अखियों के झरोखों से.(अंतिम भाग
अखियों के झरोखों से.(अंतिम भाग
"निखिल से शादी के बाद एक-दो महीने ठीक निकले। हालांकि उनका परिवार बहुत रूढ़िवादी विचारों का था। मेरा संगीत विद्यालय जाना भी उन्हें पसंद नहीं था इसलिए वो भी छोड़ना पड़ा। तीन-चार महीने बाद निखिल का एक अलग ही रूप सामने आया। उन्हें रोज़ शराब पीने की आदत थी। पहले तो वो बाहर से पी कर आते थे पर कुछ समय बाद उन्होंने घर पर पीना शुरू कर दिया। मेरे मना करने पर बहुत झगड़ा होता था।
फिर जब राजू पैदा हुआ तो मुझे लगा कि अब निखिल में थोड़ा सुधार आएगा। पर हालत और बिगड़ गई।" ये कह मिनाक्षी जी गहरी सांस ले, चुप हो गईं। मानो अतीत के उन पलों को याद कर उनकी रुह कांप गई हो।
"ऐसा क्या हुआ मेरे पैदा होने के बाद मां?" राजीव ने पूछा।
"ना जाने कैसे, मेरी सास को कहीं से मेरे अतीत के बारे में जानकारी मिल गई….कि मैं आदित्य के साथ…घर से भाग गयी थी…और भी ना जाने कितनी बातें बताने वाले ने मिर्च मसाला लगाकर बताईं। इसके बाद…उस परिवार का नज़रिया ही बदल गया। आए दिन सब मुझे ताना कसते रहते। मेरे चरित्र पर…कीचड़ उछालते रहते। और निखिल ने तो हद कर दी जब उन्होंने ये कहा कि….." ये कह मिनाक्षी जी फूट-फूट कर रोने लगीं।
"ऐसा क्या कहा उन्होंने मम्मी जी?" सारिका ने उन्हें संभालते हुए पूछा।
"उन्होंने राजू को…अपनाने से ही मना कर दिया। उनके हिसाब से….राजू..उनका बेटा नहीं था…. पता नहीं कैसे….ये बात उनके दिमाग में बैठ गयी कि शादी से पहले मेरे और आदित्य के बीच……" मिनाक्षी जी सुबकते हुए बोलीं।
यह सुन सब स्तब्ध थे। एक खामोशी थी हॉल में। आदित्य जी की आंखों से निरंतर आंसुओं की धार बह रही थी।
"मैं…. उन्हें हर रोज़ यकीन दिलाने की कोशिश करती कि ये सच था कि मैं घर से भागी क्योंकि मैं अपनी ज़िंदगी आदित्य के साथ जीना चाहती थी….पर हमारा रिश्ता गंगा नदी सा पवित्र था। पर…..कोई नहीं माना। मेरी हालत उस घर में बद से बद्तर होती गई। अब तो निखिल…. मुझे पीटने भी …." मिनाक्षी जी अपने शरीर पर हुए उन प्रहारों को लेकर सहम उठीं। उन्हें पसीने आने लगे।
"मां, आप ठीक तो हो? सारिका पानी दो मां को।" राजीव बोला।
"राजू……मेरा यकीन मान…. मेरे और आदित्य के बीच कभी…." इससे पहले की मिनाक्षी जी आगे के शब्द बोलतीं, राजीव ने उन्हें चुप कराते हुए कहा,"मां, आपको मुझे सफाई देने की आवश्यकता नहीं है। मेरी मां गंगा की तरह पवित्र है ये मैं जानता हूं और इसके लिए मुझे किसी के सर्टिफिकेट की आवश्यकता नहीं है। लीजिए, पानी पीयो।"
कुछ पल शांत होने के बाद मिनाक्षी जी फिर बोलीं,"निखिल मुझे मारते थे….ये मैं बर्दाश्त कर रही थी पर जब उन्होंने नन्हे से राजू पर हाथ उठाना आरंभ किया तो…. मुझसे सहन नहीं होता था। इसपर मेरा उनसे झगड़ा था। वो बहुत बेरहमी से मुझे मारते थे। ज़िन्दगी जहन्नुम बन गई थी। फिर एक दिन…मैं रसोई से काम कर कमरे में आई तो देखा राजू नहीं था। मैं घबराकर उसे पूरे घर में ढूंढने लगी। हमारे घर के थोड़ी दूरी पर ही रेलवे ट्रैक था। मैंने छत से देखा निखिल…मेरे राजू को लेकर वहां खड़े थे।
