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इक्कीसवीं सदी के ये बच्चे

इक्कीसवीं सदी के ये बच्चे

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हमारे चार साल के पोते श्रीमान अयांश मिश्रा जी यूँ तो स्कूल बिना रोये धोए ही चले जाते हैं क्योंकि उनसे डेढ़ साल बड़ी बहन भी स्कूल जाती है तो देखा-देखी उनको स्कूल जाने में कोई एतराज नहीं है। पर पढ़ने से तो जरूर है। होमवर्क करना नहीं चाहते। कल का पढ़ाया कुछ भी याद नहीं रहता। लिखने में अंगुलियां बहुत जल्दी थक जातीं हैं।

पर कार्टून देखने में। वीडियो गेम्स देखने से वो कभी नहीं थकते हैं। डांटने पर कोई खास फर्क पड़ता नहीं है। स्कूल से आने के बाद थोड़ी देर में ही उनकी ढ़ूढ़ाई शुरू हो जाती है। जनाब मिलते हैं किसी कोने में। या टेबिल के नीचे अपनी मम्मी का मोबाइल लिए हुए।

क्योंकि दादी सबसे ज्यादा डांटती है मोबाइल देखने से। तो यह तोड़ निकाला है उसने।

पर यह सब उसने हमसे से ही तो सीखा है। जिसे भी देखो। वही अपने मोबाइल पर व्यस्त। सो उपदेश भी भोथरे लगने लगते हैं स्वयं को भी।

ज्यादा मोबाइल पर व्यस्त रहने से मुझे आंखों में शिकायत रहने लगी तो मेरे बेटे ने एक छोटी सी टीवी वाईफाई से कनेक्ट कर ड्राइंग रूम के एक कोने में लगा दिया कि आप बड़े स्क्रीन का इस्तेमाल करो। क्योंकि बाज तो हम बड़े भी कहाँ आते हैं। पर कब्जा दोनों भाई-बहन ने कर लिया है उस टीवी पर अपने कार्टून देखने के लिए। और यह देख हैरानी होती है कि टेक्नोलॉजी का कौन सा ज्ञान नहीं है इन बच्चों को। जो चाहते हैं। ढूँढ लेते हैं। डाउनलोड कर लेते है। मैं तो अभी तक न सीख पाई सब।

किस्सा कल का है कि जनाब अयांश मिश्रा जी करीब डेढ़ घंटे से गेम्स देख रहे थे तो मैंने दादी होने का फर्ज निभाया कि बहुत तेज स्वर में डांटा कि बंद करो अब। बहुत देख लिया। वह अपनी आदत के अनुसार अनसुना कर देखता रहा। मैंने फिर प्यार से पुचकारा। राजा बेटा। लोग अपने से बड़ो की बात मानते हैं। मेरा अंश भी तो मानेगा न। उसने बड़ी मुश्किल से मेरी तरफ देखा। और बड़ी ही मासूमियत से बोला। हमारी मैडम ने हमें नहीं सिखाया है कि अपने से बड़ों की बात माना करो। तो मैं क्यों मानूं। सच कहूँ तो मैं अवाक अभी तक हूं।

अब आप सब ही बताएं कि मैडम ने नहीं सिखाया तो अंश क्यों सीखे। बड़े ही बताऐंगे कि हमारी बात सुनो और अपनी बात मनवा लेंगे। भला क्यों ?


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