कैसे अम्मा... कौनो भीख तो मांग नहीं रहे...दूध का पैसा बनता है। नक्की करो...तीन महीने से घूमा रही हो...।

न देम्...न देम्...न देम्... जा जौन करत बने कर ल। हमरे पास पैइसा नइखे।

अब दूधवाला भी करे क्या... इतनी उम्र दराज से कैसे लड़े। उसे कहाँ मालूम कि जाने कितने तगादे वाले बीसियों बार चक्कर काट कर हार जाते हैं। न दूधवालों की कमी है... न दुकान वालों की... हर महीने नया दुकान दार...हर महीने नया दूधवाला। ऊधौ का लेना तो है...पर माधों का देना नहीं है।

कोई न सोचे कि पैसे की कमी है। पचासों लाख का फिक्स डिपाजिट करोड़ों का हो गया है। हर महीने अच्छी खासी रकम आती है। उतना ही निकालतीं हैं जितने में मूलभूत जरूरत पूरी हो जाए। 

बाकी ऐय़्याशी तो बुढ़ापे में न देम्...न देम से पूरी हो जाती है। 

कोई तारीख नहीं भूलतीं हैं कि किस तारीख को कौन सा पैसा मैच्योर हो रहा है। कितना जमा है, कितना निकला है।

जुबान इतनी महीन कि जानती है कि कब कितना मीठा बोलना है...और कब मुकरना है।

अपनी जरूरत कुछ ज्यादा है नहीं और दूसरों की समझनी नहीं है।

जब काम... न देम् ...से निकल जाता है तो देना क्यों है। शायद ऐसी महान व्यक्तित्व के लिए ही यह कहावत बनी है कि....

चाल से चींटी न मरे... बातों से हाथी मर जाय...!


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