राजू रो रहा था, चिल्ला रहा था पर वो दरिंदगी की हर हद को पार कर चुके थे। ट्रेन की आवाज़ मेरे कानो में पड़ रही थी। मुझे मेरे राजू को बचाना था। मैंने वहां पहुंच राजू को निखिल से खींचने की कोशिश की। निखिल ने उल्टा मुझे ही ट्रैक पर घसीट लिया। अब तक ट्रेन बहुत नज़दीक आ चुकी थी। इससे पहले की निखिल हमें वहां छोड़ कूदते….. मैंने…. मैंने अपनी पूरी ताकत लगाई और….उनको धक्का दे…राजू को लेकर ट्रैक से बाहर कूद पड़ी। पर….. निखिल….वो…बच …. नहीं पाए…. मैंने ….राजू…बेटा मेरा इरादा उन्हें मारने ….का नहीं था। मैं…. मैं तो बस तुझे बचाना…. मुझसे नाराज़ मत होना राजू….. मुझे छोड़कर मत जाना बेटा…. जानबूझकर नहीं किया….." मिनाक्षी जी बुरी तरह कांप रहीं थीं।
उनका पूरा शरीर पसीने से भीगा हुआ था।
राजीव उनके पास आया और उन्हें अपने गले से लगाकर रोते हुए बोला,"मां….आपने जो कुछ किया वो मुझे बचाने के लिए किया। इसमें आपका कोई दोष नहीं था। और ना मैं आपसे नाराज़ हूं और ना ही मैं आपको छोड़कर कहीं जाऊंगा। इतने साल आप इस अपराध बोध से ग्रस्त थीं। जबकि आपकी कोई गलती नहीं थी मां। इस अपराध बोध से बाहर निकलिए। वो महज़ एक हादसा था।"
अतुल, सारिका और मनीषा भी उनके पास आकर बोले,"आप उस घटना को अपने ज़हन से अपनी मेमोरी से डिलीट कर दीजिए। वो काला अतीत कब का खत्म हो चुका है। और एक सुनहरा भविष्य आपका इंतज़ार कर रहा है।" उन्होंने आदित्य जी की तरफ मुड़ते हुए इशारा किया। पर आदित्य जी वहां नहीं थे।
"अरे! पापा कहां चले गए? पापा….पापा।" अतुल आदित्य जी को घर में ढूंढने लगा।
"मैं जाकर लेकर आता हूं।" राम आहूजा ने उठते हुए कहा।
"आप रुको राम, मैं जानती हूं आदित्य कहां हैं। मैं जाती हूं।" मिनाक्षी जी उठते हुए बोलीं।
"मां, आपने मुझे इतने साल में सब क्यों नहीं बताया। अपने बेटे पर इतना भी भरोसा नहीं था?" राजीव की आंखों में नमी थी।
"बेटा, पहली बात ये कि मैं तेरे कोमल मन पर नफ़रत या डर की लकीर नहीं खींचना चाहती थी। दूसरी बात,सबने उसे एक हादसा मान लिया। निखिल के परिवार ने मुझे घर से निकाल दिया। मां के घर वापस जाने का कोई औचित्य नहीं था, इसलिए एक सहेली की मदद से एक कमरा किराए पर लिया और भगवान की कृपा से एक स्कूल में नौकरी मिल गई। ज़िन्दगी फिर से शुरू हो गई। नयी ज़िन्दगी में मैं तुझे केवल खुशियां देना चाहती थी। कोई दुख नहीं।" मिनाक्षी जी ने राजीव के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।
"तो अब हम आपको, आपका सबसे अनमोल तोहफा, जो वक़्त ने आपसे छीन लिया था, उन्हें वापस देना चाहते हैं तो क्या ग़लत कर रहे हैं? खुशियों पर आप दोनों का भी हक है। हां, भले ही देर से मिली हैं पर अब जो मिलीं हैं तो प्लीज़…. उन्हें खोइएगा मत।" राजीव किस ओर इशारा कर रहा था मिनाक्षी जी समझ गयीं।
"आंटी, आप और पापा एक दूसरे के लिए ही बने हैं। और अब दुनिया की कोई ताकत आप दोनों को फिर से मिलने से रोक नहीं सकती। आप दोनों भी नहीं रोक सकते। क्योंकि ये आपके बच्चों का फैसला है।" अतुल ने उन्हें गले लगाते हुए कहा।
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झील पार्क में आदित्य जी अपने हाथों से अपना मुंह ढक रो रहे थे। मिनाक्षी जी की कांपती आवाज़ उनके मन को अंदर तक विचलित कर रही थी। तभी उनके कंधों पर किसी ने प्यार से स्पर्श किया। उन्होंने पलटकर देखा तो मिनाक्षी जी थीं।
"आदि…. क्यों अपने आपको परेशान कर रहे हो? जो हुआ वो नियती का खेल था। इसमें आपका कोई कसूर नहीं है।" मिनाक्षी जी ने आदित्य जी के हाथों को अपने हाथों में लेकर कहा।
"कैसे मेरा कसूर नहीं था? कितना कुछ झेला तुमने मीना। उन लोगों ने तुम्हारे चरित्र को दागदार करने की कोशिश की, तुम पर हाथ उठाने की हिम्मत की। किसकी वजह से? मेरी वजह से। ना मैं तुम्हें घर से भगा कर ले जाने का निर्णय लेता और ना ये सब तुम्हारे साथ होता।" आदित्य जी का ब्ल्ड प्रेशर बढ़ रहा था।
मिनाक्षी जी ने उनके पास बैठ उनके कंधों पर अपना सिर रख उन्हें शांत कराते हुए कहा,"आदि, वो निर्णय हम दोनों का था। उसके लिए आप अकेले कसूरवार नहीं हो। और देखा जाए तो कसूरवार हम दोनों में से कोई नहीं है। हम जो करने जा रहे थे यदि हमारे माता पिता बिना हमारे बीच रुकावट बने कर देते तो आज ये दिन नहीं आता। हमने अपनी ज़िंदगी के सबसे खूबसूरत साल दर्द और तकलीफों से जूझते हुए निकाल दिए। पर….अब नहीं…अब…"
"अब…क्या?" आदित्य जी ने मिनाक्षी जी की आंखों में देखते हुए कहा।
"जीती हूँ तुम्हें देख के, मरती हूँ तुम्हीं पे
तुम हो जहाँ, साजन, मेरी दुनिया है वहीं पे
दिन रात दुआ माँगे, मेरा मन तेरे वास्ते
कहीं अपनी उम्मीदों का, कोई फूल न मुरझाए।।"
मिनाक्षी जी ने इन पंक्तियों के माध्यम से अपने दिल की बात ज़ाहिर कर दी। आदित्य जी ने उन्हें अपने आगोश में भरा और उन्हीं के शब्दों में जवाब दिया,
"इक मन था मेरे पास वो, अब खोने लगा है
पाकर तुझे, हाय मुझे, कुछ होने लगा है
इक तेरे भरोसे पे, सब बैठा हूँ भूल के
यूँ ही उम्र गुज़र जाए, तेरे साथ गुज़र जाए"
तभी वहां राम-साक्षी, राजीव-सारिका, अतुल-मनीषा भी पहुंच गये। और सबने एक साथ मिलकर उन पंक्तियों को दोहराया जिसे गुनगुनाते हुए आदित्य जी और मिनाक्षी जी की उम्र गुज़र गयी…
अँखियों के झरोखों से, मैंने देखा जो सांवरे
तुम दूर नज़र आए, बड़ी दूर नज़र आए
बंद करके झरोखों को, ज़रा बैठी जो सोचने
मन में तुम्हीं मुस्काए, मन में तुम्हीं मुस्काए
अँखियों के झरोखों से…
लेखक की कलम से
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जीवन में हर इंसान को खुश होने का हक है। फिर वो चाहे बच्चा हो, जवान हो या फिर बुज़ुर्ग। खुशियों पर हर किसी का हक है। कुछ लोगों को खुशियां जल्दी मिल जाती हैं और कुछ लोगों को देर से। पर जीवन में कभी ना कभी हर किसी को खुशियां मिलती ज़रूर हैं।
जब हम उम्र के उस पड़ाव पर पहुंचते हैं जहां समाज हमसे कहता है कि बस, अब तो जीवन में कुछ बचा ही नहीं करने को। अब अपने लिए खुशियां क्यों चुननी है? ये भी कोई उम्र है?
मेरा मत है कि ये ही तो उम्र है जब हमें अपने लिए जीने का अवसर मिलता है। पूरी ज़िंदगी परिवार को समर्पित कर, अब समय है अपने अरमान और ख्वाहिशों को पूरा करने का। ऐसे में यदि हमारे अकेले तन्हा जीवन में कोई साथी आ जाता है, अतीत से या वर्तमान से, हमें निसंकोच उसका हाथ थाम जीवन की सुनहरी यात्रा को पूरा करना चाहिए।
मैं आशा करती हूं कि मेरी ये कहानी समाज में एक नयी सोच उत्पन्न करेगी। एक नयी दिशा प्रदान करेगी। प्यार कभी बूढ़ा नहीं होता और प्यार करने का हक हर उम्र को है।

